ज़माने को क्यों देते हो अपनी जहालत और जंगली होने का परिचय!

विद्यार्थियों, गाय पर निबंध लिखो… यूं तो आज के युग में ऐसे सवाल स्कूलों में किये नहीं जाते. यह आधुनिक शिक्षा के फैशन (?) में नहीं है. और अगर किसी मास्टर ने अति उत्साह में पूछ लिया तो बच्चे क्या लिख पाएंगे?

गाय एक चार पैर वाला जानवर है. इसके दो सींग एक पूँछ होती है. यह पालतू है और दूध देती है. दिमाग पर बहुत जोर दिया गया तो लिख देगा कि यह सफ़ेद काली पीले रंगों में पायी जाती है.

कोई बड़ी क्लास का छात्र, जो दिन-रात टीवी देखता हो और समाचार पत्रों की हेड लाइन पर नजर डालता हो, वो लिख सकता है कि गाय को लेकर आजकल हमारे देश में बड़ी खटपट मची हुई है.

और इसी अतिरिक्त सूचना के प्रभाव में आकर वो यह भी लिख सकता है कि देश के कई हिस्सों में इसका मांस खाया जाता है. आखिर वो भी क्या करे, बीफ फेस्टिवल के नाम की छिटपुट घटनाएं भी मीडिया प्रमुखता से छापता है, जिसका एक छात्र के मन मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता होगा जानना कोई मुश्किल काम नहीं.

और अंत में, अगर छात्र के घर-परिवार में सनातन संस्कृति का हल्का सा भी असर बचा है तो वो लिख सकता है कि हिन्दू धर्म को मानने वाले गाय को अपनी माता मानते हैं.

गौ माता लिखते ही वो छात्र मजाक का केंद्र बन सकता है. मैकाले की शिक्षा से पढ़े और मिशनरी ज्ञान से पोषित शिक्षक और विद्यार्थियों की भीड़ उस के पीछे पड़ जाएगी और पूछेगी कि ये तुम लोग हर किसी को अपनी माँ क्यों बना लेते हो?

कभी धरती को माँ तो कभी भारत को माँ, कोई गंगा को माँ तो कोई नर्मदा को माँ, आखिर कितनी माँ है तुम लोगों की.

और इस हँसी उड़ाने का उसके दिल-दिमाग पर प्रतिकूल असर होगा और वो मन ही मन कहेंगा, सच ही तो है कि माँ तो एक ही होती है, पता नहीं ये कैसा हिन्दू धर्म है कि जिसे देखो माँ बना देता है.

और फिर इस तरह से धीरे-धीरे वो समृद्ध संस्कृति से दूर होता चला जाएगा. क्योंकि उसे यह नहीं बताया गया कि गाय एक माता क्यों है?

उसे तो यह भी संस्कार नहीं दिए गए कि माँ कोई एक स्त्री मात्र नहीं है जिसने सिर्फ जन्म दिया. वो निरंतर बहने वाले मातृत्व भाव का स्रोत है. वो अपने बच्चे का पालन पोषण करती है, निस्वार्थ भाव से.

अपनी भूख-प्यास की परवाह किये बिना अपने स्तन से बच्चे को चिपकाये रहती है. ऐसा करने के लिए उसे किसी ज्ञान या धर्म की शिक्षा की आवश्यकता नहीं.

वो बच्चों के बड़े होने पर भी हर हाल में भोजन का प्रबंध करती है. वो सिर्फ जननी नहीं है, पालक भी है रक्षक भी. और तमाम उम्र अपने बच्चों से भावनात्मक रूप से जुडी रहती है.

यही मातृत्व का भाव गाय के पास भी है. वो तो जन्म देने वाली माता से भी एक कदम आगे है. उसका दूध हर उस बच्चे को पिलाया जा सकता है जिसकी जननी ज़िंदा नहीं या माँ के शरीर में दूध नहीं.

वो एकमात्र ऐसा जानवर है जिसके थन से मुँह लगा कर मानव के साथ-साथ कोई अन्य जानवर का बच्चा भी दूध पी सकता है. ऐसा करते समय उसकी आँखों में देखे, वहाँ सिर्फ ममता मिलेगी. वो एक मासूम जानवर है जिसके रोम-रोम में मातृत्व है.

लेकिन आज की जनरेशन को तो टूथपेस्ट में नमक है, यह भी एड से सीखना पड़ता है. ऐसे में कोई उसे अगर गाय के बारे में विस्तार से ना बताये तो वो इतने भर से उसे गौ माता नहीं मानेगा.

अब कोई पुराना जमाना तो है नहीं, जहां माता-पिता ने नमक-तेल से मुँह साफ़ करने या दातून के इस्तेमाल के लिए कहा तो हम मान लेते थे. आज की सूचना की पीढ़ी को जब तक कोई कागजी हीरो नहीं बताएगा तब तक ये लोग दांत के दर्द में लौंग का इस्तेमाल भी नहीं करेंगे.

