कृष्ण सौ गालियाँ सुन चुके हैं शिशुपाल, जिंदा रहना है तो रुक जाओ अंतिम गाली देने से

आज जब राम कृष्ण का उदाहरण व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए उचित ठहराते हुए बताया जाता है, तो भगवान श्री कृष्ण के जीवन से शिशुपाल का स्मरण सहज ही आ जाता हैं.

चेदि वंश के शासकों में सबसे क्रूर और लम्पट था शिशुपाल. जन्म के समय 4 हाथों वाले बालक को देख माँ-बाप ने उसके जीवन का अंत ही कर देना चाहा पर एक भविष्यवाणी के कारण- जिसमें कहा गया कि बालक के जीवन का अपना प्रयोजन हैं और जिसके हाथ में जाते ही उसके अतिरिक्त अंग ख़त्म हो जायें वही इसकी मृत्यु करेग, माता- पिताने बालक का जीवन चलने दिया…..

यही शिशुपाल, कृष्ण जो की रिश्ते में इसके चचेरे भाई लगते थे, बचपन में इनकी गोद में आके सामान्य मनुष्य के रूप में आ गया. माँ को हर्ष भी हुआ और शोक भी. हर्ष इसका की बालक अब सामान्यहो गया और शोक इसका कि मृत्यु होगी भी तो कृष्ण के हाथों जो उनको बहुत मान देते थे और जिनपर उनका स्वाभाविक अनुराग था. ममता आबद्ध माँ ने कृष्ण से शिशुपाल के 100 अपराध छमा करने का वचन ले लिया और भक्तवत्सल कृष्ण ने सहज ही स्वीकार कर लिया.

ये तो हुई पृष्ठभूमि, अब देखते हैं क्या लिखा था भविष्य के गर्भ में-
यही शिशुपाल युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ में जहाँ भगवान कृष्ण मुख्य अतिथि के आसन पे पूजनीय थे और जहाँ योगेश्वर ने अपने लिए जूठी पत्तल उठानेका कार्य लिया था, ईर्ष्या की आग में तपते शिशुपालने कृष्ण के प्रथमपूजन पे आपत्ति जताते हुए उन्हें अपशब्दो से अपमानित करना शुरू किया और सुदर्शनधारी सुनते रहे मूक होकर- अपने वचन के निर्वाहन के लिये……

पर नहीं, अर्जुन नहीं सुन पाया, अपने सखा के लिए ऐसे विषाक्त वचन और बोला- केशव ऐसा भी क्या बंधन, तुम वचन आबद्ध हो, मैं नहीं. मैं अभी इस दुर्बुद्धि का अंत ना कर पाऊँ तो मेरे वीर कहलाने को धिक्कार. पर कृष्ण ने रोक लिया और कहा- अर्जुन मैं शिशुपाल का नहि ख़ुद का संयम प्रकट कर रहा हूँ-

1. कलियुग निकट हैं, लोग २०किलो वज़न उठा पाएँगे लेकिन किसी की २ बातों का बोझ नहीं.
2. शब्द से ही तो प्रताड़ित कर रहाहैं पर वो ख़ुद कितना पीड़ितहो रहा हैं इस ईर्ष्या से, मुझे तो यह विचार के ही दया आती हैं.

पर शिशुपाल का अंत आ चुका था और जब उसने अर्जुन को कृष्ण के लिए व्यथित देखा तो उसने 100 वीं गाली अर्जुन को दे दी और भगवानने 101 देते ही सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का सिर धड़ अलगकर दिया. सभा विदग्ध थी और अर्जुन बेहद क्लांत……

उन्होंने हाथ जोड़ के कहा- केशव आपने 99 अपशब्द सुन लिए अपने लिए और मेरे लिए 2 भी नहीं सुन पाये और जो शब्द हमारे आराध्य भगवान श्री कृष्ण ने कहे वही इस लेख का मूल हैं. उन्होंने कहा,

अर्जुन,

1. शिशुपाल को मेरे प्रति किए अपराध छम्य हैं, मेरे पे पूर्ण आश्रित भक्तों के प्रति किए अपराध के लियें तो मुझे भी कोइ छमा नहि हैं. जों माँ एक संतान जनने में असह्य कष्ट झेल ले जाती है, वो उसके एक आँसू नहीं देख पाती.

2. शिशुपाल जब तक मुझे गाली दी वो मेरे धैर्य की परीक्षा थी, मेरे भक्त की ओर रूख करते ही मेरे सामर्थ्य की परीक्षा हो गयी और अगर सामर्थ्य हो के भी मैं शरणागत की रक्षा ना कर पाया को द्वापर में तो नहीं पर कलियुग में मेरे भक्तों को कोई भरोसा ना रह जाएगा.

और इस तरह पेशे से ग्वाले हमारे कन्हैया कब शस्त्र और कब शास्त्र उठाने हैं, दोनो का उचित उदाहरण देकर गए हैं, अपने मनुष्य रूप में. हमें तो बस मनन करके आचरण करना है.

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