मेकिंग इंडिया गीतमाला : माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की

‘दस्तक’, जो कि १९७० में आई थी, अपने समय की फ्लॉप फिल्मों में से एक थी. कई बार अपने समय से काफी आगे की कहानियां भी लेखक लिख डालते हैं, ‘दस्तक’ की कहानी आज पचास साल बाद के दौर में लोगों को आसानी से हजम होगी इसमें हमें शक है.

हमें इसका नाम इसलिए पता है क्योंकि कुछ दिन पहले एक बार मदन मोहन के गाने ढूंढे थे. आम तौर पर संगीतकार अच्छा संगीत देने और घटिया गाने के लिए जाने जाते हैं (अनु मलिक टाइप), लेकिन मदन मोहन ने ‘दस्तक’ फिल्म में एक अच्छा गाना गाया है.

इसी फिल्म के लिए मदन मोहन को नेशनल अवार्ड भी मिला था. मदन मोहन ने जिन फिल्मों में संगीत दिया है उनमें से ज्यादातर फ़िल्में फ्लॉप ही रही हैं, इसलिए संगीत के अलावा आज उन फिल्मों को कोई नहीं जानता. सन १९७० में ‘दस्तक’ के लिए अवार्ड मिलने के बाद से ही लोगों ने मदन मोहन को जानना शुरू किया होगा. उस से पहले वो भी जरूर गरीबी में ‘स्ट्रगल’ कर रहे होंगे.

फिल्म की कहानी एक फिल्म से भी तीस साल पुराने नाटक पर आधारित थी. सन १९४४ में आल इंडिया रेडियो के लाहौर स्टेशन से राजिंदर सिंह बेदी का एक नाटक प्रसारित हुआ था, ‘नक्ल-ए-मकानी’ जिसका मतलब होता है नए मकान में जाना.

फिल्म ‘दस्तक’ इसी नाटक का थोड़ा वृहद रूप है. जैसा कि नाम से ही जाहिर है, ये फिल्म एक नए मकान में जाने का किस्सा है. कहानी में अनोखी बात ये है कि नवविवाहित दम्पति जिस नए मकान में जाते हैं उसमें पहले एक तवायफ़ रहती थी. दरवाजे पर ‘दस्तक’ होती रहती है, और पत्नी जब भी दरवाजा खोलती है, तो कोई अजनबी, आगंतुक, एक तवायफ़ से मिलने ही आया होता है.

संजीव कुमार और रेहाना सुलतान अभिनीत ये फिल्म जब आई थी तो फिल्मों का वो दौर था जब पाश्चात्य वाद्ययंत्रों को लोग ज्यादा सुनना पसंद करते थे. ये आर.डी.बर्मन जैसे संगीतकारों का दौर था, लोग भारतीय रागों पर आधारित कुछ भी, कम ही सुनना पसंद करते थे.

‘दस्तक’ फिल्म के सभी गाने अच्छे हैं, मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गीत हैं तो अर्थपूर्ण कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी. राग जैत का एक स्वरुप राग जैतश्री आपने सुना होगा, ज्यादातर गुरुबाणी इस राग पर गई जाती है. ‘दस्तक’ का गाना ‘माई री मैं कासे कहूँ” राग जैत के ही दूसरे स्वरुप राग जैतकल्याण पर आधारित है. इसी फिल्म का एक दूसरा प्रसिद्ध गाना है, “बैंया ना धरो, ओ बलमा” जो कि राग चौरकेशी पर है.

कभी वक्त निकालिए तो इन्हें भी देखिये-सुनिए. क्या पता आप जितना सोचते हों, ये उनसे बेहतर ही निकले !

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