सबसे विकट समस्या, कि पता ही नहीं क्या है कश्मीर समस्या

कक्षा दस की एनसीईआरटी में पढ़ाया जा रहा है कि भारत एक ‘फेडरल स्टेट’ है और फेडरल स्टेट में केंद्र और राज्यों के मध्य शक्ति का असमान रूप से विभाजन होता है. चूँकि केंद्र सभी राज्यों को एक समान शक्ति वितरित नहीं करता इसलिए भारतीय संघ में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है.

फेडरेशन को समझाने के लिए इस प्रकार का मूर्खतापूर्ण उदाहरण यूपीए के कार्यकाल में योगेन्द्र यादव की सलाह पर एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में लिखा गया है.

नरेन्द्र मोदी सरकार इसे बदलने का प्रयास तक करने की इच्छा नहीं रखती. ये क्या पागलपन है? फेडरलिज़्म का उदाहरण कश्मीर कैसे हो सकता है?

किसी गरीब राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देकर कहा जाये कि फेडरेशन में ऐसा होता है तो बात समझ में आती है लेकिन कश्मीर जो कि सीधा-सीधा आपके चचा की मूर्खता का फल है वो फेडरेशन का उदाहरण कैसे हो सकता है?

ये सीधे तौर पर जवाहरलाल की कारस्तानियों पर पर्दा डालने की कोशिश है. कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा इसलिए मिला क्योंकि जवाहरलाल इस मसले को बेवजह संयुक्त राष्ट्र ले गए थे.

कायदे से जिसको आप जम्मू और कश्मीर कहते हैं, वह पूरा भूभाग आपके कब्जे यानि फेडरेशन में ही नहीं है.

कश्मीर की पूरी कहानी बच्चों को क्यों नहीं बताई जाती? क्यों नहीं बताया जाता कि कश्मीर का अपना संविधान और अपना अलग झण्डा होने के पीछे की कहानी क्या है?

जिस प्रकार से राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में अंतर पूछ के लोगों की देशभक्ति जाँची जाती है, उसी प्रकार एक सर्वेक्षण कराइये न ताकि पता तो चले कि सवा सौ करोड़ में से कितने लोग कश्मीर के इतिहास से परिचित हैं.

आपको लगता है कि इस तरह की शिक्षा देकर आप कश्मीर का मसला सुलझा लेंगे? तब तो AFSPA पर भी सियापा क्यों करने देते हैं? कह दीजिये कि ये भी फेडरल स्ट्रक्चर को बनाये रखने का उपकरण है. यथार्थ यह है कि अफस्पा न होता तो पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति भी आज कश्मीर जैसी होती.

यहाँ एक बड़ी विकट समस्या है कि शासन और जनता को ये पता ही नहीं है कि कश्मीर की समस्या वस्तुतः क्या है. कश्मीर को कई दृष्टिकोण से देखा जा सकता है किंतु उसका स्थाई समाधान किसी एक कोण से ही निकलेगा.

यदि आप इसे राजनैतिक समस्या मानते हैं तो अनुच्छेद 370 हटाइये अथवा जब तक ‘बहुमत’ नहीं है तब तक कम से कम इस मुद्दे को हवा पानी दीजिये.

यदि आप कश्मीर को सैन्य समस्या मानते हैं तो अन्य समस्त विकल्पों को तिलांजलि देकर सेना को सशक्त बनाइये और अपारंपरिक युद्ध की चुनौती स्वीकार कीजिए. तब ये नहीं चलेगा कि उन्होंने हमारे दो मारे तो हमने उनके दस मारे.

जब स्थाई सैन्य समाधान निकलेगा तब मल्टीपल सर्जिकल स्ट्राइक होंगी और होविट्ज़र तोपें गरजेंगी. उस समय हुर्रियत फुर्रियत और कश्मीरियत, बिना मुरौव्वत सबको डण्डा डाल के टांग देना पड़ेगा.

यदि आप कश्मीर को डेमोग्राफी की समस्या मानते हैं तो तत्काल प्रभाव से निर्वासित पण्डितों को पुनः बसाइये. इस पर जो चिल्ल पों करे उसको शांत कीजिए.

यदि इस्लाम या इस्लामीकरण समस्या है तो इस्लामीकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा स्वीकार करते हुए आतंकवाद को परिभाषित कीजिए और इस्लामीकरण के विरुद्ध कानून बनाइये. आतंकवाद को परिभाषित करने का सुझाव तो कई समितियां दे चुकी हैं.

यदि आप कश्मीर को अटल जी की मानसिकता से परखते हैं तो फिर यह भूल जाइये कि कभी कोई समाधान निकलेगा. मैं अटल जी के लिए कभी अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं करता, न ही उन्हें कमजोर नेता मानता हूँ.

लेकिन आज की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि अटल जी द्वारा परिभाषित कश्मीरियत की शरण में नतमस्तक होकर अपने वीर सैनिकों का बलिदान न्योछावर कर दिया जाये.

वास्तविकता यह है कि कश्मीर एक ‘भूराजनैतिक’ (geopolitical) समस्या है क्योंकि इसकी भौगोलिक स्थिति चार देशों का भविष्य निर्धारित करती है: भारत, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान.

कश्मीर वह धुरी है जिसके गिर्द दक्षिण एशिया में शक्ति सन्तुलन का स्थायित्व निर्भर करता है. मुझे नहीं पता कि इस सत्य को भारत का सत्ता प्रतिष्ठान किस सीमा तक स्वीकार करता है.

हाँ इतना अवश्य है कि आज के समय में भूराजनैतिक सन्तुलन किसी महान कहलाने वाले सिकन्दर की सेना द्वारा स्थापित नहीं होते.

भूराजनैतिक समस्याएं सुलझने में कई दशक लग जाते हैं. इन दशकों में हमें अपने समाज में ऐसे चिंतक-विचारक-रणनीतिज्ञ उत्पन्न करने हैं जो कश्मीर जैसी समस्याओं पर अपनी मेधा का सदुपयोग कर सकें.

इसके लिए आवश्यक है कि थिंक टैंकों में स्कूल कॉलेज से ही सीधी भर्ती की जाये. ऐसे बच्चे सामने आएं जिनकी तार्किक क्षमता विलक्षण हो, उन्हें कूटनीतिक मसलों की पर्याप्त समझ हो.

आज यह स्थिति है कि आप मास्टर्स किये हुए व्यक्ति को दस हजार देकर महीने में दो पेपर लिखने के लिए थिंक टैंक में रख लेते हैं. ये वही हैं जो स्कूलों में फेडरलिज़्म का अर्थ कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा पढ़ कर आये होते हैं.

जबकि आज हमें झबरे बालों वाले आइंस्टीन की ही नहीं, सूट-बूट में तीक्ष्ण बुद्धि वाले किसिंजर और बर्ज़ेजिंस्की की भी जरूरत है जो धरती की प्रयोगशाला में रणनीति के अविष्कार कर सकें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY