HEERA : मक्कार चूहों के बिल में पानी डालने वाला फैसला

शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों की अनुशंसा के लिए एक यशपाल कमिटी बनी थी. पिछली यू.पी.ए. सरकार के दौर में एक नेशनल नॉलेज कमीशन भी बना था, साथ ही एक हरी गौतम समिति की रिपोर्ट में भी कई सुधारों की जरुरत बताई गई थी.

इन शिक्षा के सुधारों का वही हुआ था जो विदेशी टुकड़ाखोर और उनके बगलबच्चा कॉमरेड आम तौर पर करते हैं. सलाह कहीं ठन्डे बस्ते में पड़ी रही, एक इंच भी कोई काम आगे नहीं सरका.

तीन साल में भाजपा नेतृत्व भी इस दिशा में कुछ भी करती हुई नहीं दिखी इसलिए हम उन्हें कोसने से भी नहीं चूकते. जब 2016 के आखिर में के.के. शर्मा को ठग मण्डली के चंगुल से निकाल कर शिक्षा विभाग में लाया गया तो बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी.

हम इंतज़ार कर रहे थे कि कब विदेशी फण्ड पर पलने वाले गिरोह इस खबर पर छाती कूटना शुरू करते हैं. औरों से नहीं तो कम से कम हमें ठग मण्डली से उम्मीद थी कि वो “मोदी जी तो काम नहीं करने देते जी”, “हमारे आदमी ले जा रहे हैं जी”, जैसे प्रलाप करते दिखेंगे.

जब ये सब लम्बे समय तक होता हुआ नहीं दिखा तो हमारी उम्मीद जरा कम हो गई. पञ्च वर्षीय योजनायें बनाने वाले आयोग वगैरह ख़त्म करके जो नीति आयोग बना था, उसमें से भी निकलकर कोई वैसे नीतिगत बदलावों की कोई खबर नहीं आ रही थी.

फिर पिछले मार्च की एक बैठक में सीधा प्रधानमंत्री स्तर का एक फैसला आया. इस बार यू.जी.सी. और ए.आई.सी.टी.ई. को ख़त्म करने का फैसला ले लिया गया था.

कई साल पहले जब अमेरिका में सर-दे-साईं पिटे थे, अपने उसी वक्त के भाषण में प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि हम तेजी से बेकार कानूनों को ख़त्म करते जा रहे हैं.

ऐसे ही घटिया, सड़ियल और विदेशी मानसिकता से ग्रस्त कानूनों से भरा पड़ा एक यू.जी.सी. एक्ट भी था. इंडिया को भारत बनाने के लिए इसे ख़त्म किया जाना जरूरी था.

आज की तारीख में भारत में चार अलग अलग किस्म के विश्वविद्यालय होते हैं, एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, दूसरी स्टेट यूनिवर्सिटी, तीसरी डीम्ड यूनिवर्सिटी है तो चौथी प्राइवेट यूनिवर्सिटी.

इसमें सेंट्रल जहाँ अभिजात्य है तो वहीँ गिरते-गिरते प्राइवेट यूनिवर्सिटी बिलकुल अछूत होती है. 46 सेंट्रल, 358 स्टेट, 122 डीम्ड और 258 प्राइवेट यूनिवर्सिटी मिला कर भारत में अभी 785 विश्वविद्यालय होते हैं.

ये सब भारत के ही हैं, लेकिन अगर आप किसी एक से ग्रेजुएशन करते करते सेकंड-थर्ड इयर में किसी दूसरी यूनिवर्सिटी में जाना चाहें तो आप हरगिज़ नहीं जा सकते. किसी एक में पढ़े दो साल भूल जाइए, शुरू से तीन साल की पढ़ाई करनी पड़ेगी.

विश्वविद्यालयों की ये लम्बी फेरहिस्त देख कर चौंकिए मत. अकेले राजस्थान में 73 अलग-अलग यूनिवर्सिटी हैं, अचानक किसी का नाम बता दें, तो वो सच में कोई विश्वविद्यालय है या ऐसे ही कोई नाम बक दिया है, वो शिक्षा मंत्री भी नहीं बता पायेंगे.

