बिहार, समाजवाद और शिक्षा माफिया

बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर बात चली ही है तो बता दें कि बिहार में सन 1996-98 के दौर की बोर्ड परीक्षाएं भी सुप्रसिद्ध हैं. उनकी प्रसिद्धि का एक कारण तो, जाहिर है हमारा उसी दौर में परीक्षाएं देना (और पास करना) रहा है.

एक और कारण ये था कि जंगल राज के बरसों के बाद उस वर्ष घोषणा हुई कि परीक्षाओं में कदाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अचानक पुलिस सख्त हुई, नक़ल करवाने वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाता था.

नक़ल करवाने एक-दो छात्रों के रिश्तेदार नहीं आते थे. सबके चाचा-मामा, भाई-बन्धु, पूरा कुनबा जुट जाता था. परीक्षा शुरू होते ही प्रश्न पत्र लेकर एक-दो सबसे तेज धावक, फोटो कॉपी करवाने दौड़ते थे.

फिर दुकान से प्रश्नपत्र की ज़ेरॉक्स कॉपी से कुछ मास्टर उनका हल डिक्टेट करते और दर्जनों लोग कॉपी कर-कर के उसे परीक्षा हॉल में पहुँचाना शुरू करते. इसके लिए काफी जगह चाहिए होती थी.

हमें अच्छे से इसलिए याद है क्योंकि जब इन नक़ल करवाने वालों को पुलिस खदेड़ती थी. खदेड़ने पर या उनके पास रात में शहर में रुकने की जगह नहीं होती तो ये सब हमारे घर के कैंपस में आ जाते थे.

दसवीं से लेकर बारहवीं तक की परीक्षा जब होती तो घर में जिले भर के अनजान लोगों की भारी भीड़ होती थी.

जब 1996 में कदाचार बंदी की घोषणा हुई तो लोगों ने समझा था कि हर बार जैसा जुमला होगा. लेकिन उस साल हर बार जैसा किसी एक दिन पुलिस ने दौड़ा कर नहीं छोड़ा, गाड़ियों में भर-भर के स्कूलों से ही उठा ले गए थे.

गावों से पहली बार अनजान शहर में आये बच्चों के रिश्तेदार अचानक जेल में बंद हो गए. नयी जगह, पहली बार घर से बाहर आये, जेब में पैसे भी नहीं, परीक्षा का समय ख़त्म होने पर क्या करें, कहाँ जाएँ, सोचते सैकड़ों बच्चे उस साल नजर आये.

किस्मत से जगह बिहार के छोटे कस्बे थे, कोई दिल्ली-मुंबई जैसे महानगर नहीं. बस-जीप चलाने वालों ने घर भेजा, स्थानीय लोगों ने भी यथासंभव मदद की. लेकिन बच्चों को दिक्कत होने पर लोग जरा नाराज़ हो गए थे.

मुख्यमंत्री जी दूर थे तो उनसे तो नहीं, लेकिन पुलिस स्थानीय ही थी, उनसे हिसाब लिया जा सकता था.

ऐसे में सहरसा के सिहोल थाने में एक मजेदार वारदात हुई. पुलिस वालों की बुलेट और मूछें उनकी शान मानी जाती है. बुलेट भले सिपाही-जमादार के पास ना हो, लेकिन अगर मूछें भी नहीं है तो काहे का पुलिसिया?

बस परीक्षा ख़त्म होते ही एक शाम जब कुछ पुलिसकर्मी किसी परीक्षास्थल से सिहोल नाम के ग्रामीण इलाके से पैदल लौट रहे थे तो अज्ञात लोगों की भीड़ ने उन्हें धर दबोचा.

उनके साथ कोई मार-पीट नहीं की गई. बस कुछ ने दबोच कर गुदगुदी लगानी शुरू की, और कुछ ने मूछें उखाड़ ली. अज्ञात लोगों द्वारा मूछें उखाड़ लिया जाना उस साल की सबसे मजेदार एफ.आई.आर. थी.

पिछले पच्चीस साल से बिहार समाजवाद नाम के कोढ़ से पीड़ित है. इसका सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को ही नुकसान हुआ हो ऐसा भी नहीं है. इसकी वजह से कई शिक्षा माफिया उभरे हैं, जिनके पास दर्जन भर आई.टी.आई. कॉलेज, स्कूल, कोचिंग वगैरह हैं.

चूँकि शिक्षा व्यवस्था राज्य में नाकाम रही है, तो कोटा, इलाहबाद, कानपुर, बनारस जैसी जगहों पर कोचिंग इंडस्ट्री भी खुल गई. पटना में कोचिंग नहीं हैं ऐसा नहीं है, लेकिन जैसा व्यवसाय ये बाहर कहीं है, वैसा कोई शहर आश्चर्यजनक रूप से बिहार में नहीं है.

इस सिलसिले में एक मजेदार वाकया ये भी है कि बिहार के हाल में ही एक गवर्नर थे जो कई पुणे वगैरह के कॉलेजों के लिए जाने जाते हैं. उनके जाने के बाद अब पटना में भी डी. वाय. पाटिल स्कूल खुल गया है.

पटना के जिस भी अच्छे विज्ञान विषय के प्रोफेसर का नाम आप लेंगे, उसका अपना ट्यूशन सेण्टर है और मेडिकल-इंजीनियरिंग प्रवेश के लिए कोचिंग भी है.

राजनैतिक चंदे से लेकर आपसी प्रतिस्पर्धा और लड़कियों / नाजायज संबंधों के लिए इनमें आपसी गोलीबारी और हत्याओं की घटनाएँ भी हो चुकी हैं.

बिहार में अख़बार की रीडरशिप सबसे ज्यादा है. गरीब राज्य कहा जाता है तो जाहिर है छात्र भी गरीब परिवारों से आते होंगे लेकिन यहाँ लाइब्रेरी-पुस्तकालयों की गिनती भी ना के बराबर है.

ज्यादा रीडरशिप के बाद भी यहाँ के अखबार और पत्तरकारों की शिक्षा व्यवस्था पर सच लिख देने की हिम्मत भी नहीं है. इस से रीडरशिप और टी.आर.पी. गिर जाने का खतरा बताने वालों ने कब ऐसी ख़बरें छाप कर रीडरशिप गिरते जांचा, ये भी पता नहीं.

बाकी जब ये टॉपर घोटाला जैसी हेडलाइन आती है तो बिहारी वैसे ही मुंह छुपाते हैं जैसे सिहोल के मूंछविहीन सिपाहियों ने महीनों छुपाया होगा.

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