कब से लग रहा है चूना भारत को – 1

साल था 1983, भारत चाहता था कि विदेशी कंपनियां भारत के शेयर बाजार में निवेश करें. मॉरीशस ने इसके लिए एक प्रस्ताव रखा.

प्रस्ताव के मुताबिक़ एक टैक्स संधि की जाए, आप हमारे यहां के इन्वेस्टर को कैपिटल गेन टैक्स से छूट दीजिये और हमारी कंपनियां आपके यहाँ निवेश करेंगी.

(3 साल से पहले शेयर बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन लगता है जो टैक्सेबल है, और 3 साल की अवधि के बाद बेचने पर लॉन्ग टर्म जो भारत मे पूरी तरह कर मुक्त है).

तो 1983 में ये संधि अस्तित्व में आई और हस्ताक्षर किए तत्कालीन वित्त मंत्री, आज के माननीय राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने, और भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश शुरू हुआ.

1989 में भारतीय कम्पनियों और लोगों (?) के कहने पर मॉरीशस ने अपने यहां आने वाले पैसे का सोर्स पूछना और उनकी कमाई पर कैपिटल गेन टैक्स लगाना बन्द कर दिया, जिससे वहां पैसा आये.

अब क्या था, भारत से पैसा हवाला के जरिये बाहर कहीं भी जाता, वहां से मॉरीशस की किसी फाइनेंस कंपनी में लगाया जाता, वो कम्पनी यहां शेयर मार्केट में निवेश करती.

चूंकि इन लोगों के हाथ मे बहुत ज्यादा पैसा था तो शेयर बाजार को अपने अनुसार प्रभावित कर सकती थीं, मोटा मुनाफा बनता जिस पर भारत सरकार कोई टैक्स नहीं लगा सकती थी, और मॉरीशस में भी नहीं देना था.

भारत के नेता, व्यापारी, सरकारी ऑफिसर, जिसके पास भी कैश इकट्ठा हो, बस वो इसी चैनल का उपयोग कर और ज्यादा टैक्स फ्री पैसा बनाता रहा. यहां तक कि भारत मे आतंक फैलाने वाले भी इसी तरह पैसा वहां भेजकर और कमाकर और आतंक फैलाते रहे.

2008 तक ये बदस्तूर जारी था. 2008 में किसी ने एक जनहित याचिका कोर्ट में लगाई तो इसकी समीक्षा की बातें शुरू हुईं.

तत्कालीन सरकार के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में ये एजेंडा शामिल था, 2011-12 में संधि को दुबारा संशोधित करने की बहुत अफवाहें थीं पर कुछ नहीं हुआ.

2012 में मॉरीशस सरकार ने इस संधि को यूं ही चलाते रहने की एवज में भारत को उनके 2 द्वीप गिफ्ट करने की भी पेशकश की थी, जिसका क्या हुआ पता नहीं (हो सकता है कि किसी बड़े भारतीय के कब्जे में हो अब वो द्वीप, बैक डोर से).

2014 में मोदी सरकार आई और इस ओर ध्यान दिया गया. 11 मई 2016 को मोदीजी ने मॉरीशस सरकार के साथ संशोधित टैक्स ट्रीटी साइन की.

इसके अनुसार 1 अप्रैल 2017 से, इस तिथि के बाद हुए निवेश पर भारत में लगने वाले टैक्स का 50% वहां की कम्पनियों को देना होगा, और मॉरीशस वहां पहुंचने वाले पैसे के सोर्स का भी ब्यौरा देगा.

ऐसे पता नहीं कितने तरीके और हैं जिनको ढूंढना बाकी है…

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