वामपंथियों की करतूतें, जो सबको पता होना चाहिए

भारत में वामपंथियों का 1917 के पहले कोई इतिहास नहीं है. ‘रूस में ज़ारयुग के पतन के बाद भारत में विदेशी हुकूमत की नौकरशाही के पतन के युग की शुरुआत हो चुकी है’ – 1917 में कलकत्ता में छपी एक राष्ट्रवादी पत्रिका दैनिक बसुमति में एक लेख इस शीर्षक के साथ आया था.

“अब हमारा समय आ रहा है, भारत भी मुक्त होगा, भारत के बेटों को सही और न्याय के लिए खड़ा होना होगा जैसा कि रूसियों ने किया है”… ये Home Rule League के पर्चों में लिखा था जिसका शीर्षक था “Lessons from Russia” – ये पर्चा मद्रास से उसी समय 1917 में प्रकाशित किया.

इसी के साथ रूस से प्रभावित एक नयी खेप का भारत में जन्म हुआ, जिसका नाम था “communism”

यूरोप में जन्मे कम्युनिज्म के सिद्धांतों से प्रभावित ये गुट यूरोप की तरफ भाग खड़ा हुआ और उसने उस ग्रुप से हाथ मिलाया जिसका नाम था Communist International यानी CI. इसके पहले नेता बन के उभरे M. N. Roy जो अमरीका और मैक्सिको होते हुए अंत में रूस पहुंचे.

इधर इस ग्रुप के लोग भारत के कलकत्ता, मद्रास, कानपुर, लाहौर में वामपन्थ के पर्चे बांटते थे और नारे लगाते थे. ये उभरते वामपंथी यहाँ से M. N. Roy को रिपोर्ट भेजते थे कि उनके आंदोलन और नारेबाजी से कम्युनिस्ट विचार कितना फ़ैल रहा है

भारत से आती इन रिपोर्ट्स और M. N. Roy के रूस के सर्वहारा तानाशाह के बीच संबंधों से उभरी – Party in Exile, जिसका नाम रखा Communist Party of India जिसको रूस में बनाया गया. इसको लेनिन का आशीर्वाद प्राप्त था और बाद में स्टालिन ने इनको बौद्धिक विचार प्रदान किये.

ये पार्टी शुरू से ही विदेशी कम्युनिस्ट्स संस्थानों के हाथों में खेलने लगी… इसके बाद इन लोगों ने पूरी तरह से विदेशी कम्युनिस्ट ताकतों को भारत में घुसाने के लिए वो सारे काम किये जिसको जानना लोगों के लिए जरूरी हो गया है…

1. कम्युनिस्टों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन को पूंजीपति और ‘फासीवादी’ ताकतों के सहयोग के रूप में वर्णन किया और इसलिए उन्होंने ब्रिटिश प्रयासों का समर्थन किया.

मतलब उन्होंने आज़ादी के आंदोलन में राष्ट्रवादियों की जगह अंग्रेज़ों का साथ दिया. इन्होने भारत को अंग्रज़ों द्वारा डोमिनियन स्टेट बनाये रखने के लिए चुनाव लड़ा और अंग्रेज़ों के साथ खड़े रहे.

2. कम्युनिस्टों ने ब्रिटिश शासन के समय प्रस्ताव दिया था कि वो भारत के कई टुकड़े करके बहुराष्ट्र की नीति पर चलना चाहते थे – उन्होंने जिन्ना के दो राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया और पाकिस्तान बनवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.

3. कम्युनिस्टों के लिए भारतीय राष्ट्रवाद बुर्जुआ राष्ट्रवाद है लेकिन उनके लिए रूसी / चीनी राष्ट्रवाद सर्वहारा राष्ट्रवाद है. ‘एक बार मार्क्सवादी कीड़ा किसी को काटता है, तो वह अपने अंदर के राष्ट्रवाद को ख़त्म कर देता है, अपने सभ्यता और विरासत से खुद को दूर करता है.’

4. जब से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) का जन्म 1920 के दशक के मध्य में हुआ था, तब से वह इस देश के पूर्व-इस्लामी अतीत पर मुस्लिम मस्तिष्क को भ्रमित कर रहा था और खूब सफल हुआ, कम्युनिस्टों के प्रचारित इन्ही सिद्धांतों के कारण भारत के विभाजन की भूमि तैयार हुई.

