अहिंसक होने और निरीह होने में फर्क तो समझती हैं न आप?

यह लेख महिलाओं के लिए है, कृपया अपने घर और परिवार की महिलाओं से इस पर चर्चा करें. अगर आप कहें कि आप के परिवार या परिचय की हर महिला केवल गपशप और चुगली-बुराई का ही मजा लेने के काबिल है तो कोई बात नहीं, एक बार ट्राय तो करें. आखिर वे आप का परिवार हैं, आप के घर की इज्जत हैं. एक बार तो कोशिश करें.

बात आजकल हिन्दू बस्तियों पर विधर्मियों के सीधे हमलों की है या फिर भीम आर्मी का झण्डा उठाकर उनके साथ किए गए हमलों की है. कल आप के घर का नंबर भी लग सकता है. इसलिए अपने घर की महिलाओं से इस पर चर्चा अवश्य कीजिये.

युद्ध में यश पाने का सब से पहला नियम है कि आप अपनी और शत्रु की ताकत को सही ढंग से जान लें. ताकत कई प्रकार की हो सकती है, और इसमें शत्रु को गाफिल पकड़ना भी एक महत्व की ताकत है.

ऐसे समय पर सुनिश्चित स्थान पर छापा मारा जाये जहां आप का हमला शत्रु का ज्यादा से ज्यादा नुकसान करें, उसका मनोबल तोड़े और अगर आपका हमलावर दस्ता मारा भी जाये तो जितने लोग मारे जाएँ उसके हिसाब से शत्रु के बहुत ज्यादा लोग मारें या कोई और बहुत भारी नुकसान करें जिससे उबरना शत्रु के लिए मुश्किल हो जाये यह यशस्वी युद्धनीति है.

जहां तक बाहरी आक्रांताओं के साथ हुए युद्धों का इतिहास ज्ञात है, उन्होने इसी तंत्र का सब से बड़ा उपयोग किया है. एलेग्जेंडर ऐसी जगह नदी पार हुआ जहां अपेक्षा नहीं थी कि वहाँ कोई नदी पार करने की हिम्मत करे. पूरा समीकरण बदल दिया. लेकिन यह हिस्ट्री क्लास नहीं है, बात तो आप समझ ही गए होंगे, तो मुद्दे पर आते हैं.

आगरा में दलित बस्ती पर मुसलमानों का किया गया हमला या फिर भीम आर्मी के साथ मुसलमानों का हमला इनमें एक पैटर्न उभर कर आ रहा है. हमला उस वक़्त करो जब पुरुष घर में न हों. या आगे फिर यह पैटर्न भी निकल आयेगा कि मध्यरात्रि को हमला करो जब सब सोये हों.

ग्रामीण बंगाल में यह पैटर्न है लेकिन लोग उससे अब अभ्यस्त होने लगे हैं और सही जवाब भी देने लगे हैं. पता है ममता राज में पुलिस तो आने से रही. और हमलावर भी कोई बड़े वीर नहीं होते यह भी देखा गया है.

और एक चीज देखी गई है कि पथराव से शुरुआत होती है. छतों पर, खिड़कियों पर अचानक पथराव शुरू हो तो क्या मनोदशा होती है यह अनुभव की चीज होती है.

बाकी इस वक्त औरतों का बर्ताव कैसा होता है उस पर मुझे चर्चा नहीं करनी, कैसा होना चाहिए इस पर बात करें तो ज्यादा उपयुक्त बात होगी.

अगर आप का मनोबल टूटता है आप प्रतिकार करने की स्थिति में नहीं रहती हैं. उस समय अगर आप दुबक कर बैठ जाएँ तो पचासेक लोगों की भीड़ भी गाँव या बस्ती जला-लूट सकती है.

बलात्कार के लिए समय ज्यादा लगता है, उतना समय उनके पास कभी कभी नहीं होता. लेकिन पंद्रह मिनट में पथराव और आगजनी मुमकिन है. अगर आधे-एक घंटे की आश्वस्ति हो तो लूट के साथ बलात्कार का कार्यक्रम भी निर्विरोध अमल में लाया जा सकता है.

यहाँ महिलाओं को भी प्रतिकार की ट्रेनिंग के सिवा कोई विकल्प नहीं है अपने घर बचाने का. लाठी छोड़ दीजिये, वहाँ तक बात नहीं आएगी. पथराव का जवाब देने के लिए गोफन गुलेल की ही ट्रेनिंग आवश्यक है, उसमें कम मेहनत लगती है, इतना तो ये कर ही सकती है.

लाठी चलाने के लिए दमखम चाहिए, बिना परिश्रम और नियमित अभ्यास के 30 सेकंड में सांस उखड़ जाएगी, और दूसरी बात, आँखों में खून और हवस उतर आए पुरुष को देखते ही ये भयभीत होकर गलितगात्र हो सकती हैं, इसलिए गोफन गुलेल ही ठीक है.

