भले ये गलत हो, पर ज़रूरी है

सत्ता हमेशा अपने दुश्मनों को निशाना बनाती है. ये बहुत ही नैसर्गिक है. ये गलत है, लेकिन आज का सत्य यही है. सत्ता समय खोजती है. हर सत्ता समय लेती है अपने दुश्मनों को नापने में. इसी सत्ता ने अपने बेटों को मरवाया है, बापों को मरवाया है, मालिकों को मरवाया है.

क्या एनडीटीवी को निशाना बनाया जा रहा है? बिल्कुल. लेकिन क्या इसमें सरकार गलत हथकंडे अपना रही है? बिल्कुल नहीं. सरकार वही रास्ता अख़्तियार कर रही है जो क़ानूनी है, संवैधानिक है. सरकार टेक्निकली सही है. उतनी ही सही, या गलत, जितनी कॉन्ग्रेस थी. अगली सरकार आएगी, वो अपने दुश्मनों को साफ़ करेगी.

मुझे ख़ुशी है कि सफ़ाई तो हो रही है. मेरी विचारधारा के विरोधियों का नाश हो रहा है, इससे बेहतर और बात क्या होगी! मेरी विचारधारा सही या गलत हो सकती है आपके मापदण्डों पर, लेकिन विरोधी विचारधारा के नाश होने पर मैं ख़ुश होता हूँ तो इससे मेरी निष्पक्षता मत आँकिए.

मैं निष्पक्ष नहीं हूँ. निष्पक्ष वो नहीं होता जो या तो आँखें मूँद लेता है, या फिर सबको गरियाता है. ये बहुत बड़ा भ्रम है जो लोग पाले घूमते रहते हैं. सेकुलर के भी मामले में यही वाहियात परिभाषा फैली हुई है. हर जगह निष्पक्षता की ज़रूरत नहीं होती. आप एक बलात्कार की घटना पर निष्पक्ष कैसे हो सकते हैं? आप आतंकी की दलीलें निष्पक्ष कैसे सुन सकते हैं जबकि आपने, और पूरी दुनिया ने उसे देखा हो गोलियाँ बरसाते?

सत्ता की आलोचना निष्पक्ष कैसे होती है? उसकी हर योजना को अपने हिसाब के तर्कों से आँकने पर कि एक जगह जीडीपी को आर्थिक बेहतरी का मानदंड मान लिया, दूसरी जगह कह दिया कि गरीब किसान तो आज भी मर रहे हैं, ये कैसा ग्रोथ है? लोगों की दिक़्क़त है कि वो सचिन का टेस्ट औसत कालिस से, स्ट्राइक रेट अफरीदी से, चौथी पारी के शतक द्रविड़ से और रनों का प्रतिशत लारा से मापकर उसे छोटा बता देते हैं. मतलब एक तरफ एक आदमी, दूसरी तरफ छः आदमी के बेहतरीन आँकड़े.

सत्ता की आलोचना पिछली सत्ता को तुलना में रखकर भी होनी चाहिए. बिना किसी रेफरेंस फ़्रेम के आप रैली के भाषणों को ज़मीन पर देखना चाहते हैं तो ये आपकी राजनैतिक समझ, और नेताओं की नैतिकता की समझ में कमी की ओर इशारा करता है. सत्ता की आलोचना उस हिसाब से भी होनी चाहिए कि जो हो सकता है वो क्यों नहीं हो रहा.

फ़िलहाल, विच-हंट तो सत्ता की प्रमुख अदा होती है. जिनका नहीं भी होता है, वो भी कई बार फ़र्ज़ी ही अपने आपको ग्लैमराइज कर लेते हैं कि उनका भी हो रहा है, भले ही सत्ता उनको उस लायक भी ना समझता हो. चैनल ने माहौल भी ऐसा ही बनाया था पिछले सालों में जैसे कि उनको पता है कि वो तो होना ही है, तो जितना डेमैज कर सकते हैं कर दिया जाय.

किस चैनल में किसका पैसा है इस बात से कुछ भी ना तो पता चलता है, ना ही आप चैनल देखकर ये अंदाज़ा लगा सकते हैं. जितनी दोगली सत्ता होती है, उतने ही दोगले व्यापारी होते हैं. सत्ता कभी भी पलटी मार सकती है, और बिज़नेसमैन अपना फ़ायदा देखते हुए दो विरोधी विचारधाराओं को पनपने दे सकता है. उसको दोनों तरह के दर्शक मिल रहे हैं, पैसा आ रहा है. वो कॉन्ग्रेस को भी पार्टी फ़ंड देता है, भाजपा को भी.

बाकी, हम और आप, अम्बानी-अडानी खेलते रहें, होगा उससे कुछ भी नहीं. एनडीटीवी बंद हो जाए, तो ये एक शुरूआत होगी. पत्रकारिता का स्वर्णिम युग तभी आएगा जब स्क्रॉल, वायर, क्विंट जैसे संस्थान बंद होंगे. आप डिसेंट और ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म के नाम पर अजेण्डाबाजी करते हुए ख़ुद को सही पत्रकार तो नहीं कह सकते.

लोग मुझसे ये भी पूछते हैं कि मैं ज़ी न्यूज़ को क्यों नहीं गरियाता. पहली बात तो ये है कि मैं उसे देखता नहीं. दूसरी ये कि जितनी नफ़रत वामपंथियों ने बोई है उसकी धार को नाकाम करने के लिए उसी स्तर का दक्षिणपंथी विषवमन निहायत ही ज़रूरी है. ये गलत है, लेकिन ये ज़रूरी है. जैसे कि सेलेक्टिव टार्गेटिंग गलत है, लेकिन ज़रूरी है.

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