आज अपेक्षा कर रहे हैं, कल मजबूर करेंगे, बस देखते जाइए

2015 में न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू साहब ने और 2016 में दिल्ली के कानून मंत्री रहे कपिल मिश्र ने फ़रमाया था कि रमज़ान में हिन्दुओं को भी रोज़े रखने चाहिए ताकि मुसलमानों को हिन्दुओं की सदाशयता का परिचय मिल सके.

वैसे तो मैं इन लोगों को इस लायक ही नहीं मानता कि इनकी मूर्खतापूर्ण बातों पर कोई टिप्पणी की जाये, परन्तु ये बयान थोड़ी चीरफाड़ माँगते हैं, विशेषकर ये देखते हुए कि कुछ हिन्दू ऐसा करने भी लगे हैं.

इन लोगों को लेकर कभी आश्चर्य नहीं हुआ परन्तु जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी कैम्पस के विभाग प्रमुख रहे और वर्तमान में भाजपा के मुखपत्र कमल सन्देश के सह-सम्पादक संजीव सिन्हा ने कल पूरे 30 दिन तक रोज़े रखने की घोषणा की, तो ना केवल आश्चर्य हुआ बल्कि वितृष्णा भी हुयी.

मैं इस तरह के बयानों और कारनामों को मात्र कुछ लोगों के व्यक्तिगत बयान और काम के रूप में नहीं देखता बल्कि उस स्ट्रेटजी के एक भाग के रूप में देखता हूँ, जो मुसलमानों द्वारा पूरी दुनिया में अपनायी जाती है और जिसमें काटजू, मिश्र और सिन्हा जैसे अन्य धर्मी भी जाने अनजाने सहयोग करते हैं.

पहले इस बात का रोना रोकर कि देश का बहुसंख्यक समाज हमारे साथ अन्याय कर रहा है, हमारे साथ भेदभाव किया जा रहा है और हमारी धार्मिक स्वतंत्रता का हनन किया जा रहा है. फिर मीडिया, अपने संगठनों और दूसरे मजहबों के काटजू औेर मिश्र टाइप लोगों के जरिये सरकार पर दबाव बनाओ.

सरकारों द्वारा बातचीत के लिए बुलाने पर पचासों किस्म की माँगें परोस दो. अपनी जनसँख्या रुपी ताक़त के बल पर अपने लिए अधिकार (राइट्स) हासिल करो और फिर उन्हें अपने विशेषाधिकारों (प्रिविलेज) में बदल दो.

इसके बाद उस देश की बहुसंख्यक जनता का ही जीना हराम कर दो और उनके हिसाब से खुद को परिवर्तित करने की बजाय उनको अपने हिसाब से बदलने के लिए मजबूर करो.

ऐसा न होने की स्थिति में दंगा-फसाद, लड़ाई-झगड़ा, मारपीट करो और बहुसंख्यकों को ही भय के साये में रहने के लिए मजबूर करो.

किसी भी देश को उठा कर देख लीजिये, यही मिलेगा. ये अलग बात है कि जहाँ मुसलमान खुद बहुसंख्यक हो, वहां अल्पसंख्यकों को जीने के मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देते हैं और दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखते हैं.

यही तरीका भारत में भी अपनाया जाता है मुसलमानों द्वारा और स्वघोषित गौ भक्षक काटजू औेर मिश्र जैसे नामधारी हिन्दू पर कामधारी मुसलमान इसमें उनका हथियार बनते हैं.

याद कीजिये वो प्रसंग, जब संसद की कैंटीन में शिवसेना के दो सांसदों द्वारा किसी मुसलमान कर्मी के मुँह में जबरदस्ती रोटी ठूँसने की घटना को एक रोज़ेदार का रोज़ा तोड़ने के प्रयास के तौर पर पेश कर जम कर बावेला मचाया गया था.

निश्चित रूप से उन सांसदों द्वारा खराब खाने की शिकायत का ये तरीका आपत्तिजनक था और उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था. परन्तु इसके पीछे किसी रोज़ेदार का रोज़ा तोड़ने जैसा मक़सद तो कतई नहीं था उनका क्योंकि उन्हें क्या पता कि वो कर्मी मुसलमान है.

पर, बवाल मचाया गया और जम कर मचाया गया और ये सन्देश देने की कोशिश की गयी कि इस देश में मुसलमानों को उनके धार्मिक कृत्य भी नहीं करने दिए जा रहे.

