भारत के महान योगी : जब शिष्य की साधना सिद्धि के लिए गुरु ने त्याग दिए प्राण

सर्वानंद के दादा जगद्जननी महामाया के घोर उपासक थे. कर्मनिष्ठ तांत्रिक मार्ग पर सिद्धिप्राप्त रहे. अंतिम समय तक उनको दर्शन नहीं हुए, संकेत मिला कि उनके ही परिवार में कोई सिद्धि प्राप्त करेगा.

ये आसाम की बात है. समय अठारवीं शताब्दी के लगभग.

यहां ध्यान देने की बात है कि सिद्धिप्राप्त महापुरुष थे, तब आगे लगे थे. वो अलग ही वैभव होता है. अब जिसको थोड़ा आधार पता होगा वो समझ जाएगा.

दादा का नाम विस्मरण हो गया, कुछ भी हो, ये ब्राह्मण शाक्त कुल के रहे. पूर्णानंद इनके निकटतम अभिषिक्त शिष्य रहे. पूर्णानंद शूद्र वर्ण से थे.

सर्वानन्द बचपन से ही मंदबुद्धि पैदा हुए थे. पूर्णा दादा से उनका असीमिति स्नेह था. पूर्णा भी सर्वानंद की रक्षा अपनी संपत्ति समान करते थे. उनको अपने गुरूवचनों पर विश्वास था. पूर्णा की सिद्धि भी सर्वानंद से जुड़ी थी.

पिता की मृत्यु के बाद मेहार राजा के यहां से उनके परिवार का वो प्रभुत्व नहीं रहा. सर्वा के बड़े भाई थोड़ा शास्त्र पढ़े लिखे थे, तो काम चल जाता था, बाकी गुरुकुल से जो शिष्य लोग लाकर देते थे, उससे घर का खर्च.

पूर्णा कभी कभी सर्वा को देखकर उदास हो जाते थे. कहाँ तो गुरुवचन और कहां से मेरा सर्वा इतना मंदबुद्धि हुआ है. पर उसका पूरा ध्यान रखते थे. एक क्षण नजर से ओझल नहीं होने देते थे.

एक दिन किसी कारणवश बड़ा भाई राजा के सामने नहीं जा पाया. दैवमाया थी कि सर्वानंद को भेज दिया गया. पहली बार राजदरबार में सर्वा आया था, वैभव देख कर आश्चर्य से देखने लगा.

इधर उधर टपराते देख राजन ने पूछ लिया, बताओ आज क्या तिथि है ?

सर्वा हड़बड़ा गया और मुख से निकल पड़ा , पूर्णिमा है.

राजदरबार हंसी के ठहाकों से गूंज पड़ा, जो उस परिवार से चिढ़ते रहे उनको भी खुन्नस निकालने का अवसर मिल गया था.

रे मूर्ख, कैसे ब्राह्मण कुल का जन्मा है? तिथि का ही ज्ञान नहीं? अमावस्या को पूर्णिमा कहता है? कलंक है तू.

इतना उपहास देखकर बुझे थके मन से सर्वा तेजी से दरबार से निकल गया.

सर्वानन्द अपने ऊपर हुए उपहास से घोर दुखी हो गया. उसके मन में आत्महत्या के विचार आने लगे. तेज गति से वो जंगलों की ओर निकल गया, नदी में कूद कर प्राण ही त्याग देने हैं.

इधर पूर्णा बाबा को खबर मिल चुकी थी कि सर्वा को दरबार भेजा गया है. अनहोनी की आशंका से विकल होकर पूर्णा बाबा सर्वा की खोज में निकल गए.

नियति को कुछ और ही करना था.

सर्वानंद जंगल में वहां पहुंचे जहां वशिष्ठ मुनि स्थापित शक्ति केंद्र था. निर्जन सुनसान जंगल, जानवरों और पक्षियों की आवाज के सिवाय उन घने पेड़ों के होते अंधकार वाले क्षेत्र में कोई नहीं था.

पूर्णा बाबा को पता था कि दुखी होने पर सर्वा कहाँ जाता है. उपहास होने की बात से उनके मन में अधिक चिंता थी और राजा पर भयंकर क्रोध भी.

