भैया भीम! 3 वर्ष हो गए, दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करो, वर्ना मेरा सुदर्शन चक्र ही है अंतिम विकल्प

महाभारत के अंतिम पड़ाव पर सन्नद्ध निश्चित हार देखकर जब दुर्योधन एक बांध के जल को स्तम्भित करके छुप गया तब, श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने उसे बाहर निकलकर युद्ध करने के लिए उत्तेजित किया.

अंततः भीम को गदायुद्ध में हरा देने पर पूर्ण राज्य पुनः प्राप्त हो जाने के लालच एवं अचानक बलराम जी के आ जाने से दुर्योधन बाहर आ जाता है जिसे बलराम जी अपने संरक्षण में ले लेते है और उसके साथ वीरोचित व्यवहार के लिए पांडवो को निर्देशित करते है.

अब आगे …….

बलराम – “यह मेरा शिष्य और क्षत्रिय राजा है इसके साथ वीरोचित व्यवहार होना चाहिए ,इसे इसके अभीष्ट शस्त्र, कवच एवं भोजन देकर संतुष्ट किया जाए.

यह भीम के साथ नियमपूर्वक गदा द्वंद्व करे और इनके अतिरिक्त कोई भी उस क्षेत्र में प्रविष्ट ना हो. सम्पूर्ण द्वंद्व अब मेरी अध्यक्षता में समंत पंचक क्षेत्र में होगा जहां धर्मानुचारी साधुओं की उपस्थिति रहेगी.

कृष्ण – “कैसा संरक्षण और कैसी नियमबद्ध प्रतियोगिता, दाऊ? यह कुरुक्षेत्र है, धर्मयुद्ध के अथाह बलिदानों का प्रज्वलित अग्निकुंड! यह दुर्योधन पहले ही दिन से नियमों को भंग करके मात्र विजय को लक्ष्य करके लड़ रहा है, और अब इस पटाक्षेप के क्षणों में धर्मसंगत विधियुक्त प्रतियोगिता का आकांक्षी है? क्या आप यह उचित कर रहे हैं दाऊ?

बलराम – “तब मैं वहाँ उपस्थित नही था केशव, अब यंहा मेरे होते हुए कोई छल प्रपंच संभव नहीं और ना ही तुम्हारे किंतु/ परंतु, मेरा आदेश है कि यह द्वंद्व मेरे गुरुकुल के दंगल की ही तरह नियमबद्ध रूप से होगा.

गदायुद्ध प्रारंभ हुआ, भीम ने अपने संचित रोष को क्रोध से प्रज्वलित कर प्रहार के रूप में प्रस्तुत किया और दुर्योधन सब कुछ फिर से पा लेने और बलराम के संरक्षण से पल्लवित हो उत्साह से भिड़ा.

कुछ ही समय बाद थकान से ग्रस्त भीम पर, कुचेष्टाओं और षडयंत्रो का अभ्यासी दुर्योधन भारी पड़ने लगा.

दोनो थके हुए योद्धाओं को विश्राम का समय दिया गया.

कृष्ण भीम के पास आये और बोले –

“मंझले भैया! मैंने आपको जांघ पर थाप देकर कुछ संकेत दिए थे, क्या आप समझ नहीं पाये?

भीम – समझ तो गया था केशव! लेकिन मुझे लगता है इस दुष्ट को धूल चटाने के लिए मुझे द्वंद्व के नियम एवं धर्मराज के वचनों की मर्यादा को तोड़ने की आवश्यकता नहीं है.

कृष्ण – “आपको क्या लगता है? बिना नियम भंग किये आप यह युद्ध जीत जाएंगे? बात मात्र द्वंद्व की नहीं है भ्राता, धर्म की विजय की है, यहाँ आप धर्म की विजय के यज्ञ की पूर्णाहुति के लिए लड़ रहे हैं, आपकी हार -जीत धर्म के भविष्य को निर्धारित करने जा रही है मंझले भैया!

भीम – लेकिन केशव! यँहा समस्त धर्मानुचारी एवं बलभद्र स्वयं उपस्थित है, वे प्रतिरोध भी करेंगे और युद्धोपरांत हमारी अपकीर्ति भी.

कृष्ण – “इनकी चिंता आप ना करें भ्राताश्री, दाऊ यदि इतने सम्बद्ध और सक्षम होते तो कब का परिणाम बदल चुके होते, यूं तीर्थाटन के नाम पर पलायन ना कर जाते. उनके पास शक्ति है लेकिन इच्छाशक्ति नहीं है. वो मर्यादाओं को ममत्व में देखते हैं लेकिन मर्यादाएं शून्य में नहीं उगती.

भीम – ” मेरे मन में द्वंद्व चल रहा है कान्हा, क्या मेरा ऐसा करना उचित होगा?

कृष्ण – द्वंद्व केवल एक ही जगह संभव है भैया भीम, यदि आपके मन मे द्वंद्व चलता रहा तो आप ये रणभूमि का द्वंद्व हार जाएंगे और साथ ही धर्म भी….

कौरवों के अजेय योद्धाओं को अर्जुन के द्वारा नष्ट किये जाने पर भी मैंने यह पूर्णाहुति आपके लिए निमित्त बनाकर रखी है भीम भैया, अब जाइये और कीजिये उस जंघा को भंग जहाँ ये दुष्ट दुर्योधन भरतकुल वधू द्रौपदी को बिठाना चाहता था. जाइये और निश्चिन्त होकर धर्म की विजय का मार्ग प्रशस्त कीजिये जिसके लिए मैंने आपको चुना है.

मात्र प्रहार कीजिये! बिना देखे की कमर से ऊपर है या नीचे बस गर्व कीजिये कि प्रहार अधर्म पर हो रहा है.

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द्वापर में आगे क्या हुआ आप जानते हैं, कलयुग में भीम क्या करेगा समझने के लिए बलराम की जगह न्यायपालिका, मानवाधिकार, अहिंसा, मर्यादा, संविधान
कृष्ण की जगह भारत की जनता जनार्दन
और भीम की जगह मोदी जी को रख के फिर से पढ़िये एक बार ये लेख…

तो है मंझले भैया भीम! तीन वर्ष हो गए हैं, अब भी यदि कमर से नीचे/ऊपर देखते रहोगे या मन मे द्वंद्व रखोगे तो धर्म की क्षति निश्चित जानो.

“फिर मेरे पास सुदर्शन उठाने के सिवा और कोई विकल्प नहीं होगा भ्राताश्री!”

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