कम्युनिस्टों ने विवादास्पद आर्य आक्रमण सिद्धांत को जन्म दिया. इसके साथ-साथ द्रविड़ों के निष्कासन को दक्षिणी भारत तक समझाया. जबकि इसे पश्चिम के इतिहासकारों द्वारा मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा हिंदुओं का उत्पीड़न बताया था.

5. सीपीआई ने मुस्लिम सदस्यों को मुस्लिम लीग के रैंक में प्रवेश करने के लिए भेजा था (Pakistan: Military Rule or People’s Power by Tariq Ali, London 1970, page 31).

मुस्लिम लीग में पूंजीपतियों के गढ़ को मजबूत करने के लिए सीपीआई ने मुस्लिम लीग में प्रवेश किया था, ये स्तालिन के “theory of revolution by stages” (Ibid. Page 32) का पालन करने की एक योजना थी. पंजाब मुस्लिम लीग का घोषणापत्र प्रसिद्ध भारतीय कम्युनिस्ट वकील, डैनील लतीफी द्वारा लिखा गया था (Ibid.)

6. सीपीआई ने भारत के विभाजन का समर्थन करते हुए, हिटलर के खिलाफ ब्रिटिश युद्ध को मुस्लिम लीग के सहयोगी रवैये की सराहना की, जिसे ‘इंपीरियल वॉर’ कहा गया था. सीपीआई ने जर्मनी के खिलाफ अंग्रेज़ों का साथ इसलिए दिया क्योंकि सोवियत संघ के स्टालिन ने संसार भर के कम्युनिस्ट लोगों को हिटलर के खिलाफ जंग में कूदने को कहा था.

7. सीपीआई नेताओं ने जुलूस और प्रदर्शनों का आयोजन करके पाकिस्तान आंदोलन को समर्थन दिया था. ई.एम.एस. नंबूदरीपद और ए.के. गोपालन (दोनों सीपीआई के नेता थे) ने मुस्लिमों के साथ जुलूस का नेतृत्व किया, ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ और ‘मोप्लिस्तान जिंदाबाद’ चिल्लाकर नारे लगाए.

इसलिए आश्चर्य नहीं कि ख्वाजा अहमद अब्बास, जो स्वयं वामपंथी थे, उनका यह कहना था कि सीपीआई ने भारत को मार डाला था, क्योंकि इन्होने मुस्लिम अलगाववादियों को वैचारिक आधार प्रदान किया गया था (Pakistan: From Jinnah to Jehad by S.K.Datta and Rajeev Sharma, 2002, Page 18).

8. भारत का विभाजन हुआ लेकिन सीपीआई को सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करने के लिए कोई लाभ नहीं मिला. पाकिस्तान के मुस्लिम लीग सरकार ने पार्टी कार्यकर्ताओं का बुरी तरह से इलाज किया और वहां से उखाड़ फेंका. पाकिस्तान कम्युनिस्टों के साथ बहुत कठोरता से निपटा.

डॉ अशरफ और सज्जाद ज़हीर, जो भारत से पाकिस्तान गए थे, वहां कम्युनिस्ट आंदोलन को गति देने के लिए जेल में सीधे पहुंचे. जेल से बाहर निकलने में दस साल लग गए और उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया (Muslim Politics in India by Hamid Dalwai, Hind Pocket Books, page 58).

9. मार्क्सवादी इतिहासकार, जिन्होंने लंबे समय तक कांग्रेस के शासनकाल में स्कूल की पाठ्यपुस्तकों को लेखन में अपनी आधिकारिकता बनाए रखी थी, ने भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों की बर्बर भूमिका को ढंक दिया और हिंदुओं के खिलाफ उनकी कट्टरता को छिपा दिया.

वे हिंदू मंदिरों को तोड़ने को बर्बरता की बजाय आर्थिक आधार बताना पसंद करते थे. सांप्रदायिक मुसलमानों की विशिष्टतावादी और एकपक्षीय विचारधारा को सामाजिक समानता के लिए विचारधारा के रूप में पेश करते हुए उन्हें इस देश की सांस्कृतिक परंपरा को बदनाम करने में गर्व महसूस होता है.

