अम्बर पर है रचा स्वयंवर फिर भी तू कतराए, तेरी दो टकिया दी नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये

तुम्हारी कमर की
घुमावदार उतराई पर
आज भी उतना ही संभलकर चलता हूँ
जितना उन दिनों
चला करता था
जब आँखों पर चश्मा नहीं था

और तुम मई की तपती छत पर
कमर में पल्लू खोंसकर
लाल मिर्च सुखाने आती थी
और मुझे खड़े खड़े हँसता देख
झूठ मूठ में रूठ जाया करती थी

तुम्हारा पल्लू कमर के बंधन से चुपके से निकलकर
मेरी छुपी कामना से बंध जाया करता था
और तुम अपने मिर्च वाले दोनों हाथ
उठाकर मेरी ओर इशारा करती

तुम्हारे पल्लू को दोबारा उन घुमावदार उतराई पर चढ़ाना
मेरा पसंदीदा शगल हुआ करता था

आज तुम्हें सुपर मार्किट से
पीसी मिर्च का पैकेट लाते हुए भी देखता हूँ
और आज भी तुम डिब्बे में मिर्च भरते हुए
उतनी ही शरारत से मुस्कुराते दिखाई देती हो

बस कमर की उतराई को तुमने ढँक दिया है
कुरते पर बनी हरी पत्तियों से..
लेकिन मेरा चश्मा ढँक नहीं पाया
उस छुपी कामना को
तो उसे बांहों के घेरे में लेकर
यही कहता हूँ

तुम चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाओ
मेरा प्रेम अब भी उतना ही प्राचीन और ग्रामीण है
और सुनो, बढ़ती उम्र के साथ इन्द्रियां भले शिथिल हो जाए
प्रेम कभी शिथिल नहीं होता

इसलिए दाल के छौंक से मुझे मिलावट के तीखेपन की नहीं,
सुगंध आती है हमारे शुद्ध प्रेम की
जो तुम्हारी ऊंगलियों की लहरियों से होते हुए
पहुँचती है मेरे जिह्वा की स्वादेन्द्रियों तक

मैं आज भी तुम्हारी देह की खुशबू को
उतनी ही तीव्रता से पहचानता हूँ
और नींद में भी तुम्हारी तरफ पीठ करने से रुक जाता हूँ

आँखों पर भले चश्मा चढ़ गया है
लेकिन बहुत देर तक जब आसपास दिखाई नहीं देती तो
झूठ मूठ की फरमाइश जारी कर आवाज़ लगा देता हूँ

अजी सुनती हो….

अजी सुनती हो…
और तुम चाय की प्याली थमाकर चली जाती हो
और मैं तुम्हारी कमर की उतराई पर ठहर सा जाता हूँ

कैमरे का खूबसूरत प्रयोग और मनोज कुमार की कल्पनाओं का संसार… रोटी कपड़ा और मकान. मनोज कुमार के पहले और मनोज कुमार के बाद साधारण से कैमरे का ऐसा उपयोग कहीं नहीं देखा.

फिल्म चाहे कोई भी हो एक ही सीन में एक तरफ कैमरा हिलता है तब तक दूसरी तरफ कलाकार का सीन बदल जाता है, कैमरे के हिलने के साथ सीन बिना कट हुए ही दूसरा सीन शुरू हो जाना दर्शकों के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता कि इन दो सीन के बीच वो कुछ और सोच सके.

कलाकारों के भाव के साथ परछाइयों का खेल कल्पनाओं की रंगीन दुनिया को साकार कर जाता है.

आधुनिक तकनीक और कम्प्युटर ग्राफिक्स से आज चाहे सीन को कितना ही भव्य बना लो हाय हाय ये मजबूरी-सा सावन और सावन में भीगी लड़की का प्रणय निवेदन नहीं रच सकता.

सावन की पहली बारिश, आसमान सा दूल्हा और प्रकृति सी दुल्हन का मिलन गीत है ये. जहां बादल की गर्दन से उतरते पसीने की बूँद को प्रकृति अपनी रेगिस्तान सी गर्म पीठ के सूखे कुँए से तिल पर अनुभव करती है, और प्रतीक्षा करती है कि कब ये बादल टूट कर बरसे और उस कुँए को फिर भर जाए….

आप भी देखिये, जीये और साथ में चाहे तो कोई और गीत गुनगुनाइये….. मोहब्बत बरसा देना तू सावन आया आया है……… लेकिन देखिये सिर्फ यही गीत, मनोज कुमार की अदाएं, ज़ीनत की नज़ाकत और कैमरे का जादू…

हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी

कितने सावन बीत गये
कितने सावन बीत गये बैठी हूँ आस लगाये
जिस सावन में मिले सजनवा वो सावन कब आये
कब आये
मधुर मिलन का ये सावन हाथों से निकला जाये

तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये

प्रेम का ऐसा बंधन है
प्रेम का ऐसा बंधन है जो बंध के फिर ना टूटे
अरे नौकरी का है क्या भरोसा आज मिले कल छूटे
कल छूटे
अम्बर पे है रचा स्वयम्वर फिर भी तू घबराये…

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