बेशर्म तालिबानी गुंडई में गुत्थमगुत्था सेक्यूलरिज्म का नया तकाजा है रामपुर एपिसोड

रामपुर में दलित लड़कियों के साथ हुई अभद्रता पर तमाम दलित साहूकार चुप-चुप हैं. तो क्या यह सभी रामपुर के अघोषित राजा आज़म खान से डरते हैं.

रामपुर के दलितों को तो मैं जानता हूं आज़म खान से बहुत डरते हैं. जब आज़म मंत्री थे तो उन से भयभीत हो कर रामपुर के बहुत से दलितों ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था.

रामपुर के कँवल भारती जैसे दलित विचारक को लाचार हो कर कांग्रेस ज्वाइन करनी पड़ी थी. पर कांग्रेस भी उन को आज़म खान के अत्याचारों से बचा नहीं पाई. कंवल भारती ने कांग्रेस को कुछ चिट्ठियां लिखीं और कांग्रेस छोड़ दी.

लेकिन आज़म खान ने रामपुर को बिगाड़ा बहुत है. मुस्लिम अस्मिता के नाम पर खूब गुंडई की है और वहां के मुसलमानों को सिर पर चढ़ा कर गुंडा बनाया है.

इस कदर बनाया है कि सोच कर दहशत होती है. सोचिए कि दिन दहाड़े रामपुर के यह मुस्लिम लड़के समारोह पूर्वक दो दलित लड़कियों को न सिर्फ़ गोद में उठा कर टांग लेते हैं, उन से अभद्रता करते हैं, उन का शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न करते हैं बल्कि इस पूरी घटना का वीभत्स वीडियो बना कर फ़ेसबुक पर पोस्ट भी कर देते हैं.

यह तालिबानी हिंसा है, तालिबानी मिजाज़ है. सोचिए कि यह सब सोच कर ही कितनी दहशत होती है. लेकिन उन मुस्लिम लड़कों को नहीं. उन के अभिभावकों को नहीं. तो उन को यह तालिबानी गुंडई का हौसला किस ने दिया है, जंगल राज मचा कर यह वहशीपन दिखाने का.

निश्चित रुप से आज़म खान ने. आज़म खान की भैंस फट से खोज लेने वाली रामपुर की पुलिस अभी सभी लड़कों को पकड़ भी नहीं पाई है.

वह तो कहिए कि यह लड़कियां दलित हैं तो थोड़ी बहुत कार्रवाई हो गई है. अगर यही लड़कियां सवर्ण होतीं तो क्या कोई कार्रवाई हुई होती भला. हरगिज नहीं.

फ़िलहाल तो सारे दलित साहूकार, सेक्यूलर साहूकार पूरी तरह ख़ामोश हैं. सामाजिक समता के सारे क्रांतिकारी ख़ामोश हैं. तो शायद इस लिए कि दलित, मुस्लिम गठजोड़ का सपना कहीं टूट न जाए.

लेकिन रामपुर में तो यह सपना टूट गया है. चकनाचूर हो गया है. क्यों कि आज़म खान खुल्लमखुल्ला पेशबंदी में हैं इन लड़कों को बचाने के लिए, पैरोकारी में हैं.

यह वही आज़म खान हैं जो अपनी सरकार के समय एक हाईवे पर हुए गैंगरेप पर अपनी सरकार के बचाव में बोले थे कि यह राजनीतिक साजिश है.

कोई आज़म खान से पूछे तो सही कि अब यह कौन सी साज़िश है. लेकिन सभी के मुंह पर ताला लगा है. ख़ामोश कि आज़म खान की अदालत जारी है.

उधर शरद यादव जैसे उखड़े हुए लोग तिलमिला कर प्रश्नाकुल हैं कि, योगी से पूछो, कहां है एंटी रोमियो स्क्वाड? पर वह आजम खान से कोई सवाल नहीं पूछते.

यह भी हैरतंगेज है कि अभी तक इन लड़कियों और इन के परिवारजनों के घाव पर मरहम लगाने के लिए कोई राजनीतिक प्रतिनिधि मंडल, कोई सामाजिक संगठन, कोई स्त्रीवादी एक्टिविस्ट दल, कोई मानवाधिकारवादी भी रामपुर नहीं गया है.

अभी यह सभी महाराणा प्रताप से लड़ने और गाय काटने खाने के मौलिक अधिकार जैसा महायुद्ध लड़ने में व्यस्त हैं. इन दलित लड़कियों को जैसे सम्मान से जीने का मौलिक अधिकार नहीं है.

दलितों की देवी मायावती ने तो सांस भी नहीं ली है. जैसे गहरी नींद सो गई हैं. सेक्यूलरिज्म का जैसे नया तकाजा है यह पूरा एपिसोड. बेशर्म तालिबानी गुंडई में गुत्थमगुत्था.

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