इस क्रंदन से ही समझ आएगा मोदी सरकार होने का मतलब

चीन ने, अरब सागर पर अपनी पहुंच बनाने के साथ, भारतीय उपमहाद्वीप पर पकड़ बनाने के लिये, पाकिस्तान द्वारा सामरिक व आर्थिक दृष्टि से चीन का उपनिवेश बनने की मौन स्वीकृति पर, गिलगिट बाल्टिस्तान के रास्ते बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक पहुंचने की अपनी एक अति महत्वाकांक्षी परियोजना ‘चीन पाकिस्तान इकॉनमी कॉरिडोर’ (CPEC) पर बहुत कुछ दांव पर लगा दिया है.

वैसे तो चीन बहुत शक्तिशाली है और उसको पाकिस्तान से भी भरपूर सहयोग मिल रहा है लेकिन इस CPEC की राह अब इतनी आसान भी नहीं रह गयी है.

2014 से पहले चीन के लिये विश्व की परिस्थितियां अलग थी और उसकी राह में आने वाले अवरोध भारत की भी स्थिति दूसरी थी. लेकिन आज जिन भूखंडो से चीन इसका रास्ता बना रहा है, उन्हीं की वैधानिकता पर ही प्रश्न खड़े हो गए है.

नए भारत की नीतियों के बदलाव के बाद से पिछले 2 वर्षो से बलूचिस्तान में पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े को लेकर खूनी जंग तेज हो गयी है और उसके शिकार अब वहां काम कर रहीं चीनी कम्पनियां और उनके लोग भी हो रहे है.

बलूचिस्तान के लोग यह जानते हैं कि पाकिस्तान के हाथ से वह निकलते जा रहे है और इसलिए पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को पूरी तरह चीन के ही हवाले कर दिया है.

आज अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर जहाँ बलूची लोग सफलतापूर्वक अपनी बात कहने में सफल हो रहे हैं, वहीं भारत की बदली बलूच नीति ने वहां चीन की इस परियोजना को और महंगा और दुरूह करना शुरू कर दिया है.

बलूचिस्तान का मामला तो पहले से दुनिया को मालूम था लेकिन चीन के लिये अब नई मुसीबत गिलगिट बाल्टिस्तान से आनी शुरू हो गयी है. यह वह हिस्सा है जहाँ से चीन का प्रवेश पाकिस्तान के लिये होता है.

आज से दो वर्ष पूर्व भारत की जनता तक नहीं जानती थी कि गिलगिट बाल्टिस्तान भारत का ही अंग है जिस पर पाकिस्तान ने 1948 में अवैध कब्जा कर लिया था.

उसका कारण शायद यही था कि भारत ने उस को लेकर कभी भी अंतरष्ट्रीय स्तर पर प्रयास नहीं किया था और उसको नियति का हिस्सा मानते हुए कुछ भी नहीं किया था.

लेकिन यह सब 2 वर्ष पहले बदल गया जब भारत ने पहली बार सार्वजानिक रूप से इस हिस्से को भारत का बताया और चीन द्वारा उस के रास्ते CPEC के लिये हाई वे बनाने पर आपत्ति की थी.

यही एक कारण था कि चीन की दूसरी बहुराष्ट्रीय अति महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट वन रोड’ (OBOR), जिसके अंतर्गत CPEC भी आता है, में भारत की उपस्थिति को लेकर चीन बहुत अभिलाषी था.

चीन जानता था कि एक बार भारत OBOR का हिस्सेदार बनने पर सहमत हो जाएगा तो भारत का गिलगिट बाल्टिस्तान को लेकर आपत्ति करने और उसकी वैधानिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने का अधिकार भी खत्म हो जायेगा.

इसी कारण से भारत ने ‘वन बेल्ट वन रोड’ (OBOR) के लिये हुए आयोजन का चीनी निमंत्रण अस्वीकार किया था.

इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोपियन यूनियन ने OBOR के सामूहिक दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया और हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था.

इसी लिये आज चीन, भारत के इस कदम पर कूटनीतिक और मीडिया के माध्यम से अपनी अप्रसन्नता और क्षोभ प्रदर्शित कर रहा है.

चीन और पाकिस्तान द्वारा भारत को घेरने और उसको दबाव में बनाए रखने के प्रयास में जहाँ भूखंडो की वैधानिकता और अवैधानिकता महत्वपूर्ण है, वहीं उन भूखंडो से उठता हुआ विद्रोह भी अब महत्वपूर्ण हो चला है.

जैसा कि पिछले वर्ष गिलगिट बाल्टिस्तान से पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े को लेकर आवाज उठी थी उसी की ही श्रृंखला में यह खबर आ रही है कि एक बार फिर गिलगिट बाल्टिस्तान गर्म हो गया है.

वहां से पाकिस्तान और चीन के खिलाफ आवाज़ें उठने लगी है. इसी को लेकर, पाकिस्तानी प्रशासन और सेना को धता बताते हुए, वहां की जनता ने बड़ी संख्या में सड़क पर आकर संघर्ष करने का आह्वान किया है.

आप लोग इन आवाजों पर कान लगाए रखिये क्यूंकि कुछ लोगो को तो आँख से मोदी सरकार के काम दिखाई नहीं देंगे इसलिए सीमा पर से आ रही चीखों और आवाजों को सुनते रहिये.

यह आवाज़ें अभी और तेज़ होंगी और उस क्रंदन में मोदी सरकार का मतलब समझ में आ जायेगा.

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