गायों की रक्षा के लिए बनना ही होगा शिवाजी और मंगल पाण्डेय!

शिवाजी एक बार बाजार में खड़े थे… तभी वहां से एक कसाई गाय को लेकर गुज़रा. वो गाय को वध के लिये ले जा रहा था. गाय समझ गयी थी कि उसका अंत निश्चित है. गाय की आंखो से आंसू निकल रहे थे. वो पछाड़े खा खा कर जमीन पर गिर रही थी. कसाई उसे लाठी, लात और नुकिले सुऐ से गोदकर आगे खींच रहा था.

उस समय मुगलों का शासन था. गोवध उनके लिये एक सामान्य बात थी. विरोध करने वाले की निर्मम तरीके से हत्या कर दी जाती थी. पूरे बाजार में सब लोग चुपचाप खड़े रहकर तमाशा देख रहे थे.

शिवाजी की आंखो में इस दृश्य और गाय की पीड़ा को देखकर आंसू भर आये. उनके ह्रदय और मस्तिष्क में क्रोध की अग्नि जलने लगी. उन्होंने तुरंत उस कसाई को रोककर गाय छोड़ने को कहा. कसाई ने गाय छोड़ने की बजाय शिवाजी को अपशब्द कहने शुरू कर उनपर हमला कर दिया.

शिवाजी ने तुरंत अपनी तलवार निकालकर उस कसाई का पहले हाथ काटा फिर सर धड़ से अलग कर दिया. और गाय को आजाद कराकर सुरक्षित स्थान पर छोड़ आये. उस समय शिवाजी महाराज की आयु मात्र 17 वर्ष थी. यहीं से बालक शिवाजी ने अत्याचारी मुगल सल्तनत को उखाड़ फेंकने का संकल्प कर लिया. उन्होने मराठा हिंदू वीरो को एकत्र कर औरगंजेब की विशाल सेना को अपने युद्ध कौशल से अनेक बार परास्त किया. और गाय की रक्षा से शुरू हुई उनकी यात्रा “हिन्दवी स्वराज” पर जाकर रुकी.

मंगल पांडे कोलकाता के पास बैरकपुर छावनी मे ’34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री’ मे सिपाही थे. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व कम्पनी के सैनिकों को 1853 मे ‘एन फील्ड पी 53’ राईफल दी गयी. इस बंदूक के उपयोग के लिये ऐसे कारतूस दिये गये जिनमें गाय की चर्बी का उपयोग किया गया था…

बंदूक को लोड करने के लिये पहले कारतूस को मुंह से काटना पड़ता था. मंगल पांडे के नेतृत्व में कम्पनी के हिंदू सैनिकों ने इनका उपयोग करने से मना कर विद्रोह कर दिया. विद्रोह में अनेक अंग्रेज अफसर और सैनिक मारे गये.

मंगल पांडे को विद्रोह भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर 8 अप्रेल 1857 को फांसी पर चढ़ा दिया. मंगल पांडे के बलिदान के बाद भारत में पहला “स्वाधीनता संग्राम” भड़का… इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों में मंगल पांडे का इतना खौफ बैठा कि 1857 के समस्त क्रांतिकारी सिपाहियों को “‘पांडेय'” के नाम से पुकारा जाने लगा…

इस आंदोलन से भड़की चिंगारी 90 साल बाद 1947 मे “पूर्ण स्वराज” प्राप्त करके ही रुकी.

सोचिये…
यदि उस समय शिवाजी और मंगल पांडे आम नागरिको की तरह गायों पर हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहकर अपने धर्म से आंखे फेर लेते तो भारत मे “हिन्दवी स्वराज” और “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” का गौरवमय इतिहास वहीं दफन हो जाता… शिवाजी और मंगल पांडे उस समय अकेले ही थे, जबकि उनके सामने मुगल सल्तनत और ब्रिटिश साम्राज्य थे, बावजूद इसके उन्होने तूफान के खिलाफ दिया जलाया.

आज भारत में न तो मुगल सल्तनत है न ब्रिटिश साम्राज्य… बावजूद इसके देश में खुलेआम गौहत्या की जा रही है… इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है… केरल में ISIS की तरह लाईव वीडियो बनाकर गाय को काटा जा रहा है… देश निर्णायक दौर में खड़ा है… हमारी आज की प्रतिरोधक क्षमता ही देश के भविष्य को तय करेगी कि हमारा देश भविष्य मे “हिन्दवी स्वराज” की ओर बढ़ेगा या “‘गजवा ए हिंद” ही हमारी नियति है… अब ये हमें तय करना है कि हम कौनसा मार्ग चुनते हैं.

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