मैं काटजू और मिश्र के बयान को इसी घटना के आगे की कड़ी के रूप में देखता हूँ, अलग करके नहीं. चूँकि मुसलमानों के साथ अन्याय हो रहा है और उन्हें उनके धार्मिक कृत्य करने में बाधा आ रही है, इसलिए हिन्दू अपनी सदाशयता दिखाने के लिए उनके साथ रोज़ा रखें, इस बयान का सही मतलब ये है.

पर इसके आगे क्या होगा?

वही, जो दुनिया भर में मुसलमानों का मोडस ऑपरेंडी है. मूर्ख हिन्दुओं की तो कोई कमी है नहीं इस देश में, तो मुसलमानों के साथ रोज़ा रखने के लिए कई हिन्दू बढ़-चढ़ कर आगे आएंगे और खुद को सांप्रदायिक सौहार्द्र का मसीहा बनाएंगे.

जब मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, तब तक इस तरह की एक खबर मेरे संज्ञान में आ भी गयी है जिसके अनुसार महोबा के कुछ हिन्दुओं ने मुसलमानों के साथ रोज़ा रखने का फैसला किया है.

बुंदेली समाज नामक संगठन के संयोजक तारा पाटकर के द्वारा इसका आयोजन किया जा रहा है और साम्प्रदायिक सौहार्द्र की दिशा में इसे एक बड़े कदम की तरह पेश किया जा रहा है. सिन्हा जी तो फेसबुक पर घोषित करके और मुगलकाल में मुसलमानों की साम्प्रदायिक सद्भावना के किस्से सुना-सुना कर खैर कर ही रहे हैं.

इन लोगों की तरह कई और मूर्ख हिन्दू भी इसी राह पर चल पड़ेंगे, इसमें भी शंका करने का कोई कारण नहीं.

जब एक बड़ा वर्ग ऐसे मूर्ख हिन्दुओं का तैयार हो जायेगा, तब अगला कदम होगा ये कहना कि जो हिन्दू रोज़े में भी खाना खाते हैं, वो मुसलमानों की भावनाओं के प्रति संवेदनहीन हैं और उन्हें ये ख्याल रखना होगा कि इससे मुसलमानों को अपने धार्मिक कृत्य के निर्वहन में कठिनाई होती है.

अतः बेहतर ये है कि मुसलमानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए हिन्दू भी रमज़ान के दिनों में रोज़े रखें और अपने दैनिक क्रियाकलाप इस भाँति करें, जिससे मुसलमानों को कठिनाई न हो.

उसके बाद शुरू होगा, उन हिन्दुओं पर हमलों का दौर जो इसका पालन नहीं करते और उन्हें मजबूर किया जायेगा वो भी वैसे ही रहें रमज़ान में, जैसे मुसलमान रहते हैं.

आखिर, मुस्लिम बहुल संस्थाओं के हास्टल्स आदि में कैंटीन बंद कर ही दी जाती हैं रमज़ान के दौरान, बिना ये सोचे कि इनमें रहने वाले हिन्दू क्या करेंगे ऐसे में. सीधा सा सन्देश है कि आप भी रोज़े रखें और मुसलमानों के साथ सहयोग करें.

आपको लग रहा है कि ये सब मेरे मन की उपज है और ऐसा कुछ नहीं होने वाला. आप सोच सकते हैं ऐसा, इसलिए कि किस्मत से अभी आपको इस तरह का कुछ झेलना नहीं पड़ा है.

पर ऐसा हो ही नहीं सकता, आपका ये सोचना बिलकुल वैसा ही है, जैसे किसी बिल्ली को देखकर कबूतर का आँखें बंद कर ये सोचना कि खतरा दूर हो गया.

कभी ब्रिटेन या फ़्रांस जैसे देशों के नागरिकों को भी लगता था कि ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता, पर आज वहां शरिया ज़ोन बना लिए हैं मुसलमानों ने, जिनमें आपको रहना है तो शरिया कानून के हिसाब से ही रहना होगा, चाहे आप किसी भी मत को मानने वाले हों.

यहाँ भी, जहाँ उनकी चलती है, मुसलमान यही कर रहे हैं, बिना किसी रोकटोक. आज आप पर जोर नहीं चल रहा इसलिए आपसे अपेक्षा कर रहे हैं, कल मजबूर करेंगे. देखते जाइए.

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