इस शैक्षिक व्यवस्था में इतना दम नहीं कि किसी गिरे हुए को उठा सके

यहाँ बहुत से लोग ज्ञान दे रहे हैं कि बोर्ड में नम्बर कम आ गए तो निराश नहीं होना, जीवन यहाँ समाप्त नहीं होता आदि. वास्तविकता यह है कि आज भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में प्रवेश के लिए 60% अंक प्राप्त करना अनिवार्य है.

जेईई मेन (जिसे हमारे जमाने में AIEEE कहा जाता था) उत्तीर्ण करने पर जिन संस्थानों में प्रवेश मिलता है उन्हें आईआईटी से कमतर माना जाता है. राज्य स्तरीय तकनीकी शिक्षण संस्थान NIT से निचले दर्जे की हैसियत रखते हैं.

आप आज भी 80% से कम अंक प्राप्त करने पर बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड साइंस में प्रवेश नहीं पा सकते. दिल्ली विश्वविद्यालय के नामचीन महाविद्यालय जैसे कि सेंट स्टीफेंस में 90% से ऊपर अंक प्राप्त करने वालों को ही प्रवेश मिलता है.

भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) की चयन प्रक्रिया में जो फॉर्मूला प्रयोग में लाया जाता है उसमें हाई स्कूल इंटर के अंकों को भी महत्व दिया जाता है. भारतीय रिज़र्व बैंक में ग्रेड बी अधिकारी बनने के लिए इंटरमीडिएट और स्नातक में 60% अंक प्राप्त करना अनिवार्य है.

पायलट बनने के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी में प्रवेश पाने के लिए 60% अंक अनिवार्य हैं. इसी तरह सशस्त्र सेनाओं में प्रवेश पाने के लिए भी इण्टर और स्नातक स्तर के अभ्यर्थियों के लिए कुछ न्यूनतम अंक प्रतिशत की अर्हताएं निर्धारित की गयी हैं.

जबकि सिविल सेवा परीक्षा, बैंकों में अधिकारी/ लिपिकीय संवर्ग की संयुक्त परीक्षा एवं कर्मचारी चयन आयोग से मिलती जुलती परीक्षाओं में अंक प्रतिशत की कोई बाध्यता नहीं है.

देश में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) जैसे उत्कृष्ट संस्थान भी हैं जहाँ अंक प्रतिशत की बाध्यता नहीं है.

ये किस प्रकार की व्यवस्था है साहब? कोई छात्र यह कैसे तय करे कि उसे अपना भविष्य कैसे संवारना है?

हमारे जमाने से बहुत पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में प्रवेश के लिए अंक प्रतिशत की बाध्यता नहीं थी. उस जमाने के पढ़े हुए लोग क्या आज घास छील रहे हैं?

मुझे तो ऐसा नहीं लगता. बल्कि आईआईटी नामक ब्रांड तो 50 वर्षों में उन्हीं लोगों के योगदान से बना जिन्हें बोर्ड परीक्षा में प्राप्तांक के आधार पर प्रवेश नहीं दिया गया था.

क्या आप जानते हैं कि आज स्कूलों की स्थिति क्या है? स्थिति यह है कि स्कूल मनमाना ढंग से प्रीबोर्ड कही जाने वाली एक परीक्षा लेते हैं और मार्च में बोर्ड का इम्तिहान हो जाने के पश्चात प्रीबोर्ड के आधार पर विज्ञान, वाणिज्य और मानविकी में छात्रों को बाँट देते हैं.

प्रीबोर्ड, बोर्ड की परीक्षा से कई माह पूर्व ली जाती है. परंतु सीबीएसई तो यह मान कर चलता है कि पाठ्यक्रम पूरे एक वर्ष अर्थात् अप्रैल से आरंभ होकर अगले वर्ष फरवरी तक के लिए बनाया गया है.

क्या कभी किसी ने प्रश्न किया कि कोर्स समाप्त करने की निर्धारित समयसीमा से पूर्व इस प्रीबोर्ड का औचित्य क्या है?

स्कूल का प्रशासन जानबूझकर प्रीबोर्ड में कठिन प्रश्न पूछता है जो एनसीईआरटी की पुस्तकों से नहीं बल्कि साइड बुक की सहायता से बनाये जाते हैं.

