क्यों फैलाया गया आर्य आक्रमण और उनके बाहरी होने का झूठ

‘आर्य आक्रमणकारी थे और भारत में बाहर से आये’, यह पहला ऐतिहासिक झूठ है जिसे हम पर थोपा गया. यह हास्यास्पद है और इसके कोइ प्रमाण नहीं दिये गये. जबकि इसको पहली नजर में ही नकारने के कई अति सामान्य तथ्य और तर्क हैं. जिनमें से कुछ एक का वर्णन करके यह बड़ी आसानी से प्रमाणित हो जायेगा कि यह कथन कितना बचकाना है जबकि मैं कोई इतिहासकार भी नही.

1. आर्य अगर बाहरी होते तो अपने प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद में सिंधु, सरस्वती, गंगा और हिमालय का महिमामंडन नहीं करते.

2. वे कहीं बाहर से आये होते तो कहीं तो किसी रूप में अपने मूल स्थान का वर्णन होता.

3. यूं तो पूर्व वैदिक काल में, मानव छोटे-छोटे समूह में यायावर था. मगर उन दिनों सिंधु को पार करना इतना आसान नहीं था कि बड़ी तादाद में कोई बाहरी आ जाये.

4. उस समय आक्रमणकारी सिर्फ़ पुरुष होते थे. बाहर से महिलाओं और बच्चों का आना संभव नहीं.

5. हिमकुश की बर्फ़ीली चोटियों के बीच से बहुत बाद में भी आना संभव नहीं हो पाया था, अधिकांश रास्ते में ही मर जाते, तो वैदिक काल से पूर्व कैसे कल्पना की जा सकती है कि इतनी बड़ी तादाद में लोग आये होंगे.

6. और जो थोड़े बहुत आ भी गये, क्या वे उन दिनों इतने सक्षम थे कि इतने विशाल भूभाग में फैल भी जाते और बस भी जाते और अपनी सभ्यता स्थापित भी कर जाते?

मुग़ल आये, हम पर सैकड़ों वर्ष शासन किया, आज कितने मुग़ल यहाँ होंगे? नगण्य. कृपया मुसलमानों की संख्या ना देखे, यहाँ लगभग सभी धर्म परिवर्तित हैं.

ठीक इसी तरह आज कितने अंग्रेज़ यहाँ मिल जाते है? ना के बराबर. सच तो यह है कि आज के युग में भी यह संभव नहीं कि किसी स्थानीय सभ्यता को कोई बाहरी सभ्यता विस्थापित कर दे.

इसके अतिरिक्त अनेक खुदाई में मिले अनगिनत प्रमाण है और अब तो डीएनए द्वारा वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित हो गया है कि आर्य-द्रविड़ दोनों एक ही हैं। हाँ, इतने बड़े भूभाग में रंग, शक्ल, आकार में विविधता हो सकती है, भौगोलिक और जलवायु कारणों से, मगर हैं हम सब माँ भारती की संतान.

इसके बावजूद आर्यों के बाहरी होने का भ्रम फैलाया गया, यहाँ तक कि इस प्रोपेगंडा में लेखक नेहरू भी शामिल हुये. आख़िरकार क्यों? ताकि एक सनातन समृद्ध सभ्यता भ्रमित हो जाये.

भ्रमित होते ही आत्मविश्वास डोल जाता है, जिस पेड़ की जड़ें हिल जाती हैं वो हरा-भरा पेड़ कमज़ोर हो जाता है और कुछ समय बाद सूख कर ख़त्म. कमज़ोर सभ्यता पर शासन करना और अपनी जड़ों से हिले हुये का शोषण आसान होता है.

इस तरह के झूठ और भ्रम फैलाने का काम, वामपंथी गिरोह के द्वारा जारी है. यह कुछ भी निराधार बोल देते है और फिर हम बैठकर मीडिया में इस पर बहस करते हैं, लेकिन ऐसा करने से कुछ एक इनके समर्थन में आ ही जाते है.

और इस तरह से इनकी संख्या बढ़ती जा रही है, जो इनके षड्यंत्र का एक हिस्सा है, जिसकी योजना देशविरोधी ताकतें वर्षों से बना रही हैं।

उदाहरण के तौर पर क्या आप जानते हैं कि इस झूठ को, कि आर्य बाहर से आये थे, मानने वाले हमारे बीच में कितने हैं? अनेक, क्योकि लंबे समय तक यही पढ़ाया गया.

ठीक इसी तरह ये वामपंथी बौद्धिक गिरोह ज़हरीले बीज बोता रहता है, जो किसी ना किसी आम भारतीय के दिल-दिमाग़ में पलता-बढ़ता रहता है. यह पेड़ बड़ा होकर क्या नुक़सान करता होगा, यह समझना मुश्किल नहीं.

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