गंगा की सफाई के लिए जैविक विधि ही है एक मात्र उपाय

अपने विषय को प्रारम्भ करने के पूर्व मैं अपना परिचय और पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता हूँ जिससे इस पर विचार अभिव्यक्त करने का मेरा अधिकार स्थापित हो सके.
मैं 1978 का डिग्री धारक यांत्रिक अभियंता हूँ जो 1980 से सिंचाई विभाग उत्तर प्रदेश में कार्यरत रहा हूँ और अब मुख्य अभियंता नलकूप पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रूप में मेरठ में पदासीन हूँ. अब मेरी सेवा के आठ महीने शेष बचे हैं.

गंगा की सफाई में भारत सरकार और प्रदेश सरकार अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है और कोई नतीजा नहीं प्राप्त हुआ है.

हमें अपनी प्रत्यक्ष सरकार की नियत पर कोई संदेह नहीं है पर जिस मार्ग से यह कार्य किया जा रहा है वह ठीक प्रतीत नहीं होता है.

गंगा और सहायक नदियों में दो प्रकार की गंदगी उपस्थित हैं जैविक जैसे सीवेज और रसायनिक जो उद्योग से और शहरी जीवन में रसायन के प्रयोग से उत्पन्न हो कर नदियों में जाते हैं.

इन सभी को यांत्रिक विधि से साफ करने की चेष्टा सफल नहीं है. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट इसे साफ़ नहीं कर सकते.

इस प्रदूषण को साफ करने का एक मात्र उपाय जैविक विधि है. नदियों में जेनेटिकली मॉडिफाइड एल्गी का प्रयोग करने से ये दोनों प्रकार की गंदगी दूर की जा सकती है और यह ऐल्गी मछलियाँ का भोजन है और ये जलमार्ग को बाधित नहीं करती.

भारत में एक विदेशी कंपनी इस प्रकार की एल्गी जो न्यू एल्गी के नाम से बेच रही है और दक्षिण भारत के उद्योगपति इसका उपयोग अपने उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी की सफाई के लिए कर रहे हैं क्योंकि सरकार कड़ाई से प्रदूषण नियमों का पालन करवा रही है.

यह 2014 में 275 रुपये प्रति किलो बेचा जा रहा था और अब 2017 में 5000 रुपये प्रति किलो में बेचा जा रहा है.

भारत सरकार अगर चाहे तो सरकारी कृषि संस्थानों में इस प्रकार की एल्गी विकसित कर गंगा और उसकी सहायक नदियों को शीघ्र सरलता और बहुत ही कम खर्च में साफ करवा सकती है क्योंकि बहुत ही थोड़ी मात्रा में एल्गी के बीज बहुत बड़ी मात्रा में जल साफ़ कर सकता है और यह विधि मोदी जी के गंगा सफाई के वादे को बचे दो वर्षों में पूरा कर सकती है.

– Chandran Bahadur (Irrigation Department Uttar Pradesh)

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