ये सिर्फ एक राज्य का हाल नहीं है. गुजरात में सबसे ज्यादा यानि 28 स्टेट यूनिवर्सिटी होती है, इसके ठीक पीछे बंगाल और उत्तर प्रदेश हैं, जहाँ 26-26 स्टेट यूनिवर्सिटी हैं.

दक्षिण भारत जो कई-कई डोनेशन वाले मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए जाना जाता है, वहां तमिलनाडु है, जहाँ सबसे ज्यादा 28 डीम्ड यूनिवर्सिटी हैं. राजस्थान वाले 73 विश्वविद्यालयों में से 42 प्राइवेट विश्वविद्यालय हैं.

केन्द्रीय यूनिवर्सिटी की गिनती शायद केंद्र से दूरी के साथ ही घटती है. दूर दराज के क्षेत्रों में जहाँ कॉलेज भी नहीं वहीँ दिल्ली में पांच और उत्तर प्रदेश में छह केन्द्रीय विश्वविद्यालय मौजूद हैं.

सिर्फ इतनी लिस्ट पर हैरान परेशान हो रहे हैं तो हम आपको ये भी बताते चलें कि कई लोग जबरिया डिग्री वाले भी कहलाते हैं. ये जबरिया डिग्री हम स्वायत्त संस्थानों (autonomous bodies) से मिली डिग्री वालों को कहते हैं.

ऐसे स्वायत्त संस्थानों से मिली डिग्री की वजह से कई युवा यू.जी.सी. के हिसाब से काफी पढ़े-लिखे और सिर्फ प्लस टू एडुकेटेड एक साथ ही हो जाते हैं.

इन स्वायत्त संस्थानों की लिस्ट में आयेंगे 18 आई.आई.टी. कुल 32 एन.आई.टी. भी हैं, 18 ही ट्रिपल आई.टी. या आई.आई.आई.टी. होते हैं, इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस होता है, कई स्टेट फण्ड पर चलने वाले तकनीकी संस्थान हैं, बहुत से एग्रीकल्चरल इंस्टीट्यूट हैं.

आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (एम्स) के सारे ब्रांच भी इसी लिस्ट पर है, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च के सारे केंद्र भी इसी पर आयेंगे. ओह हाँ, जो आई.आई.एम. हैं, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट वो भी इसी पर आएगा. वो डिग्री भी नहीं देता, डिप्लोमा देता है.

कोई बगलबच्चा गिरोह निराश ना हो! हम नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा को भूले नहीं हैं. समस्या ये है कि उसने अपना स्टेटस अक्टूबर 2011 में बदल लिया था. अभी हमें ये साफ़-साफ़ पता नहीं कि वो डीम्ड है, प्राइवेट है, सेंट्रल है या स्टेट इसलिए पहले उसका नाम नहीं लिया था. जैसे ही पता चल जाए कि नेशनल स्कूल और ड्रामा क्या है और उसकी डिग्री कहाँ मान्य है, तमाम बुद्धिजीवी हमें भी बताएं. हम उसे भी लिस्ट में डालेंगे.

कई साल पहले से कुछ लोग कहते रहे हैं कि आपको मोदी सरकार के क्रान्तिकारी फैसले अभी नहीं बल्कि इसकी सरकार के तीन साल बीतने पर नजर आयेंगे.

शिक्षा में होगा परिवर्तन दिखता था, टैक्स व्यवस्था में बदलाव होगा ये वरुण भाई का मानना था, विदेश नीतियों में बदलाव आएगा, पड़ोसियों के साथ ही नहीं आन्तरिक मामलों में भी चीज़ें बदलेंगे ये पुष्कर अवस्थी जी की पुरानी पोस्ट में दिख जायेगा.

कई साल से विदेशी बोटी पर पल रहे टुकड़ाखोरों ने हमारे शिक्षा के संस्थानों में अड्डा जमा रखा है. इन धूर्तों के समर्थन के अलावा ना तो इनमें घुसने का कोई तरीका होता है ना ही टिके रहने का.

यू.जी.सी. जैसी संस्थाओं को ख़त्म कर के HEERA का गठन इस दिशा में किया गया पहला फैसला है. मक्कार चूहों के बिल में पानी डालने के इस फैसले का हम तहेदिल से स्वागत करते हैं.

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