नेताओं का रसूलीकरण : समाज विखंडन का सुगठित षडयंत्र

आप ने देखा होगा कि लोग मुसलमानों से आमने-सामने बहस को कतराते हैं. कारण पूछकर देखिये, अक्सर यही निकलेगा कि बात उसके पक्ष में नहीं जा रही है तो वो अपनी बात की पुष्टि में मजहब को ला सकता है कि ‘ऐसा इस्लाम का कहना है’.

वो सच बोल रहा हो या झूठ, अल्लाह ही जानता है, लेकिन उसके विपक्षी को तो कुछ भी पता नहीं है और उसे इतना ही समझ में आता है कि ये आदमी अपने मजहब का हवाला देकर मेरा नुकसान कर रहा है.

[नेताओं का रसूलीकरण]

स्वाभाविक रूप से उसकी प्रतिक्रिया संयत नहीं रहती. यहाँ इसी बात का इंतजार हो रहा होता है. ‘तौहीन’ की आवाज बुलंद हो जाती है और यह बेचारा समझता है कि उसको मुश्किल में डाला गया है.

पाकिस्तान में तो जब ईशनिन्दा कानून की सख्ती चरम पर थी तो मज़ाक हुआ करता था कि काफिर का कुछ हड़पना है तो चार मोमिनो के सामने उस पर ईशनिन्दा का इल्जाम लगा दो. उसे अपने को बेकसूर साबित करने चार मोमिन गवाह लाने होंगे… बाकी की कहानी आप समझ ही गए होंगे.

यहाँ यह होता है कि बात में जानबूझ कर मजहब को लाया जाता है और खुद को सुनाई गई कड़वी बात को मजहब या रसूल की तौहीन बताया जाता है. कुरआन के पन्ने फाड़कर रखना आदि स्टंट्स याद ही होंगे? ऐसी ही हरकतों से दहशत पैदा की जाती है.

यह तो Standard Operating Procedure है, लेकिन इसके साथ यह भी दिखाई दे रहा है कि अन्य राजनैतिक दल भी यही हथकंडे अपनाने लगे हैं.

हर कोई अपने स्वर्गवासी या जीवित नेता को परमआदरणीय – पूजनीय बताता है. यहाँ तक किसी को कोई एतराज नहीं, आप की इच्छा…

तकलीफ इस बात से है कि आप अपनी हर मांग उनकी बातों से जोड़ते हो, आप के अरमान उनके स्वप्न बताए जाते हैं और नकारने पर आप उनके अपमान की दुहाई दे कर हिंसा पर उतरते हैं या उतारू हो जाते हैं.

कुछ नहीं तो नेता महान का चित्र फटा मिल जाता है, श्रद्धेय के पुतले को जूते पहनाए मिल जाते हैं और यह कोई नहीं पूछता कि वह जगह वैसे तो कोई वीरान बियाबान नहीं है, लोगों का आना-जाना है कोई ये कब कैसे कर पाया? कोलाहल में ये प्रश्न दब जाते हैं, या दबाये भी जाते हैं.

हर किसी का नेता विश्लेषण या आलोचना या से परे है, सवाल करना तौहीन है. हर कोई अपने नेता का रसूलीकरण कर बैठा है, कुछ सवाल किया तो खबरदार! तौहीन है, बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

इसमें यह भी विश्लेषण करने योग्य बात है कि इनमें से कौन हैं जिनको मुसलमान अपने इस्तेमाल के लिए साथी बनाए हैं.

खैर, कोई भी बात की अति हो जाती है तब क्या होता है, सब जानते हैं. भारत की संस्कृति जानने की रही है, और जानने के लिए सवाल पूछे जाते आए हैं, पूछे जाते रहे हैं और पूछे जाते रहेंगे.

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है तथा संगति के गुण-दोषों के बारे में मुहावरे हर भाषा में पाये जाते हैं. अक्सर बहुतों का सार यह होता है कि अच्छे की संगत में सुधारने की आशा में बुरे को उसके साथ रखा जाए तो अच्छा ही बुरे गुण उठाता है.

जैसे मराठी में जो मुहावरा है वहाँ उजले सफ़ेद लेकिन मरखने बैल की जोड़ी में एक शांत स्वभाव का नारंगी बैल बांधा जाता है. भोले बांधने वाले की आशा है कि नारंगी बैल का रंग उजला हो. रंग तो नहीं बदलता लेकिन वो शांत न रहकर सफ़ेद बैल जैसे मरखना बन जाता है.

जहां मनुष्यों में संगतिदोष की बात करें, वहाँ अच्छे लोग बुरे को सुधारने उनके साथ जाये या न जाएँ, बुरे तो सोच-समझ कर अपना निशाना ढूंढकर उनके साथ खुद को जोड़ लेते हैं, उनको अपना हथियार बनाते हैं.

काम हो जाने पर हथियार को त्याग दिया जाता है लेकिन उसके दिए घाव तो नुकसान कर ही देते हैं. वह भी दीर्घकालिक या कभी-कभी स्थायी भी.

“रोक नहीं सकते” यह कारण है या बहाना, यह सोचिए. क्या उनके बीच कोई उनकी कुरीतियों की चर्चा कर सकता है? हमें भी शक्ति से ही उनको खदेड़ना चाहिए.

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