इस गूगल पीढ़ी को यह बताना पडेगा कि सिर्फ जमीन, नदी और गाय के सहारे पूरा मानव समाज स्वस्थ जीवन जी सकता है. ये तीनों जीवन भर हमारा ध्यान एक बच्चे की तरह रखते हैं इसलिए यह हमारी संस्कृति में माता के स्थान पर विराजमान हैं.

वैसे भी जन्म देने वाली देवकी और पालने वाली यशोदा को बराबर से मैय्या मानने वाले श्री कृष्ण के हम वंशज हैं. वही श्री कृष्ण जिनके लिए गौ माता ही थी.

पृथ्वी की तरह ही सीधी-साधी गाय भी बिना विरोध के मनुष्य को सब देती है. गाय हमारी संस्कति में सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कृषि प्रधान रहे हैं. यह हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है.

गाय एकमात्र ऐसा पशु है जिसका सब कुछ मानव के काम आता है. गाय का दूध, मूत्र, गोबर के अलावा दूध से निकला घी, दही, छाछ, मक्खन आदि सभी बहुत ही उपयोगी है.

गुरु वशिष्ठ ने गाय का नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी आदि दिया. ये नाम अपने शब्दार्थ में ही पूरा भावार्थ भी समेटे हैं. वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि गाय में जितनी सकारात्मक ऊर्जा होती है उतनी किसी अन्य प्राणी में नहीं.

गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है. गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोककर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं. यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है.

यह सूर्यकेतु नाड़ी सर्वरोगनाशक, सर्वविषनाशक होती है. सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य के संपर्क में आने पर स्वर्ण का उत्पादन करती है. गाय के शरीर से उत्पन्न यह सोना गाय के दूध, मूत्र व गोबर में मिलता है. यह स्वर्ण दूध या मूत्र पीने से शरीर में जाता है और गोबर के माध्यम से खेतों में.

आयुर्वेद में कई रोगियों को स्वर्ण भस्म दिया जाता है. देशी गाय के गोबर में करोड़ों जीवाणु होते हैं. गाय के घी से यज्ञ करने पर ऑक्सीजन बनती है. यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने तथा धार्मिक समारोहों में यज्ञ करने की प्रथा प्रचलित है.

भारतीय गाय के गोबर से बनी खाद ही कृषि के लिए सबसे उपयुक्त साधन थी. खेती के लिए भारतीय गाय का गोबर अमृत समान माना जाता था. जबकि रासायनिक खेती द्वारा भारतीय कृषि को लगभग नष्ट कर दिया गया.

एक बार में ज्यादा फसल के चक्कर में कुछ ही समय बाद खेत उर्वर नहीं रहे. ऊपर से इन रासायनिक खेतों से कैंसर जैसी ‍बीमारियों की उत्पत्ति होती है. पहले खेतों को गाय के गोबर में गौमूत्र, नीम, धतूरा, आक आदि के पत्तों को मिलाकर बनाए गए कीटनाशक द्वारा किसी भी प्रकार के कीड़ों से बचाया जाता था. जो प्राकृतिक और स्थाई समाधान था.

गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा तैयार किया गया पंचगव्य कई रोगों में (कैंसर में भी) लाभदायक है. पंचगव्य शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर करता है.

ऋग्वेद ने गाय को अघन्या कहा है. यजुर्वेद कहता है कि गौ अनुपमेय है. अथर्ववेद में गाय को संपत्तियों का घर कहा गया है. पहले गाय की संख्या के आधार पर व्यक्ति की समृद्धि मापी जाती थी. गौ दान सर्वश्रेष्ठ दान होता था. सन्यासी सिर्फ गाय के सहारे अपना जीवन यापन कर लेते थे.

स्कंद पुराण के अनुसार गौ सर्वदेवमयी है. भगवान कृष्ण ने कहा है मैं गायों में कामधेनु हूं. गाय इतनी अनमोल है कि इसके गोबर से गोबर गैस और बाद में बचे पदार्थ का उपयोग खेती में जैविक खाद के रूप में लिया जा सकता है.

वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय के गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है. हमारे पुराने घर गोबर से लीपे जाते थे, इसके अनेक प्राकृतिक फायदे थे. किसी परमाणु हमले के समय शायद ऐसे ही घर हमें बचा पाएंगे.

गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं. गौमूत्र और गोबर फसलों के लिए बहुत उपयोगी कीटनाशक सिद्ध हुए हैं. जुताई करते समय गिरने वाले गोबर और गौमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती. इस तरह से पैदा की गई सब्जी, फल या अनाज की फसल की गुणवत्ता भी बनी रहती.

गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है. गाय का दूध पीने से शक्ति का संचार होता है. यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. उसे पीने से मोटापा नहीं बढ़ता बल्कि पाचक होता है, जो शरीर को हष्ट-पुष्ट बनाता है.

ऐसी मान्यता है कि काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है. गाय का घी अनेक रोगों के रोकथाम में काम आता है.

