दिल्ली-एनसीआर में अपराध हो, तो ही मिलेगा न्याय और मीडिया कवरेज

न्याय चाहिए?… विभिन्न सामाजिक संगठनों के आंदोलन के लिए मुद्दा चाहिए?… प्रशासन की खुली नींद चाहिए?… खबरिया चैनलों की नॉन स्टॉप कवरेज चाहिए?

यदि हाँ… तो दिल्ली-एनसीआर में ही आपके साथ अपराध का होना अतिआवश्यक है.

बिहार के छोटे से शहर में यदि वीभत्स से भी वीभत्स अपराध हो जाए… किसी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, न स्थानीय पुलिस जागेगी, न राज्य सरकार के स्वास्थ्य पर कोई असर होगा.

अखबार के किसी पन्ने पर एक छोटी-सी खबर को स्थान मिलेगा जिसमें लिखा होगा- एक बारह वर्ष की बच्ची का शव मिला, पुलिस छानबीन कर रही है.

न्यूज़ चैनलों के दस मिनट में बीस खबर के बीच एक खबर उस बच्ची के शव के बारे में जितनी तेजी से आएगा उतनी ही तेजी से चला भी जाएगा.

अब ऐसी खबर पर कौन सा सामाजिक संगठन मोर्चा निकालेगा भला और मधुबनी जैसे छोटे से शहर में कैंडल मार्च निकाल कर मीडिया कवरेज तो मिलेगा नहीं.

25 मई को बारह वर्ष की लड़की नैन्सी झा स्कूल से घर आ रही थी… रास्ते में ही उसका अपहरण हो गया… घरवालों ने बहुत ढूँढा, जब नहीं मिली तो पुलिस में रिपोर्ट की.

इधर घर में शादी का माहौल था जो अब चिंता में बदल चुका था… नैन्सी की बुआ की शादी होने वाली थी…

चार दिनों तक पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही… 29 मई को नदी किनारे एक लड़की का शव मिला… शिनाख्त करने पर पता चला नैन्सी झा का शव था.

शव की स्थिति इतनी भयानक थी जिसकी कल्पना भी रोंगटे खड़ी कर दे.

अरबों ने कह दिया ‘जंग और प्यार में सब जायज़ है’… फ़िल्म वालों ने इस सूत्र वाक्य को ब्रह्म वाक्य बना कर समाज को समझा दिया… कुछ लोगों ने मान लिया कि प्यार के चक्कर मे कुछ भी कर दो, नाजायज़ नहीं है.

ऐसे ही दो लड़के थे, जो नहीं चाहते थे कि नैन्सी की बुआ की शादी हो… ऐसा वो प्यार में चाहते थे या दुश्मनी में नहीं पता…

पर उस मासूम बच्ची के साथ उन्होंने अत्याचार की सारी सीमाएँ लांघ दीं… उसकी कलाइयों की नसें काट दीं… गला रेत दिया… इतने से भी उनका जी नहीं भरा तो उसको तेज़ाब से जला डाला…

उन दोनों दरिंदों को अपनी शक्ति दिखाने के लिए मासूम बच्ची ही मिली थी!!! जिसके ऊपर अत्याचार करके उन्होंने अपनी कुण्ठा निकाली.

दोनों आरोपी पकड़े गए हैं, पर हमारे कानून की किताब में ऐसे जघन्य अपराध के लिए उचित सज़ा है ही नहीं… आजीवन कारावास या फाँसी जैसी सज़ा इन लोगों के लिए बहुत मामूली सज़ा है.

नैन्सी की बुआ भी एक बेटी है और नैन्सी भी एक बेटी थी… इन दोनों के साथ जो हुआ, इसको देखने वाला क्या कभी भी चाहेगा कि उसके घर में भी बेटी हो.

बेटी को जन्म दे कर पढ़ने भेजने की गलती की सज़ा ही तो मिली नैन्सी के माता-पिता को…

आज नैन्सी की माँ सोच रही होगी कि काश! गर्भ में ही मार डाला होता नैन्सी को तो आज उसकी वीभत्स मृत्यु तो नहीं देखनी पड़ती…

और न्याय मिलना इस देश में असंभव ही है… ऐसे अपराधों में जो सज़ा मिलती है वो न पर्याप्त है, न ही असरदार…

हम कुण्ठित समाज और लंगड़े-बहरे कानून व्यवस्था वाले देश में स्वार्थी शासकों के साथ रह रहे हैं.

ऐसी स्थिति में प्रतिदिन देश के किसी न किसी कोने में कोई न कोई नैन्सी, निर्भया मिलती रहेंगी और हम देखते रहेंगे.

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