मेकिंग इंडिया गीतमाला : मोहे छू ले सजना, गुस्सा है क्यों इतना, जो मर रही उसको क्यों मारे

बंजारों की भाषा
मुझे नहीं आती
लेकिन मैं चाहता हूँ
तुम्हारी देह के किनारों पर
बंजारों की तरह घूमना
बंजारों की ही तरह गीत गाना
मंजीरे बजाना
घुमावदार पगड़ी
और मूंछों के ताव के साथ
मैं उनके कपड़ों के
इन्द्रधनुषी रंगों को
पिरो देना चाहता हूँ
अपनी उन बातों में
जो मुझे सभ्य समाज का होने के कारण
व्यक्त नहीं करने देती
तुम्हारे यौवन के प्रति मेरे आकर्षण को
और मैं उसे प्रेम के लबादे में ओढ़कर
उसका दम घोंट देता हूँ

मैं लथपथ हो जाना चाहता हूँ
अपनी आदिम और बीहड़ इच्छाओं के साथ
तुम्हारी देह की गीली सौंधी मिट्टी में
और सुनों, सिर्फ किनारों पर खड़े होकर
तुम्हारे स्पर्श की मछलियों को
अपनी बलिष्ठ भुजाओं के जाल में नहीं फांसना मुझे
मैं कूद जाना चाहता हूँ तुम्हारे देह के उस झरने के साथ
जो पर्वतों और कंदराओं से निकलकर
न जाने किस समंदर में घुल जाने को आतुर है…

मैं जानता हूँ
मैं वो समंदर नहीं जिसे तुम अपने सात्विक प्रेम को
अंजुली में भरकर अर्पण कर कोई मंजिल पाना चाहती हो

मैं तो बस वो पगडंडी हूँ
जिसके किनारे पर
रात बंजारे ईंट का चूल्हा जलाकर
पेट की अगन का निराकरण करते हैं
और निकल जाते हैं अगली सुबह
अपनी चहकती लहकती टोली बनाकर

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