वास्तविक पिता होता तो रोक लेता पुत्र की ऐसी बर्बादी

स्कूल समय मे तेनालीराम की एक कहानी पढ़ी थी. एक बच्चे को लेकर दो महिलाएं झगड़ रही थी, दोनों ही महिलाएं ये दावा कर रही थी कि वो बच्चा उसका है. आसपास भीड़ जमा हो गयी. पर कोई निर्णय न कर सका कि वो बच्चा किसका है.

आखिरकार दोनों महिलाओं को राजा कृष्णदेवराय के दरबार मे ले जाया गया. राजा भी हैरान, परेशान कि कैसे निर्णय करे कि बच्चा किसका?

तब उन्होंने तेनालीराम को यह समस्या हल करने को कहा. तेनालीराम ने कहा कि बच्चे को जमीन पर रख दो, जो महिला इसे अपनी तरफ खींच लेगी बच्चा उसी का. दोनों महिलाओं ने एक साथ बच्चे को अपनी ओर लाने की कोशिश शुरू कर दी.

एक महिला ने उस बच्चे के पैर पकड़ लिये, दूसरी ने हाथ और उसे अपनी ओर खींचने लगी. बच्चा दर्द से कराह उठा, तभी एक महिला ने उस बच्चे को अपनी तरफ से छोड़ दिया. बच्चा दूसरी महिला के हाथ मे आ गया, वो खुश हो गयी कि बच्चा उसका हो गया, वो राजा कृष्णदेवराय से कहने लगी कि उसे बच्चे को लेकर जाने कि आज्ञा दे.

पर तेनालीराम ने निर्णय सुनाया कि बच्चा वो लेकर जायेगी जिसने इसे छोड़ा है, वही इस बच्चे की असली मां है, क्योकि उससे अपने बच्चे की पीड़ा देखी नही गयी और उसने बच्चे को छोड़ दिया, तब दूसरी महिला ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूरा दरबार तेनालीराम की जयजयकार से गूंज उठा.

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और देश के कई राज्यो मे अभी किसान आंदोलन चल रहा है. किसान धरना दे रहे है, हाईवे को जाम किया जा रहा है, गांवो से दूध और सब्जी को शहर में नहीं आने दिया जा रहा है और ये हर आंदोलन की एक स्वाभाविक और सामान्य प्रक्रिया है.

पर इस दौरान एक दृश्य जो देखा गया कि किसान अपने ही हाथों से अपनी फसल को जला रहे हैं, दूध और सब्जी को सड़क पर फैला रहे हैं. किसान और उसकी फसल मे मां बेटे और पिता पुत्र के समान सम्बन्ध माना जाता है, क्योंकि वो अपनी फसल को अपनी मेहनत और खून पसीने से सींचकर बड़ा करता है.

वो कभी भी अपनी पैदावार को सड़क पर न तो जला सकता है, न इस तरह बरबाद होते देख सकता है. न्यूज में आज बताया कि केले और लहसुन से भरे ट्रकों को लूटकर उसमें रखी सारी सामग्री को सड़क पर फैला दिया. कई जगह कुछ कथित किसानों ने पुलिस पर हमला भी किया, लूटपाट, आगजनी और हिंसा की भी खबरे हैं. मंदसौर मे 5 किसानों की गोली लगने से मृत्यु होने की खबर आ रही है. निसंदेह ये हरकते एक आम किसान नहीं कर सकता.

इसमें कोई दो राय नहीं कि किसान को उनकी उपज का पूरा दाम मिलना चाहिये, पर जिस तरह से किसान आंदोलन नक्सली हिंसा का रूप लेता जा रहा है उससे साफ पता चलता है कि किसान आंदोलन के पीछे गहरा राजनीतिक षड़यंत्र काम कर रहा है और किसानों का रूप धरकर बड़े पैमाने पर असामाजिक तत्व इस पूरे आंदोलन को अपने निहित स्वार्थ के लिये चला रहे हैं. क्योंकि आम भारतीय किसान कभी भी हिंसक नहीं हो सकता और न अपनी ही फसल को अपने हाथो आग लगाकर बरबाद कर सकता है.

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