दूसरों के जाने हुए सत्य को ही आप अपना सत्य मान लेंगे?

ग्रन्थ क्या हैं? जाने हुए सत्य.
अब दूसरों के जाने हुए सत्य को ही आप अपना सत्य मान लेंगे?
ग्रंथों का महत्व सिर्फ इतना कि भाई, भरोसा रखो ऐसा कुछ होता है. बाक़ी सत्य का अन्वेषण तो खुद ही करना है.

कोई भौतिक जगत के विज्ञान का मामला तो है नहीं कि एक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का नियम खोज लिया और बात ख़त्म, अब मुझे ज़रुरत नहीं उसे खोजने की, फिजिक्स की किताब में पढ़ ली बात और समझ ली.

प्रत्येक व्यक्ति भिन्न है, सो उस तक पहुँचने के उसके तरीके भी भिन्न होंगे.
अगर नहीं तो फिर पढ़िए ग्रन्थ और पहुँच जाइए. लेकिन कितने पहुंचे आजतक ‘सिर्फ’ ग्रन्थ पढ़-पढ़ कर?

और अगर यही करना है तो ग्रन्थ पढ़ने जितना श्रम भी क्यों करना. आजकल शहर-शहर घूमते हैं प्रवचनकर्ता, उनको जाकर सुन लेने से भी प्राप्ति हो जाएगी. ये भी नहीं तो टीवी पर चल रही हैं बहुत सी दुकानदारियाँ.

सब खुद को बहलाने की बाते हैं, दूसरों को धोखा देते देते हम इतने माहिर हो गए हैं कि खुद को भी चकमा दे लेते हैं. कोई ग्रन्थ पढ़ लिया, गीता रट ली, किसी सत्संग में शामिल हो गए, किसी बाबाजी से दीक्षा ले ली और ऐंठ गए धार्मिक होने के गुरूर से.

कोई नहीं पहुंचा ‘सिर्फ’ ग्रन्थ पढ़ लेने से. यात्रा की शुरुआत में ये ग्रन्थ आश्वासन देते हैं कि शुरू करो सफ़र, ऐसा हो सकता है, हमें हुआ है. और यात्रा ख़त्म हो जाने के बाद ये आपके गवाह होते हैं…. बस….

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