लंबी दूरी से आप जवाब दें तो काम बन सकता है. हाथ से पथराव की ट्रेनिंग आप को नहीं है, और ना ही आप में वो शक्ति है कि ताकत से पत्थर दूर फेकें. गोफन गुलेल चलाये, आप सुरक्षित रहेंगी कुछ हद तक ही सही.

चोट आ सकती है लेकिन बस्ती की सभी महिलाएं बिलकुल अनुशासित हो कर ट्रेनिंग से गोफन गुलेल चलाये तो बहुत कारगर उपाय है. पचास औरतें दस-दस के हिसाब से चलाती रहें तो लगभग अनवरत वर्षा होती रहेगी जिसके आगे टिक पाना संभव कम है.

अगर आप ये कहें कि सामने वाले पक्ष से भी इस उपाय का अवलंबन हो सकता है तो हाँ जी, बिलकुल हो सकता है. लेकिन बात जवाब देने की है जिसकी उनको अपेक्षा कम होती है. वे काटने आते हैं, लड़ने नहीं. अपना खून देखना उनको भी गवारा नहीं होता.

बाकी कृपया यह न कहें कि हम तो पढे-लिखे सभ्य लोग हैं यह सब हमें शोभा नहीं देता. हम अफसर हैं, बाबू हैं, व्यापारी हैं, अध्यापक हैं, लड़ना हमारा काम नहीं है.

इज़रायल का नाम आप ने सुना ही होगा. यहूदी कम पढे-लिखे नहीं होते. अनुपात के हिसाब से विश्व के सब से ज्यादा नोबल इसी कौम के नाम हैं. और भी प्राइज़ कम नहीं. संशोधन भी मौलिक होता है, बाकी अपने यहाँ के पीएचडी के दर्जे पर कुछ न कहना ठीक होगा. रही बात बिज़नस की तो उसमें भी उनका कोई सानी नहीं है.

लेकिन उनकी महिलाएं भी लड़ी. पुरुष को लड़ना तो अनिवार्य ही था, महिलाओं को भी ट्रेनिंग अनिवार्य है. कोई मज़ाक नहीं करती कि हमें कौन सा युद्ध लड़ना है जो हथियार चलाना सीख लूँ?

और हाँ, अगर आप पूछेंगे तो उनमें से कोई भी स्त्री-पुरुष आक्रमण करना नहीं चाहेंगे. लेकिन जहां देश के लिए लड़ना है वहाँ कोई यह नहीं कहेगा या कहेगी कि मेरे पिता को युद्ध ने मारा, अरबों ने नहीं. युद्ध बुरा है इस मुद्दे पर हर कोई इज़रायली हृदय से सहमत होगा लेकिन युद्ध से हाथ पीछे भी नहीं करेगा.

उनकी ट्रेनिंग कड़ी होती है, देखकर ही पसीने छूट जाएँ. आप से वो अपेक्षा नहीं की जा रही लेकिन एक बात अच्छे से समझ लीजिये कि पुलिस हर जगह नहीं पहुँच सकती.

एक तो आप के पास थाने का नंबर होना चाहिए, उसके बाद लगाने पर लगना चाहिए. उसके बाद आप को ठीक से बात समझानी आनी चाहिए (हड़बड़ी में यह भी नहीं होता बहुतों से) और उसके ऊपर उनसे सकारात्मक प्रतिसाद मिलना भी चाहिए.

जीप में कोई खराबी नहीं होनी चाहिए और थाने में पर्याप्त फोर्स और हथियार भी वर्किंग कंडिशन में होने चाहिए. नसीब से यह सब बातें हाँ में निकली तो फिर भी आप तक पहुँचने में अंतर और रास्ते की हालत यह सभी बातें हैं ही.

पुलिस नहीं पहुँच पाएगी यह मान ही लीजिये और स्वरक्षा में जुट जाइए. हाँ, पुलिस से संपर्क की कोशिश अवश्य कीजिये, नजदीक के लोगों से भी संपर्क करिए अगर वे आ सकें. लेकिन किसी से उम्मीद रखकर हाथ पे हाथ धरे न बैठें.

आप ने अगर कुछ हमलावर गिराए हों और भीड़ भागने लगे तो गोफन गुलेल चलाना न छोड़ें, यह देखें कि वे उन्हें उठाकर न ले जा पाएँ, वे आप के लिए सबूत हैं. पुलिस आएगी तब FIR के लिए उनकी जरूरत होगी, बहुत काम आएंगे. पुलिस उनकी शिनाख्त करे उससे पहले उनके फोटो निकाल लीजिये ताकि थाने में सेटिंग न हो पाये जो अवश्य की जाएगी.

अहिंसक होना और निरीह होना इन दोनों में फर्क तो समझती हैं ना आप?

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