इन दुष्टों का बहिष्कार और उनको दण्डित करके के लिये आगे आये वंचित समाज

श्रृंगेरी मठ के एक पूज्य आचार्य का कहीं का प्रवास था. रास्ते में जनजातियों का गाँव आया. जब गाँव वालों को पता चला कि उनके पास से श्रृंगेरी मठ के एक पूज्य आचार्य गुजरने वाले हैं.

उनमें से कुछ लोग उनके पास पहुँचे और उनसे निवेदन करते हुए कहा कि पिछले सैकड़ों वर्षों से उनके गाँव में कोई भी आचार्य नहीं पहुंचे, ईश्वर की कृपा है कि आपके पूज्य चरण हमारे यहाँ पड़े हैं अतः आपसे अनुरोध है कि कुछ दिन हमें आपकी सेवा का मौका दें.

आचार्य अनुरोध को टाल न सके और वहां कुछ दिन रुकने का निश्चय किया. जब रुके तो गाँव की जनजातियों ने उनसे कहा कि हमको हमारे रामलला की कथा सुननी है, हमें कथा सुनाइए.

आचार्य राम की कथा सुनाते और पूरा समाज भाव-विभोर होकर ये कथा सुनता.

जब कुछ दिन बाद आचार्य जाने लगे तो अब उनके पास आसपास के कई वनवासी गाँवों के लोग खड़े थे और शिकायत कर रहे थे कि आपने हमें पहले सूचित नहीं किया इस कारण हम इस दिव्य कथाश्रवण से वंचित रह गये इसलिये वचन दीजिये कि आप शीघ्र ही दुबारा यहाँ आयेंगे और हमें प्रभु राम की कथा सुनायेंगे.

आचार्य वचन देकर लौटे.

श्रृंगेरी मठ के वो आचार्य जिनके गाँव में थे वो दरिद्रता और अभाव का जीवन जीने वाले वनवासियों का गाँव था, मगर उनकी दृष्टि देखिये, पवित्र भावना देखिये, उन्होंने उनसे रूपए-पैसे-कपड़े नहीं मांगे, किसी सुविधा की मांग नहीं की, मांग की तो केवल रामकथा श्रवण की. उनकी भूख रुपये-पैसे की नहीं थी, भगवान राम का पवित्र आख्यान सुनने की थी.

कल एक मित्र से एक रोचक बात सुनने को मिली. उन्होंने एक सत्य प्रसंग के माध्यम से वंचित समाज की परमवीर हनुमान के प्रति क्या भावना है वो बताया.

वो कहते हैं कि 2010 में जब अयोध्या रामजन्मभूमि का फैसला आने वाला था तब विश्व हिंदू परिषद ने तय किया था कि वो हर बस्ती में कम से कम 11 बार हनुमान चालीसा पाठ का आयोजन करेगा और फिर उसके पश्चात् हनुमान जी का पत्रक बांटेगा.

उसी सिलसिले में ये मित्र भी अपने कुछ मित्रों के साथ एक वाल्मीकि बस्ती में गए थे और वहां जाकर घर-घर में संपर्क किया था. वो हर घर में पत्रक लेकर जाते, देने के लिये हाथ बढ़ाते तो पुरुष तो हाथ जोड़ कर वहां से निकल जाते पर महिलायें ले लेतीं.

स्थानीय मंदिर में जब ये लोग पहुंचे तो वहां कुल मिलाकर पांच पुरुष ही जुटे. संख्या देखकर ये सब लोग निराश थे कि अभियान सफल नहीं हो पाया पर फिर भी पाठ शुरू किया गया.

पाठ ख़त्म होने के बाद जब इस बारे में वहां के लोगों से पूछा कि आप सबका रुख इतना असहयोगात्मक क्यों था? तो एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने बताया कि आप लोग इस समय 8 बजे सायं में आये हो इसी कारण उन्होंने हनुमान जी वाला पत्रक नहीं लिया?

इन सबको कुछ समझ नही आया तो फिर पूछा कि ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा कि हम हनुमान जी की मूर्ति या फोटो को शराब या नशा करने के बाद हाथ नहीं लगाते, पाप लगता है और हमारी बस्ती में कोई भी ऐसा नहीं करता.

इसका मतलब ये है कि भारत के बहुसंख्यक वंचित समाज भगवान राम, बजरंगबली, गंगा, गीता, गाय सबसे प्रति अतिशय श्रद्धा रखता है, उसके अन्दर अपने धर्म, अपने महापुरुष और अपने शास्त्रों के बारे में सुनने की भूख है.

मेरे गाँव के सारा वंचित समाज छठ जैसा पर्व पूरी आस्था से मनाता है, घर के सामने महावीर जी (हनुमान जी) की ध्वजा लगाता है. ये तो उसकी कल्पना से भी बाहर है कि कोई उनके बजरंग बली की मूर्ति या तस्वीर पर थूक सकता है या उसका अपमान कर सकता है.

पर दुर्भाग्य है कि ये हुआ और करने वाले खुद को इसी समाज का बता रहे हैं इसलिये जिन्होंने भी भारत के वंचित समाज के करोड़ों लोगों के आराध्य का अपमान किया है, जरूरी है कि उन्हें उनका समाज ही सबक सिखाये, उन्हें अपने से अलग करे, उनका सामाजिक बहिष्कार करे.

और उनसे कहे कि हाँ, मैं वंचित हूँ, मैं बाबासाहेब का अनुयायी हूँ पर तुम्हारे जैसा नहीं हूँ. उनसे कहे कि राम और हनुमान वंचित समाज के भी उतने ही अपने हैं जितने सवर्ण या किसी और समाज के, तुम जिनके हाथों की कठपुतली बनकर खेल रहे हो उससे हमारे समाज का कोई ताअल्लुक नहीं है.

आज वंचित समाज खुद आगे आकर इन नीच लोगों को अपने से अलग करते हुए आदर्श प्रस्तुत करे और इस संदेश को और आगे लेकर जाये.

जय श्रीराम… जय बजरंग बली…

श्रीहनुमान के चित्र का अपमान का दुर्भाग्यशाली वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

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