चैनल के प्रमोटर के निजी हेरफेर की जांच, मीडिया पर हमला कैसे!

लगभग दो साल पहले एक अदने से पत्रकार महोदय का पुलिस के साथ कुछ लफड़ा हुआ. लफड़े के बाद जब पुलिस अपनी असली औकात में आयी तब पता चला कि वह अदने से पत्रकार वास्तव में पत्रकार थे ही नहीं. बल्कि अपने कुछ अवैध कामों पर परदा डालकर समाज में सफेदपोश की छवि बनाये रखने के लिये वह एक मशहूर अखबार से जुड़कर खबरें लिखा करते थे.

वैसे तो उनमें खबर लिखने की भी काबलियत नहीं थी, लिहाजा वह कमीशन पर एक अलग आदमी को इस काम में लगाये हुये थे. वह आदमी इनके नाम से अखबार के दफ्तर में खबरों को पहुंचाता था और बदले में पत्रकार महोदय को समाज, प्रशासन और राजनीति से जुड़े लोगों पर रौब डालने का अधिकार प्राप्त होता रहता था.

पत्रकारिता के तगमे के कारण आमतौर पर लोग उन्हें दूध का धुला मान लेते थे. पुलिस और प्रशासन के लोग तो दफ्तर में उनके प्रवेश के साथ ही अपनी कुर्सियों से खड़े होकर अभिवादन में सिर झुका लेते थे. बाकी राजनैतिक लोग अपनी राजनीति को चमकाने के लिये इनकी जी-हुजूरी करते नहीं थकते थे. समाज में अच्छी खासी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी.

लेकिन एक दिन जब किराये की एक गाड़ी को लेकर किसी पुलिस वाले के साथ थोड़ी कहा-सुनी हुई तो इनकी सारी पोल खुलकर सामने आ गयी. पत्रकार महोदय अपनी पत्रकारिता की आड़ में अवैध तेल और गैस रिफिलिंग का धंधा करते थे. इसके साथ ही इनके परिवार वाले मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध असलहों के कारोबार से भी जुड़े हुये थे. पत्रकार महोदय की कमाई का मुख्य जरिया चोरी की गाड़ियों की खरीद फरोख्त हुआ करता था.

बहरहाल पत्रकार महोदय की असली पत्रकारिता अब शुरू हुई. मतलब इसके बाद वह अपने आपको पीड़ित बताते हुये अखबारों में पुलिस के खिलाफ लंबे लेख लिखने लगे. पुलिस रोज जितनी कार्रवाई उनके खिलाफ करती उसकी रिपोर्टिंग के बजाय जनता को अगली सुबह एक निरीह पत्रकार पर पुलिस की ज्यादतियों की कहानियां पढ़ने को मिलती.

हद तो तब हो गयी जब उनके द्वारा छापी गयी खबरों के दबाव में कप्तान महोदय ने थानाध्यक्ष महोदय को प्रतिकूल प्रविष्टि थमा दी. यह सिलसिला तब रुका जब एक दिन वह गिरफ्तार होकर जेल चले गये.

अखबार के दफ्तर को जब सारी बातें पता चलीं तब उसी अखबार में उनके खिलाफ खबर भी छपी और अखबार की ओर से एक छोटा सा माफीनामा भी प्रकाशित हुआ.

वैसे तो पत्रकार महोदय की कहानी इस वाकये के साथ ही खतम हो गयी, साथ ही समाज से उनका नाम भी ऐसे धूमिल हुआ जैसे किसी ने सफेद कागज पर लिखे पेंसिल की लिखावट को इरेज़र से मिटा दिया हो.

लेकिन वह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड़ गयी. मसलन, पत्रकारिता खुद में कोई धंधा है या किसी धंधे को छुपाने का तरीका? क्या पत्रकारिता किसी को अवैध काम या भ्रष्टाचार करने की खुली छूट देती है?

क्या पत्रकार होने का मतलब है कि आपके निजी भ्रष्टाचारों और अवैध कामों पर लगने वाली लगाम भी पत्रकारिता पर हमला मानी जायेगी? आखिर पत्रकार होना, ईमानदार होने का पर्यायवाची कैसे हो गया?

यह खबर मेरे जेहन में उस समय एकाएक आ गयी जब यह पढ़ने को मिला कि एनडीटीवी के प्रमोटर प्रणव रॉय के घर और दफ्तरों पर सीबीआई के छापे पड़े हैं. वैसे तो यह छापे रुपयों के हेरफेर के एक पुराने मामले में पड़े थे. लेकिन बुद्धिजीवियों ने इसे मीडिया पर हमला बताने में तनिक भी देर नहीं की.

दोपहर तक अरविंद केजरीवाल का भी ट्वीट आ गया कि सरकार मीडिया पर हमला कर रही है. फिर शाम से चैनल पर भी यह बताया जाने लगा कि सरकार मीडिया को दबा रही है और वह इस कार्रवाई से दबने वाले नहीं है.

बेशक अगर सरकार दबाने का प्रयास कर रही हो तो दबना नहीं चाहिये और इसका विरोध करना चाहिये. लेकिन इस बीच यह स्पष्ट होना चाहिये कि चैनल के प्रमोटर वाकई किसी गलत काम में लिप्त नहीं रहे हैं.

वैसे तो चैनल इस बात की भी तस्दीक दे रहा है कि प्रमोटर के खिलाफ मामला वास्तव में फर्जी है. लेकिन अगर वह फर्जी भी है तो उससे उस चैनल या उसके दर्शकों का क्या लेना-देना? अलबत्ता यह स्पष्टीकरण अभी सिर्फ चैनल की ओर से आया है, सीबीआई ने अब तक उन्हें कोई कलीन चिट नहीं दी है.

ऐसे में प्रमोटर की कोई निजी हेरफेर की जांच मीडिया पर हमला कैसे हो गयी? इसके उलट अगर चैनल की प्रतिक्रिया को देखा जाय तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिये कि लगातार इस खबर के संबंध में सरकार को ललकारना सरकार पर हमला है.

फिर सवाल खड़ा होता है कि लोकतंत्र में पत्रकारिता द्वारा सरकार से सवाल किया जाना उचित है या हमला करना? क्योंकि पत्रकारिता में न्यूज़ और व्यूज़ के अपने अलग-अलग मायने होते हैं.

किसी न्यूज़ को परोसना और उसपर अपने व्यूज़ रखना दोनों अलग चीजें होती हैं. दोनों का मिश्रण पत्रकारिता के लिये अपने आप में एक सवाल है. फिर किसी न्यूज़ को अपने व्यूज़ के द्वारा परोस कर आखिर कैसी पत्रकारिता हो रही है?

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