गौमूत्र को सबसे उत्तम औषधियों की लिस्ट में शामिल किया गया है. गौमूत्र से बनी औषधियों से कैंसर, ब्लड प्रेशर, आर्थराइटिस, सवाईकल हड्डी संबंधित रोगों का उपचार भी संभव है. गौ मूत्र का मजाक उड़ाने वाले अक्सर यह नहीं जानते की उन्हें अंग्रेजी दवाई में क्या खिलाया पिलाया जा रहा है.

बहरहाल आगे बढ़ते हैं, गाय के दूध से बने दही के लिए सिर्फ इतना कहना ही काफी होगा की “जो पिए दही वह रहे सही”! दही हमारे पाचन तंत्र को सेहतमंद बनाए रखने के साथ सौंदर्य निखारने में भी महत्वपूर्ण स्थान है.

दही में हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की अद्भुत क्षमता है. छाछ पीने से पेट की गर्मी हट जाती है, बटर मिल्‍क में विटामिन सी, ए, ई, के और बी पाए जाते हैं, जो कि शरीर के पोषण की जरूरत को पूरा करता है.

गाय के दूध से निकाला हुआ मक्खन हितकारी, वर्ण को उत्तम करने वाला, बलकारी, अग्नि प्रदीपक, और वात, पित्त, रक्त विकार, क्षय, बवासीर, लकवा तथा खांसी को नष्ट करता है. गाय का मक्खन शारीरिक क्षमता बढ़ाने और पेट संबंधित सभी रोगों को दूर करने में सहायक होता है.

यह सब तो सिर्फ गाय की उपयोगिता का एक ट्रेलर है. विस्तार से लिखना पड़े तो गौ की उपयोगिता पर अनेक ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं. लिखे गए भी हैं.

गौ जीवन भर अपने दूध गोबर मूत्र आदि से मानव का कल्याण करती है और उसके बछड़े बड़े होकर बैलगाड़ी खींचने और खेतों की जुताई में काम आते हैं. कोई और माँ है ऐसी, जो इतना त्याग करे, वो भी बिना किसी अपेक्षा के.

आधुनिक विज्ञान का यह मानना है कि सृष्टि के आदि काल में, भूमध्य रेखा के दोनों ओर प्रथम एक गर्म भूखंड उत्पन्न हुआ था. इसे भारतीय परम्परा मे जम्बुद्वीप नाम दिया जाता है. सृष्टि में सब से प्रथम मनुष्य और गौ का इसी जम्बुद्वीप भूखंड पर उत्पन्न होना माना जाता है.

तब से गाय हमारा लालन-पालन कर रही है. आदिकाल से चले आ रहे इस मातृत्व के कारण ही सनातन संस्कृति इसे गौ माता कहती है.

हमारे पूर्वज वो जानते थे जिसे पश्चिम को अपने विश्वविद्यालय में जानने में अभी कई रिसर्च और सेमीनार करने होंगे. वे अपनी इस अज्ञानता को छिपाने के लिए ही बड़े षड्यंत्रपूर्वक ढंग से हमारी आस्था पर चोट करते हैं.

दूसरी तरफ रेगिस्तान में पनपी, अभाव में पली सभ्यता के लिए और क्या कहा जाये, जो अपने अस्तित्व के लिए कुछ भी मार कर खाने के लिए तत्पर रहती आयी है.

बहरहाल जिस किसी को गौ के इतने गुणों का पता चलेगा वो कैसे इसे माता के समतुल्य नहीं मानेगा. कोई मूर्ख ही होगा जो इसे मार कर खाना चाहेगा.

फिर भी अगर किसी को, कोई मांस खाये बिना अपना जीवन दूभर लग रहा हो तो उसके लिए प्रकृति द्वारा दिए गए कई और जानवर भी है, कुत्ता खा लो सूअर खा लो, कोई और जंगली जानवर बचा हो तो वो खा लो.

फिर भी मन नहीं भर रहा हो और मांस खाने के लिए मरे पड़े हो तो आदमी को काट कर खा लो. क्योंकि इंसान की जनसंख्या तो वैसे भी तेजी से बढ़ रही है. और फिर आदमी तो किसी के कोई काम का भी नहीं.

वैसे भी दूसरे धर्म के आदमियों को मारने का धार्मिक फैशन है आजकल. ऐसा करोगे तो कोई कुछ नहीं कहेगा. सुना है आदिकाल में नरभक्षी हमारे यहां होते भी थे, हम ये मान लेंगे कि कुछ आधुनिक नरभक्षी आ गए हैं. मगर कृपया करके गाय को मत मार कर खाओ.

इतना तो लाभ हानि समझ ही गए होंगे कि एक गाय को मार कर मुश्किल से पच्चीस पचास मासांहारी का पेट भरेगा जबकि जीते जी गौ माता हजारों का पेट भरेगी. अरे मूर्खों, अपना नुकसान तो मत करो, ना ही खुले आम सड़को पर गौ हत्या करके अपनी अज्ञानता और जंगली होने का परिचय जमाने को दो.

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