यह हर दंगों के पीछे हिंदू राष्ट्रवादियों की निन्दा करते थे और उनके धार्मिक अनुष्ठान को मुख्य कारण बताते रहे. शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई, वामपंथियों ने अपनी आंखें बंद कर के शाहबानो मामले में कट्टरपंथियों का साथ दिया.

10. आज़ाद भारत में राजनीतिक पहचान के लिए मुस्लिम कट्टर सांप्रदायिक लोगों की शासन करने की आकांक्षा बरकरार रही. सीपीआई और सीपीआईएम दोनों ने भारतीय संघ मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) को राजनीतिक सत्ता का पर्याप्त हिस्सा देकर मुस्लिम सांप्रदायिक मानसिकता को समर्थन दिया.

केरल में आज़ादी के बाद नई कट्टरवादी AIML के साथ गठबंधन सरकार बनाया. उन्होंने मालाबार में नया मुस्लिम बहुसंख्यक जिला बनाने के लिए आईयूएमएल के साथ मिल कर काम किया और इसका नाम मल्लपुरम रखा (Communism in Indian Politics by Bhabani Sen Gupta, Columbia University Press, 1972,Page 188).

सन 1980 में भारतीय मुस्लिमों ने अफगानिस्तान के सोवियत कब्जे के खिलाफ यू.एस.ए. को नैतिक समर्थन दिया. सीपीआई और सीपीआईएम इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन रहे. उन्होंने नई सहस्राब्दी में अफगानिस्तान में तालिबान सरकार पर अमेरिकी हमले के खिलाफ अपने युद्ध के दौरान भारतीय मुसलमानों को पूरी तरह से समर्थन किया.

11. ये शुरू से ही हथियार माफिया रहे हैं. 1919-20 में सोवियत संघ के पक्ष में पठानों को लड़ने के लिए वामपंथी नेता M N Roy ही मास्को से ताशकन्द तक एक ट्रेन भर के हथियार लाया था. इन हथियारों का उपयोग पठानों ने भारत के पंजाबी हिन्दुओं का सफाया करने के लिए इस्तेमाल किया था.

12. पश्चिम बंगाल में 38 वर्ष तक मार्क्सवादी सरकार के शासन का रहस्य मुस्लिमों के चुनावी समर्थन के साथ है, जो मतदाताओं के करीब 25 प्रतिशत का गठन करते हैं.

1989 में मार्क्सवादी सरकार के पश्चिम बंगाल माध्यमिक बोर्ड ने 28 अप्रैल 1989 को circular जारी किया था 28 April 1989 (Number Syl/89/1), जिससे मध्यकालीन इतिहास काल के बारे में बहुत सारी चीजों को पुस्तकों से हटा दिया गया क्योंकि बंगाल के कट्टरपंथी मुस्लिम नहीं रखना चाहते थे (Islamization of Pakistan by Y.C.Ross, 2003, New Delhi, page 16-17).

अपने वोटों को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय हितों की कीमत पर बांग्लादेश से मुस्लिम घुसपैठ पर चुप्पी साधी रखी. पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट शासन ने बांग्लादेश से मुसलमानों की घुसपैठ की अनुमति दी थी.

यूपीए सरकार रहने तक मार्क्सवादी एक प्रॉक्सी सरकार की तरह कार्य कर रहे थे और यूपीए सरकार को मुस्लिमों को खुश करने के लिए केवल भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ किया और पतन कराया.

13. कम्युनिस्ट वही माफिया है जिसने बीसवीं और शुरुआती तीसवें दशक में स्वतंत्रता के लिए राष्ट्र की लड़ाई के खिलाफ युद्ध किया था, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारतीय पूंजीपतियों और जमींदारों की साजिश मानते-कहते रहे.

14. वामपंथी वो हैं जिन्होंने 1942 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ हाथ मिला लिया था और बड़े पैमाने पर ब्रिटिश संरक्षण पाया. 1942-45 के दौरान ब्रिटिश पुलिस के लिए ये देशभक्त आज़ादी के सिपाहियों के खिलाफ जासूसी और मुखबिरी करते थे.