सर्वा को यंत्र दिखने लगा, मंत्र प्रकट हो गया. ये इतना तेजी से हुआ कि समझ नहीं आया. जागृत स्थान और शुभ मुहूर्त ने अपना काम कर डाला था. पर करना क्या है अब, ये पता नहीं था. असमंजस की स्थिति में सर्वा था, इतने में वहां पूर्णा बाबा पहुंच गए.

तुरंत गले लगाया और कहा, पगले ऐसे कोई नाराज होते हैं क्या , चल घर चल, सब प्रतीक्षा कर रहे हैं, मेरे साथ चल.

सर्वानन्द ने कहा, बाबा मेरे साथ ऐसे ऐसे हुआ, आगे क्या करना है मुझे पता नहीं.

तुरंत पूर्णानंद के शरीर में रोमांच हो आया. जिस महाक्षण की प्रतीक्षा जीवन भर की थी, वो क्षण आ चुका था. वो आश्चर्य से सर्वा को देख रहे थे. सबकुछ सम्भव मालूम हो रहा था.

तू यहीं रुक, मैं अभी आता हूँ. समय बहुत कम है. ये कहकर पूर्णा बाबा तेजी से गाँव को चले गए.

पूर्णानंद गाँव में अपने घर गये और बरसों से बंद सन्दूकची को खोला. एक यंत्र और उसमें कुछ और सामान को बरबस देखते रहे. फिर लेकर तेजी से सर्वा के पास दौड़ गए. घर में कह दिया था कि प्रतीक्षा मत करना, हम लेट आएंगे. सो जाना.

घने जंगल में सर्वा वहीं बैठा था. पूर्णा बाबा ने जब यंत्र दिखाया तो सर्वा चौंक कर बोला, दादा यही दिखा था. एक एक बीजमंत्र वही है. मंदबुद्धि सर्वा के मुख से ये सुनकर पूर्णानंद बाबा प्रसन्नचित्त हो गए. बोले कि चल काम आरम्भ करते हैं.

सर्वा बोला, पर बाबा करना क्या है ?

पूर्णा बाबा बोले, पगले आज महासिद्धि का दिवस है. तुम्हें शवसाधना करनी है.

सर्वा अचकचा गया, बाबा वो तो ठीक है पर शव कहाँ है ?

पूर्णा बाबा कहे कि मैं शव हूँ. मेरे शरीर के ऊपर तुझे साधना करना है. मैं योगसिद्धि से शरीर छोड़ दूंगा.

ये सुनते ही सर्वा बोले, बाबा चाहे कुछ हो जाये मैं ये काम नहीं करने वाला, मुझे कोई सिद्धि विद्धि नहीं करनी है.

पूर्णा बाबा को पता था, सर्वा उनसे अत्यधिक प्रेम करता है. गुरुवचनों के सिद्ध होने का समय है और लड़का अब टाल रहा है. पूर्णा बाबा कहे कि देख, समय बीत रहा है, तुझे ऐसा करना ही होगा.

सर्वा भी अपनी बात पर अड़ गया कि दादा, इस कीमत पर तो मैं कुछ भी नहीं करूंगा. चाहे कुछ हो जाये.

पूर्णानंद को पता था, सर्वा चाहे मंदबुद्धि हो, पर हठी बहुत है, एकबार जो दिमाग में आ गया, उससे विचलित नहीं होगा.

पूर्णा बाबा ने उपाय प्रस्तुत किया, देख सर्वा, जब माँ दर्शन दे दे, तब तू कहना कि पूर्णा दादा से पूछो क्या चाहिए. माँ मुझे जीवित कर देंगी. अब देख तू साधना शुरू कर दे.

सर्वा दुखी था, पर ये बात मान गया. योगक्रिया से पूर्णा बाबा ने शरीर त्याग कर दिया. निष्प्राण शरीर के ऊपर सृष्टि की चेतन शक्ति के अभिषिक्त और प्रकट होने का अवसर आ चुका था. साधना आरम्भ हुआ.

