जिन शिक्षकों पर मूल्याकंन का दायित्व है, उनके परीक्षण की कहीं कोई योजना नहीं

बिहार में 65% छात्र फेल हो गये… 2017 का टॉपर गणेश; 2016 की रूबी रॉय की तरह फिर से धरा गया… अनेकराज्यों में छात्र खुलेआम नकल कर रहे हैं… शिक्षक किस तरह कॉपी चेक करते है कि जो छात्र फेल हो जाते है उनकी कॉपी दोबारा जांचने पर 96% तक अंक आ जाते है.

8वीं में पढ़ने वाले छात्र 2री कक्षा की हिंदी, गणित, अंग्रेजी को बमुश्किल पढ़ पा रहे हैं. स्कूलों में सरकार नित नये प्रयोग कर रही है… पढ़ाई छोड़कर सारे काम शिक्षकों से करवा रही है… शिक्षा अधिकारी केवल आंकड़े भरने मे लगे है…

यूपी में पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी राजनेताओं, IAS अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढेंगे… उस आदेश का क्या हुआ कोई नहीं जानता… हां जिस शिक्षक ने ये याचिका लगाई थी उसे अखिलेश सरकार ने बर्खास्त कर दिया था… आज वो शिक्षक किस हाल में है कोई नहीं जानता.

सरकारी स्कूल होने के बाद भी हमारे देश के राजनेता, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, सांसद-विधायक निजी स्कूलों का उद्घाटन बड़ी शान से करते हैं. और अपने बच्चों को उन्हीं निजी स्कूलों में भर्ती कर अपने ही विभाग की ‘सौत’ को बड़ी बेशर्मी के साथ बढ़ावा देते हैं, जबकि पहली ‘ब्याहता पत्नी’ कुपोषण का शिकार है.

शिक्षकों की एक बार भर्ती होने के बाद उनकी योग्यता का न तो कहीं कोई परीक्षण किया जाता है, न उसके आधार पर प्रमोशन दिया जाता है. जबकि सेटिंगबाज, चापलूस और राजनेताओं के चमचे आरामदायक जगहों और पदों पर जमे हुए है… कई राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की खुद की योग्यता और इतिहास संदिग्ध रहा है और वे अनेक विवादो मे फंसे है…

एक राज्य की शिक्षा मंत्री ने तो जीवित एपीजे अब्दुल कलाम की तस्वीर को ही माला पहना दी थी उस घटना के कुछ दिन बाद ही “मिसाईल मेन” देह छोड़ गये… व्यापम घोटाले के कारण मप्र के एक पूर्व शिक्षा मंत्री भी लंबे समय तक न्यायिक हिरासत मे रहे… हरियाणा में भी एक पूर्व मुख्यमंत्री शिक्षक भर्ती घोटाले के कारण जेल में है और जेल में रहकर ही उन्होने 10वीं की परीक्षा हाल ही में पास की है… मतलब जो व्यक्ति खुद 10वीं पास नहीं था वो पूरे राज्य के शिक्षकों की भर्ती और शिक्षा नीति तय कर रहा था…

बिहार में भी लालू के दो 9वीं फेल अनपढ़ बेटे पूरे राज्य का शासन चला रहे हैं, बड़े बड़े अधिकारी और शिक्षाविद् उनसे निर्देश लेते हैं, राबड़ी देवी भी बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी है, जिनकी शैक्षणिक योग्यता पूरा देश जानता था.

सरकार के सौतेले व्यवहार के कारण सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार घट रही है. कई स्कूल बंद होने की कगार पर पहुंच गये हैं. कई राज्यों में शिक्षकों की भर्ती बंद करके शिक्षामित्र, पैराटीचर, शिक्षाकर्मा, शिक्षादूत जैसे नित नये नामों से शिक्षकों की भर्ती करने की औपचारिकता पूरी की जा रही है…

छात्रों के मूल्याकंन की नित नयी विधियां खोजी जा रही है और उन्हें स्कूलों में थोपा जा रहा है जबकि जिन शिक्षकों पर मूल्याकंन का दायित्व है उनके परीक्षण की कहीं कोई योजना नहीं है… अनेक ऐसे शिक्षक भी है जिन्हें खुद अंग्रेजी लिखना पढ़ना नहीं आती… न प्रतिशत निकालना आता है… यूपी बिहार के स्कूलों के एक वीडियो में दिखाया गया था कि वहां के शिक्षकों को संडे मंडे की स्पेलिंग और देश प्रदेश की राजधानी और मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री तक के नाम नहीं पता थे.

फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी और अनेक देशों में राष्ट्रपति और चपरासी के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं जबकि वे पूंजीवादी देश है… जबकि हमारा देश जो 70 साल बाद भी अपने ही बच्चों के लिये एक समान शिक्षा नीति लागू नहीं कर पाया है उस देश का संविधान ‘समाजवाद’ और ‘समानता’ का ढोल पीटता है… पूरी दुनिया में इससे बड़े मज़ाक और दोगलेपन का दूसरा उदाहरण मिलना असंभव है.

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