नेताओं का रसूलीकरण

गाँधी की लिखी ‘हिन्द-स्वराज’ मेरी जानकारी की सबसे छोटी किताबों में से एक है. ऐसा माना जाता है कि एक सफ़र के दौरान कुछ ही दिनों में उसे लिख डाला गया था.

सवाल जवाब के तौर पर लिखी गई इस किताब को लिखने का स्टाइल देखें तो ये संस्कृत के ग्रंथों, या खास तौर पर उपनिषदों के लिखने के तरीके से मिलता जुलता है. एक व्यक्ति सवाल कर रहा है और दूसरा जवाब दे रहा है, तर्क वितर्क जारी रहता है.

इस तरीके से लिखने पर विरोधियों (वामपंथी धर्मावलम्बियों पढ़िए) को अनर्गल प्रलाप करके विषय भटकाने का मौका नहीं मिल पाता.

ये किताब आजादी के समय के नेताओं पर लिखने पढ़ने वालों के लिए इसलिए जरूरी हो जाती है क्योंकि इसमें कई बार जवाब जिसे दिया जा रहा है वो उस काल के ‘गर्म दल’ के नेताओं जैसा लगता है.

कई विद्वानों का मत है कि इसमें से कुछ जवाब सीधा तिलक और सावरकर जैसे लोगों के भगवद्गीता या हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को लेकर विचारों पर हैं. ये ध्यान देने लायक होता है. उस समय में भाष्य और टीका दोनों तरीके प्रचलन में थे.

इन तरीकों से भगवद्गीता पर श्री अरविन्द ने भी लिखा था और तिलक ने भी, जिनसे गांधी की पूरी सहमति नहीं थी. उनके हिसाब से ये भगवद्गीता का पूरा मतलब नहीं समझाती थी.

गाँधी ने दो बार गीता पर बोला-लिखा था. उन दोनों में कम से कम दस साल का अंतर तो है ही. अगर नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च के बारे में पढ़ें तो भी दिखता है कि कई सत्याग्रही उसमें हाथ में भगवद्गीता लिए शामिल बताये गए हैं. लम्बे अभ्यास के लिहाज से भगवद्गीता पर गाँधी का कहा भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

अपनी हिन्द स्वराज की प्रस्तावना गाँधी ने दो बार लिखी है. दोनों बार उन्होंने हिन्द स्वराज में कही अपनी बातों का अक्षरशः समर्थन किया है. केवल एक शब्द जहाँ वो संसद को वेश्या कहते हैं, वहां उन्होंने वेश्या शब्द को बदलने की मंशा जताई (मगर सचमुच नहीं बदला).

इस लिहाज से ये माना जा सकता है कि गांधी अपने हिन्द स्वराज वाले मतों के अपने अंतिम समय तक (करीब तीस-चालीस साल बाद) भी मानते थे. ये जानने के बाद अगर हम हिन्द स्वराज पर नजर डालें तो दिखता है कि उसका एक हिस्सा रेलवे और ट्रेन पर था.

इस हिस्से में गाँधी ट्रेन के घनघोर विरोधी थे. अगर मेरे भारत के लिए टूरिस्ट ट्रेन चलाने, पर्यटकों के लिए थोड़ी ज्यादा सुविधा और पूरे भारत का पर्यटन जैसे विचारों से उसे मिला कर देखें तो जैसे हम ढेर सारी ट्रेन और ज्यादा सुविधाओं के पक्ष में होते हैं, गाँधी उसका ठीक उल्टा सोचते थे.

वो ट्रेन को हज़ार बीमारियों की जड़, नुकसानदेह और ना जाने कैसी-कैसी बुराइयों की वजह कहते थे. अगर आप चिकित्सा सेवा के बारे में उसी हिन्द स्वराज में गाँधी के विचार देखें तो वो डॉक्टर भी नहीं रहने देना चाहते थे.

अब सोचिये कि अगर हम आज ट्रेन और डॉक्टर / मेडिकल की पढ़ाई को ख़त्म करने की वकालत करने लगें तो क्या होगा? सबसे पहले तो लोग हमें पागल समझेंगे, फिर गाँधी का हवाला देने पर शायद रुक जाएँ.

अगर सोचें कि उनकी बातें माननी चाहिए या नहीं तो यही समझ में आता है कि उनकी बातें शायद देश-काल के हिसाब से सही रही होंगी. लेकिन आज समय बदल गया है और वही सारी बातें जैसे की तैसे लागू कर डालना मूर्खता होगी.

अगर गांधी ने अपने विचार 1910 से 1950 में नहीं बदले तो इसका ये मतलब नहीं कि 2020 में हम उन्ही को लागू करें.

उनकी या उनके समकालीन नेताओं की कई बातें आज भी प्रासंगिक हो सकती हैं. लेकिन ज्यादातर को आज सिरे से ख़ारिज करना पड़ेगा. विवाद ठीक इसी ख़ारिज करने पर होता है.

अलग-अलग समय के नेताओं को लोग आक्रमणकारी मजहबों के प्रभाव से रसूल बनाने लगे हैं. उनका कहा पत्थर की लकीर माना जाने लगा है.

अपने समय के हिसाब से ये सारे नेता अड़ियल नहीं, बिलकुल लचीले थे, लेकिन गांधीवादी, अम्बेडकरवादी, माओवादी, मार्क्सवादी, सब के सब अड़ियल होते ही हैं.

संज्ञा के साथ जुड़े ‘वादी’ शब्द से ही आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि ये आदमी विवादी होगा जो हर बात को विवादित करने के प्रयास में जुटा होगा.

किसी और देश, किसी और काल के नेताओं के बयानों को आज पत्थर की लकीर मानना भी बंद किया जाना चाहिए. हमें नेताजी के रसूल बनाए जाने पर भी सख्त आपत्ति है.

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