देश में विज्ञान के प्रसार की नयी रणनीति की आवश्यकता

इसरो ने एक Android एप्प बनाया है जिससे यह पता चल सकेगा कि आप जिस क्षेत्र में रहते हैं वहाँ कितनी सौर उर्जा (in kWh/m^2) प्राप्त हो रही है.

भारत की कल्पना और इनसैट सैटलाईट की सहायता से रिमोट सेंसिंग की प्रक्रिया द्वारा मासिक और वार्षिक सोलर पोटेंशियल ज्ञात किया जा सकेगा. लोकेशन (अक्षांश/देशांतर) यदि नहीं पता है तो आपको जीपीएस बता ही देगा.

इसरो की वेबसाइट पर एप्प के स्क्रीनशॉट्स दिए हैं लेकिन VEDAS वाले पेज पर एप्प कहीं नहीं दिख रहा.

मैं इस विषय पर लिखना चाहता था मगर लिखने से पहले स्वयं एप्प का प्रयोग करना चाहता था. करेंट साईंस जर्नल में पूरा लेख भी छपा है. लेकिन जब एप्प दिख ही नही रहा तो क्या लिखें? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा.

मैं हर रोज विज्ञान पर नहीं लिखता. जब भी लिखता हूँ तो तीन बातों का ध्यान रखता हूँ: 1. जो कुछ भी खोज हुई है उसमें विज्ञान के किन सिद्धांतों का प्रयोग किया है. 2. उसमें भारत की क्या भूमिका है. 3. भविष्य में उक्त तकनीक कहाँ तक जाएगी.

विज्ञान के नाम पर लोग कुछ भी लिखते हैं. “सबसे बड़ा”, “सबसे छोटा”, “सबसे लम्बा”, “आश्चर्यजनक किन्तु सत्य”, “मानो न मानो” टाइप की हजारों पोस्ट और लेख मिल जाते हैं. इनमें सामान्य ज्ञान ज़्यादा होता है विज्ञान कम होता है.

मुझे इस चीज से चिढ़ है. अरे भाई ऐसी लेख से क्या लाभ जिसको पढ़ने के बाद किसी को विज्ञान का कोई सिद्धांत ही न पता चले?

बहरहाल… कुछ दिन पहले ही आइआइटी बाम्बे और डीआरडीओ ने थर्मल इमेजिंग सेंसर बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित कर ली है. इससे नाईट विजन गॉगल्स हम खुद बना सकेंगे.

इसका भी पेपर करेंट साइंस में छपा है. लेकिन चूँकि शोध पत्र है इसलिए समझना कठिन है. मेरे विचार से मटेरियल साइंस सॉलिड स्टेट फिजिक्स का विषय होगा जो मेरे अध्ययन का विषय रहा है किन्तु बिलकुल बेसिक लेवल का ही.

प्रश्न यह है कि जनसामान्य को देश में हो रही उपलब्धियों के बारे में कैसे बताया जाए.

उदाहरण के लिए इसरो ने दो साल पहले एक बहुत ही हल्का पदार्थ बनाया था जिसको सियाचेन पर पहनी जाने वाली यूनिफार्म के निर्माण में प्रयोग किया जाने वाला था.

मैंने astrosat और IRNSS पर भी लिखा था. लेकिन सोलर कैलकुलेटर एप्प पर कैसे लिखा जाए समझ में नहीं आ रहा.

सच कहूँ तो इस देश में विज्ञान के प्रसार की नयी रणनीति की आवश्यकता है. यहाँ science popularization में अपार संभावनाएं हैं लेकिन कोई सीरियस ही नहीं होता. न सरकार न CSIR का NISCAIR. सब अपनी ढपली अपना राग गाने वाली वेबसाइट हैं, पत्रिकाएं हैं. कोई संगठित प्रयास नहीं.

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