आंखों में आँखें डाल कर सच कहने का दम हरएक के सीने में नहीं होता…

जुलाई, 2012 की घटना है. दिल्ली में दरियागंज के पास सुभाष पार्क मेट्रो स्टेशन निर्माण के खुदाई के दौरान मुग़ल काल के एक मस्जिद का अवशेष निकला. जामा मस्जिद के पास का इलाका था सो खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई और घंटे भर के अंदर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा.

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बताया जाने लगा कि यह मस्जिद शाहजहां की बीबी अकबराबादी बेगम के नाम से बनवाई गई थी जिसे 1857 के ग़दर में अंग्रेजों ने तुड़वा दिया था. ऐतिहासिकता निकलते ही वहां स्थानीय मुस्लिम नेता और विधायक भी जुटने लगे.

इकट्ठी भीड़ ने वहां नमाज़ भी पढ़ी और स्थानीय विधायक शोएब इकबाल ने फ़ौरन प्रधानमंत्री और दिल्ली की मुख्यमंत्री से यह मांग कर दी कि इस ऐतिहासिक मस्जिद का पुनर्निर्माण कराया जाए और मेट्रो के रास्ते को बदला जाए.

जब इतना कुछ हो गया तो विश्व हिन्दू परिषद् और कुछ और हिन्दू संगठन हरकत में आये और जनाक्रोश को देखते हुए सरकार शोएब इकबाल की मांग को पूरा करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी.

ये विषय उलझ गया तो मस्जिद पुनर्निर्माण की मांग में लगे मुस्लिमों को किसी ने बताया कि संघ के एक बड़े नेता इन्द्रेश कुमार मुस्लिमों के बीच ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ नाम की संस्था बनाकर काम कर रहे हैं, इसलिए आपको मस्जिद पुर्ननिर्माण के विषय को लेकर उनके पास जाना चाहिए.

कुछ मुस्लिम नेताओं का प्रतिनिधि मंडल इन्द्रेश जी से मिला और उनसे कहा, ‘भाई साहब, देखिये खुदाई के दौरान बादशाह शाहजहां की बनवाई ऐतिहासिक मस्जिद का अवशेष निकला है तो क्या मेट्रो का रास्ता बदल कर वो जगह हमें मस्जिद निर्माण के लिए नहीं दे दी जानी चाहिए? इस विषय पर हम आपकी मध्यस्थता चाहते हैं’.

इन्द्रेश कुमार ने छूटते ही कहा, बिलकुल दे दी जानी चाहिए. प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के चेहरे खिल उठे तो इन्द्रेश कुमार ने उनसे कहा, परन्तु एक समस्या है.

प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने पूछा, क्या समस्या है?

इन्द्रेश जी ने कहा कि जब मस्जिद के लिए वो जगह आपको देने की बात करने मैं हिन्दुओं में जाऊँगा तो वो मुझसे कहेंगे, भाई साहब, आप खुदाई में निकली मस्जिद के अवशेष को देखकर मुस्लिम बंधुओं को वो जगह देने की बात कर रहे हैं तो फिर ऐसी ही स्थिति तो अयोध्या में भी है जहाँ रामलला जन्मस्थान पर प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं, तो वो जमीन हमें मिलनी चाहिए.

इन्द्रेश जी की ये बात सुनकर प्रतिनिधिमंडल के सदस्य खीसें निपोरने लगे, भाई साहब, ये कैसे, वो कैसे… वो तो मंदिर वाला क्या है कि विवादित मसला है… मामला कोर्ट में है… फिर हम कैसे… हें. हें. हें….

इन्द्रेश जी ने उनसे कहा, ‘अगर कहीं पर खुदाई में मस्जिद का अवशेष मिले तो वहां तो मस्जिद जरूर बननी चाहिए चाहे इसके लिए मेट्रो का रास्ता ही क्यों न बदलना पड़े पर अगर खुदाई में कहीं से मंदिर का अवशेष निकल आये तो हम वहां मंदिर नहीं बनने देंगे, ये दोहरापन नहीं चलेगा.

जो लोग अपने पूर्वज और राष्ट्रपुरुष के जन्मस्थान के सम्मान के लिए खड़े नहीं हो सकते वो और किसके लिए खड़े होंगे? जो लोग आज तक ये नहीं तय कर पाये कि उनकी पहचान राम से है या किसी आक्रान्ता बाबर से उनके क्या वार्ता की जाए और क्या समझाया जाये?’

प्रतिनिधिमंडल के सदस्य अपना सा मुंह लेकर वहां से लौट आये. आँखों में आँखें डाल कर सच कहने का दम हरएक के सीने में नहीं होता, इसके लिये इन्द्रेश कुमार बनना पड़ता है जो आसान नहीं है.

इन्द्रेश कुमार का सारा जीवन ऐसे ही अकल्पनीय गाथाओं से गुथा हुआ है. बिना डरे सीधा संवाद, कश्मीर का आतंकवाद, हजरत बल पर हुई सैनिक कारवाई, माथे पर तिलक और पृष्ठभूमि संघ प्रचारक की, मुस्लिम दरगाह पर अपनी रीति और अपनी भाषा में अपने माबूद के इबादत की ज़िद इन सबको मिलाइए और बताइए कि पूरी दुनिया में पिछले 1437 सालों के इस्लाम के इतिहास में किसने मुस्लिमों से या फिर उनके बीच जाकर उनसे ऐसे प्रश्न किये हैं?

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