स्व-विवेक से तय करें अपना भोजन

आखिर मांसाहार कब शुरू हुआ?

मेरे हिसाब से मानव की उत्त्पत्ति से ही..

आदिम मानव बस ये जानता था कि उसको खाना है, जो भी खाने लायक हो.

उसको खेती या बागबानी नहीं आती थी, तो जो मिला सामने, मारा और खा लिए.

इसमें पहला परिवर्तन तब आया होगा जब आसमानी बिजली या किसी और कारण से कोई जंगल जल गया होगा और जल कर भुने हुए जानवरों का मांस उसको ज्यादा बेहतर लगा होगा. इसके बाद मानव में आग जलाना सीखा.

कुछ समय बाद किसी ने ये ध्यान दिया होगा कि सारे जानवर एक दूसरे को नहीं खाते, कुछ सिर्फ फ़ूल पत्ती वनस्पति खाते हैं और कुछ पेड़ो पौधों को सूंघ कर छोड़ देते हैं.

यहाँ से उसका रुझान वनस्पति खाद्य पदार्थों पर हुआ, कुछ प्राकृतिक और उसके बाद खेती सीखी.

अब कुछ जगह, जैसे बर्फीले पहाड़ और रेगिस्तान, यहाँ तो खाद्य पदार्थ उपजाना संभव ही नहीं तो वहां मांसाहार बदस्तूर जारी रहा.

और भारत जैसे देश जहाँ गंगा -जमुना की तराई से लेकर लगभग आधे से ज्यादा देश जो बहुत ज्यादा उपजाऊ था वहां शाकाहार साथ में आया.

अब जिसकी जैसी भावना रही उसने वो खाद्य पदार्थ अपनाया. यहाँ एक सवाल ये भी कि इसके बावजूद कि जमीन उपजाऊ है कुछ जगहों पर फिर भी मांसाहार बदस्तूर प्रमुख भोजन बना रहा.

क्यों ?

क्योंकि खेती श्रम मांगती है और हर कौम ऐसी मेहनती नहीं थी. थाईलैंड और उसके आस पास के लगभग सभी देश भू सम्पदा से धनी हैं. पर वहां पुरुष अक्सर बिना काम सिर्फ नशा करे घूम रहे होते हैं और स्त्रियां दुकानें चला रही होती हैं.

अब खेती कौन करे? भारत में मांसाहार प्राचीन काल से ही प्रचलित है. कोई ब्राम्हण या कोई कानून मांसाहार नहीं रोक सकता. ये व्यक्ति विशेष की खुद की इच्छा है कि वो क्या खाये. और खाने के लिए उपलब्ध क्या क्या है इसमें से वो क्या चुनाव करे.

अक्सर अध्यात्मिकता के स्तर पर बढ़ने वाले लोगों का मांसाहार अपने आप छूट जाता है बिना किसी जोर जबरदस्ती के. इसलिए किसी को कोई दोष देने की जरुरत नहीं.
अपने स्व-विवेक के आधार पर निर्धारित करिये कि आप क्या खाना चाहते हैं….

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