15. आज़ादी की लड़ाई के समय गाँधी जी इन वामपंथियों के अंग्रेज़ों की दलाली से इतना तंग आ गए थे कि उन्होंने इनके नेता सीपी जोशी को चिट्ठी लिखी थी जिसका उसने बड़े बेहूदे तरीके से बेइज़्ज़त करते हुए जवाब दिया था. (Letter and Reply attached).

16. नेताजी सुभाष चंद्र बोस को वामपन्थी अपने लिए बड़ा खतरा समझते थे क्योंकि उनका मानना था कि अगर आज़ाद भारत नेताजी के हाथों से संचालित हुआ तो इनका कोई भविष्य नहीं है और भारत के विभाजन का इनका सपना भी ख़त्म हो जाएगा.

इसलिए अंग्रेज़ों के साथ मिलकर इन्होंने नेताजी के खिलाफ खूब दुष्प्रचार किया जो अंग्रेज़ों के पैसों से प्रायोजित था. इनके दुष्प्रचार और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से नफरत उस समय इनके द्वारा इनके ‘People’s War’ नामक पत्रिका में छापे गाये कार्टून में दीखता है. अगर कोई कम्युनिस्ट खुद को नेता जी का समर्थक बताए और उनको कम्युनिस्ट साबित करने की कोशिश करे तो ये बहुमूल्य सबूत उनके मुंह पर बिना झिझक फेंक दीजिये.

17. वामपन्थियों ने एक बहुत बड़ा दुष्चक्र 1959 में रचा था. इन्होने भारतीय सेना में अपने जासूस घुसाने और सेना में तोड़-फोड़ कराने का षड्यंत्र रचा था. इनके अनुसार सेना में दो फाड़ हो जाता और एक अंग को लेकर ये चीन की मदद से 1962 में सशस्त्र विद्रोह कर देते. फिर भारत पर इनके चेयरमैन माओ-त्से-तुंग का अधिकार हो जाता. फिर ये माओ के निर्देशन में भारत पर राज करते. (CIA notes/Document given to GOI – attached)

18. 1948 में आज़ाद भारत गणराज्य के विरूद्ध इन्होने हैदराबाद के निजाम और उसके रजाकारों के साथ हाथ मिलाकर सशस्त्र विद्रोह किया था. इन्होने तेलंगाना इलाको में एक सर्वहारा क्रांति के नाम पर 1948 से 1953 तक लगभग 2 लाख गरीब और निर्दोष किसानों को मरवा डाला था.

19. कम्युनिस्टों ने 1948 में श्री रामकृष्ण को समलैंगिक, स्वामी विवेकानंद को एक हिंदू साम्राज्यवादी, श्री अरबिंदो को एक युद्ध पिपासु, श्री रबींद्रनाथ टैगोर को एक दलाल, और स्वतंत्रता आंदोलन के दिग्गजों जैसे कि श्री सरदार पटेल को बिड़ला और टाटा के सूअर और हरामखोर जैसे शब्दों से बुलाया था.

20. कम्युनिस्ट वही माफिया गिरोह है जो चीन के समर्थन में खुले तौर पर बाहर आ गया था जब चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था, 1959 में दलाई लामा को अपने हजारों अनुयायियों के साथ निकाल दिया.

आखिरकार 1962 में खुद भारत पर आक्रमण किया. 1962 के चीन आक्रमण में वामपन्थियों ने चीन का साथ दिया… “बीजिंग नजदीक, दिल्ली दूर” का नारा लगाया.

कम्युनिस्ट वही माफिया गिरोह है, जिसने 1967-69 के मध्य से अपने अध्यक्ष के रूप में माओ-त्से-तुंग का स्वागत किया था, पश्चिम बंगाल और अन्य जगहों पर आतंकवाद और हत्याओं का अम्बार लगा दिया, और मारे हुए पुलिसकर्मियों के सिर के साथ फुटबॉल खेला था.

भारतीय जनता को इन वामपन्थियों के हर षड्यंत्र, सोच और ऐतिहासिक कर्मों के बारे में पता होना चाहिए… जिससे लोग इनके बहकावे में न आएं और देश के समझदार नागरिक और राष्ट्र प्रहरी बने रहे…

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