जैसे जैसे बीजमंत्र का जप चल रहा था वैसे वैसे जंगल की भयावहता भी बढ़ रही थी. सिंह गर्जना से लेकर सियार के रुदन की आवाज और उल्लुओं की चीखों से भी वातावरण भयंकर रूप से जागृत हो चुका था. मायावी शक्तियां भी अपना अपना अधिकार चक्र में बैठे सर्वा को डुला देने को जैसे चलने लगी थीं. भयंकर रूप सामने प्रस्तुत हो रहे थे.

मानव शरीर में स्थित कमजोरियां और शक्तियां अपने ऊपर चेतन को अवस्थित नहीं होने देती, वही रूप बाह्य में विरोध रूप में उपस्थित हो रहा था. सर्वा का भाग भोग मन के साम्य में स्थित था. कर्म उपस्थित हो सकता है पर साधक नहीं हिलता.

रात्रि का प्रहर बीतने के साथ ही सब शांत हो गया. नीलवर्णा महाभगवती जगद्जननी जगदंबा साक्षात सामने थी. करुणा स्वरूप चेतन शक्ति महामाया के प्रेम की तरंग सुगंधित वातावरण से अलग ही संसार की गोपनीयता को प्रत्यक्ष कर रही थी. माँ को सर्वा ने प्रणाम किया, कुंडलिनी रूपिणी महाशक्ति को सामने देख पा रहा था.

महामाया ने पूछा, वत्स क्या चाहिए.

सर्वा बोला, पूर्णा बाबा बताएंगे माँ.

महाशक्ति ने तथास्तु किया.

पूर्णा बाबा ने आंखें खोली. आनन्द मन से जगद्जननी को प्रणाम किया स्तुति की. महामाया ने पूर्णा दादा से पूछा, क्या चाहिए पूर्णा ?

पूर्णा बाबा बोल पड़े, जगद्जननी, आज राजदरबार में सर्वा का अपमान हुया है. आप तो सर्व सिद्ध करने वाली हो. सर्वा ने पूर्णिमा कह दिया है. आज अमावस्या है, सर्वा की बात सिद्ध करो.

जगद्जननी ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गयी.

मेहार के लोग आंख मल मल कर घरों से बाहर निकल कर देख रहे थे. ये कैसा अचम्भा है,अमावस्या को पूर्णिमा का चंद्र कैसे ? कोई भ्रम तो नहीं ? राजन ने भी देखा और उसे अचम्भा हुआ.
सवेरे होने पर सर्वा और पूर्णा घर को चले गए. सवेरे का सूर्य और पक्षियों की चहचहाहट किसी अलग भविष्य का उद्घोष कर रही थी.

जब मेहार में अमावस्या को पूर्णिमा का चंद्र दिखा तो प्रजा समेत राजा को भी आश्चर्य हुआ. उसको पिछले दिन का घटना स्मरण हो आया. भ्रम की स्थिति हो गयी. अमावस्या तो तिथि के हिसाब से रही. पर देखा तो पूर्ण चंद्र. उस बालक ने कहा था पूर्णिमा है. राजन ने दिन में सर्वा से मिलने का निर्णय लिया.

राजा सर्वा के घर पहुंचे. दालान पार कर कमरे में पहुंचे. सर्वा किसी पुस्तक में मन रमाये बैठे थे. ये सर्वा वो नहीं लग रहा था जो एक दिन पहले राज दरबार में मूर्ख की भांति उपस्थित था और भाग गया था. राजा के आने से वैसे भी घर में भीड़ हो गयी थी.

राजा देख रहा था कि अलग प्रकार का ओज तेज सर्वानंद के मुख मंडल पर है. सर्वा ने अपना सिर उठाया.

“कैसे हो राजन ?” इस वाक्य में ही अलग बात था. राजा चुपचाप रहा. कुछ देर बाद जब चेतन हुआ तो वार्तालाप शुरू हुआ. राजा आश्चर्यचकित था कि एक दिन पहले मूर्ख कहा जाने वाला साधिकार तत्व चर्चा कैसे कर पा रहा है. उसे समझ नहीं आ रहा था.

ये आपके अठारहवीं शताब्दी की बाते हैं जो सामाजिक राजनीतिक इतिहास का तो कतई हिस्सा नहीं हैं.

(पुस्तक सन्दर्भ – भारत के महान योगी)

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