माहिष्मती गाथा – 4 : इतिहास को कलंकित करने के प्रयास को असफल करते प्रमाण

जब इतिहास को धर्म और जाति के प्रभाव में आकर लिखा जाता है तो वह केवल झूठ का पुलिंदा भर रह जाता है, इतिहास नहीं रहता. सातवाहन साम्राज्य के बारे में शोध करने के दौरान कई इतिहास की किताबों में सिर खपाया तो पता चला कि देश का अधिकांश इतिहास परस्पर विरोधी है.

एक लेखक एक ही राजवंश के बारे में कुछ और लिख रहा होता है और दूसरा कुछ और. ऐसे में क्या किया जाए. क्या लेखक की विचारधारा जानने का प्रयास किया जाए. देश के महान सातवाहन वंश के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है. चक्रवर्ती सम्राट गौतमीपुत्र के साथ हमारे अंग्रेजीदां इतिहासकारों ने बड़ा छल किया क्योंकि वो दक्षिणपंथी था. वो खुद को ब्राम्हण कहता था. ये बात इतिहास में दर्ज है अमिट रूप में पत्थर पर लिखी हुई है.

‘अमर चित्रकथा’ के एक संस्करण में गौतमीपुत्र के जन्म के बारे में जो कहानी गढ़ी गई है, उसे जान लेने के बाद आपको भी अफ़सोस होगा कि हमने अपना बचपन एक झूठी कॉमिक्स को पढ़ने में बिताया है.

सर्वज्ञात है कि सातवाहन वंश को शालिवाहन वंश भी कहा जाता है. इतिहासकारों ने इसी नाम से बड़ा भ्रम पैदा कर दिया है. इस कथा को अनंत पाई ने लिखा है जो खुद में एक सम्माननीय नाम है. इसे एक अन्य संस्कृत के विद्वान पी आर रामचंद्र ने भी लिखा है.

इस कहानी के मुताबिक शालिवाहन के पिता एक ब्राम्हण थे. उन्हें एक ज्योतिषी ने बताया था कि चित्रा के महीने के शुक्रवार में रोहिणी नक्षत्र का उदय हो रहा है.  इस समय यदि तुम पत्नी के साथ संसर्ग करते हो तो तुम्हारा पुत्र संसार के सर्वाधिक शक्तिशाली लोगों में से एक होगा.

उस रात ब्राम्हण घर लौट पाता लेकिन कावेरी नदी में बाढ़ आ गई.  ब्राम्हण रामकृष्ण परेशान था क्योकि ये मौका अगले बारह साल तक नहीं मिलने वाला था. इस पार रहने वाले एक कुम्हार को उसने अपनी परेशानी बताई तो कुम्हार तुरंत अपनी बेटी के साथ उसका संसर्ग करवाने के लिए तैयार हो गया. कुम्हार की बेटी से हुआ यही पुत्र आगे चलकर देश का महान सम्राट बना.

क्या आपके कान लाल हो गए हैं.  होने ही चाहिए.  पी आर रामचंद्र ने तो इससे भी आगे जाते हुए लिख दिया कि ‘शालिवाहन ने मिटटी के तीर से विक्रमादित्य की हत्या की थी. ये तीर मिटटी के तेल में सना हुआ था. हालांकि इतिहास में कहीं भी विक्रमादित्य की इस तरह से मृत्यु का कोई जिक्र नहीं किया गया है.

जिस राजा के नाम से शक संवत चलता हो, जिसकी दयालुता पत्थरों पर अंकित हो वो महान विक्रमादित्य की हत्या कैसे करेगा. नर्मदा के दक्षिणी तट पर जहाँ शालिवाहन गौतमीपुत्र का बनाया हुआ मंदिर है. इस किनारे से कुछ दूर कसरावद के पास प्राचीन बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं.  शालिवाहन वंश बौद्ध लोगों को जमीने और धन दान करते थे.

बहुत गहरे षड्यंत्र दिखाई देते हैं. ये दूषित इतिहास उन्ही शासकों की देन हैं जो पिछले 65 साल तक हम पर राज करते रहे.  हमारे इतिहास को कलंकित करने का प्रयास करते रहे.  एक वीर प्रतापी राजा को खलनायक बनाकर पेश किया जाता है. दोष केवल सरकारों का नहीं बल्कि उन ज्ञानी लोगों का भी है जो ये अधर्म होते चुपचाप देख रहे थे. नई पीढ़ी इस थोपे हुए इतिहास को क्यों माने.

 

 

 

फोटो : नर्मदा का दक्षिणी तट कई मायनों में प्राचीन है. इसे आज नावडाटौड़ी के नाम से जाना जाता है. यहाँ प्राचीन काल से नावे बनाई जाती है. यहीं एक पुराना घाट है जो किसने बनाया कोई नहीं बता पाता. कई इसे अहिल्या जी के समय का मानते हैं लेकिन इसकी बनावट उन घाटों से अलग है जो अहिल्या जी ने बनवाए थे. कुछ इसे परमारों का बनाया हुआ भी बताते हैं.

जारी रहेगा…..

माहिष्मती गाथा-1 : ऐश्वर्यशाली और कला सरंक्षक माहिष्मती साम्राज्य के सबूत

माहिष्मती गाथा-2 : भारत का समृद्ध इतिहास और वामपंथी इतिहासकारों का षडयंत्र

माहिष्मती की गाथा -3 :  उस वीर प्रतापी राजा के साम्राज्य का प्रमाण देता शिवलिंग

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