आर्यपुत्र उत्तिष्ठ, इतिहास बार-बार मौका नहीं देता

गज़वा-ए-हिन्द (इस्लाम की भारत पर विजय) का गर्भाधान सन 1947 में तभी हो गया था जब शांतिदूतों को, बंटवारे में मिली उनके हिस्से की ज़मीन पर निर्मित देश पाकिस्तान जाने से रोक दिया गया था.

यह गर्भाधान किसके द्वारा सम्पन्न हुआ… सभी जानते हैं, यही बापू कहे जाने की पहेली का राज़ भी है. हमें ये तो बता दिया गया कि बापू माने राष्ट्रपिता हैं… पर ये नहीं बताया गया कि किस देश के.

तो आज जान लीजिए… गज़वा-ए-हिन्द होने के बाद जो देश बनेगा ‘ये’ उसी के निर्विवाद राष्ट्रपिता होंगे और ‘वे’ होंगे चचा जान.

गज़वा-ए-हिन्द करने के लिए शांतिदूतों को ज्यादा कुछ करने की जरुरत नहीं है… यह लोकतंत्र और हिन्दुओं की अकर्मण्यता ही उनके लिए गज़वा-ए-हिन्द का मार्ग प्रशस्त करेगा.

बस आधे से अधिक लोकसभा क्षेत्रों में अपनी आबादी 25-30% पहुंचा लेनी है. हम सब जानते हैं उनका मतदान 100% होता है और हिन्दुओं का वोट पचास खांचों में बंटता है.

ज्यादा गणित नहीं लिख रहा हूँ… पर जिन्हें शंका हो वो जनगणना के आंकड़े और शांतिदूतों की वृद्धि दर देख कर गणित लगा लें…

सन 2040 में यह स्थिति उत्पन्न होने वाली है. माने गज़वा-ए-हिन्द का गर्भकाल 90 वर्ष के आसपास हुआ (1947-2040). यह तो रही गज़वा-ए-हिन्द की कुंडली…

कश्मीर में गज़वा पहले ही हो चुका है… यदि सेना न हो आप कल्पना कर सकते हैं. केरल में जिस तरह से गौ वंश सरेआम काटा जा रहा है और राज्य सरकार, केंद्र द्वारा बनाए गए कानून को मानने से इन्कार कर रही है… यह भी गज़वा के धमक की आहट ही है.

कुछ लोग मानने से इन्कार कर सकते हैं… करते रहिए… तथ्य आपके कहने से या चाहने से तो बदलने वाले नहीं है.

अब से कुछ वर्ष पूर्व सभी सेकुलर भाई-बंधु केरल की साक्षरता दर… सामजिक समरसता और शांतिमय जीवनशैली का बखान करते नहीं अघाते थे.

आज देख लो क्या हाल है… स्वयंसेवक रोज मारे जा रहे हैं, गौ वंश सरेआम काटा जा रहा है. उच्च साक्षरता दर और समरसता की बत्ती बना कर कान खुजाइए…

अब प्रश्न यह उठता है कि हम क्या कर रहे हैं? हमने तो 2014 में मोदी सरकार बनवा कर अपने कर्तव्यों की इति श्री समझ ली है.

हम जैसे लोग जब मोदी सरकार को इन बातों पर काम न करने के लिए आलोचना करते हैं, तब हमारे ही कुछ साथी उचक कर ‘विकास-विकास-विकास’… ‘चुनाव-चुनाव-चुनाव’ रटना प्रारंभ कर देते हैं.

चुनाव प्रचार के लिए छह महीने पर्याप्त हैं. अंध भक्तों… चुनाव वाली मानसिकता से बाहर निकलो और सरकार पर जनसँख्या-जेहाद द्वारा होने वाले गज़वा-ए-हिन्द को रोकने के लिए कार्य करने का दबाव बनाओ.

आप अपने किसी निजी स्वार्थवश नहीं बना सकते… कोई बात नहीं… जो लोग दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें तो करने दीजिए, सहयोग नहीं कर सकते तो मुँह ही बंद रक्खो.

तुम्हारे ही जितवाने से सरकार नहीं बनेगी… हम जैसे कट्टर सांप्रदायिक (जो भी उचित लगे) लोगों का 2014 में किसी से कम सहयोग नहीं है… न ही 2019 में किसी से कम होगा.

जिसके पास दो छटांक भर का भी दिमाग है वह समझता है कि एकाएक सब कुछ नहीं होगा… पर उस दिशा में काम तो होना चाहिए न.

याद रखना… ये बड़े-बड़े पुल… सड़कें… कॉलेज… अस्पताल सब एक मृग मरीचिका के समान हैं, जो गज़वा-ए-हिन्द की आग को दो दिन भी न झेल सकेंगे.

हमारे पास एक तरफ हिमालय पर्वत है जिसे हम पार कर नहीं सकते और तीन तरफ महा सागर जो डूबने के लिए पर्याप्त होगा नहीं… इसलिए संघर्ष ही एक मात्र विकल्प है.

आर्यपुत्र उत्तिष्ठ… इतिहास बार-बार मौका नहीं देता…

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