ऐसे में छात्र कोचिंग ट्यूशन पढ़ने को बाध्य होता है क्योंकि उसे समझ में नहीं आता कि सिद्धांत तो मैंने पढ़ लिए हैं लेकिन प्रश्न कहीं और से आ गए तो क्या होगा. बहुत सी साइड बुक में तो आवश्यकता से अधिक चीजें बताई गयी होती हैं जो कोर्स से बाहर की होती हैं.

इसी का डर दिखाकर स्कूल के टीचर क्लास के बच्चों को अपनी कोचिंग में बुलाते हैं. वरना एनसीईआरटी की पुस्तकें इतनी कठिन होती ही नहीं कि उसके लिए कोचिंग करने की आवश्यकता पड़े.

इस प्रकार से छात्रों और माँ बाप को ठगा जाता है ताकि साइड बुक लिखने वालों और कोचिंग वालों का धन्धा चलता रहे. इस कुचक्र में फंस कर निकलने की क्षमता हर छात्र में नहीं होती.

यह शैक्षिक जातिवाद है. विज्ञान पढ़ने वाला ब्राह्मण, वाणिज्य वाले वैश्य और मानविकी वाले शूद्र माने जाते हैं. उसी प्रकार 90% वाला ऊँची जाति का, 60% वाला उससे नीचे और जिसका 60% नहीं आया उसकी दुनिया ख़तम हो जाती है.

आप माने या न माने हमारे देश में अच्छे अंक प्रतिशत लाने वाला और बढ़िया माने जाने वाले संस्थान में पढ़ने वाले का समाज में मान सम्मान होता है.

इसका अर्थ यह हुआ कि जो ज्यादा अंक नहीं ला पाता वह जीवन भर स्वयं को कोसता है. यह कड़वी सच्चाई है.

यह कह देने से समस्या हल नहीं हो जाती कि ‘अरे कोई बात नहीं… अभी तो बहुत आगे जाना है.’

जब टीवी पर न्यूज़ चैनल पर 99% लाने वाले की बाइट ली जाती है तब हर माँ बाप का सीना कचोटता है साहब. इस जातिवाद को समाप्त करना है तो यह कहना ही छोड़ दीजिये कि फलाने का इतना या उतना नम्बर आया.

जैसे आप हिंदुओं में जातिवाद समाप्त करने की बात करते हैं उसी प्रकार इस शैक्षिक जातिवाद को समाप्त कीजिए.

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि हमारी शैक्षिक व्यवस्था में इतना दम नहीं है कि किसी गिरे हुए को उठा सके या किसी कमजोर को सहारा दे सके.

जिस 90% वाले की आप प्रशंसा कर रहे हैं हो सकता है कि वो जीवन में आगे जाकर मुँह की खाये और जिस 50% वाले को आप सांत्वना दे रहे हैं हो सकता है कि वह मीलों आगे निकल जाए.

मान लीजिए कोई विज्ञान पढ़ना चाहता है और स्कूल ने उसे प्रीबोर्ड में प्राप्तांक के आधार पर PMC ग्रुप नहीं दिया. क्या हमारे देश की व्यवस्था ऐसी है कि उसे इंजीनियर वैज्ञानिक नहीं तो कम से कम Science Journalist बना सके?

क्या हमारे देश की व्यवस्था ऐसी है कि किसी Humanities पढ़ने वाले को हंटिंगटन, हेनरी किसिंजर, फुकुयामा, रॉबर्ट कपलान जैसा महान राजनीतिक कूटनीतिक विचारक बना सके?

क्या हमारे प्रबंधन संस्थानों में इतनी कुव्वत है कि जमशेद जी टाटा जैसा उद्योगपति बना सके? मान लीजिये किसी इण्टर के बच्चे का NDA में चयन नहीं हुआ तो क्या हमारे देश की व्यवस्था ऐसी है कि हम उसके जज़्बे को जिन्दा रख सकें और उसे सामरिक चिंतक बना सकें?

नहीं है न! तब अंक प्रतिशत के आधार पर जातियों का विभाजन क्यों किया जाता है? मैं यहाँ सामाजिक आधार पर भेदभाव छुआछूत की बात नहीं कर रहा हूँ. आप व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवाज उठाईये.

अच्छे नम्बर लाने वाले को शाबाशी और कम नम्बर लाने वाले को सांत्वना देने की नौटंकी मत कीजिए अन्यथा आप भी कांग्रेस द्वारा प्रदान किये गए ‘कोई फेल नहीं होगा’ वाले आरक्षण का प्रत्यक्ष समर्थन करते दिखाई पड़ेंगे.

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