तुम हिंदू देवताओं का नहीं, अपमान कर रहे हो अपने ही पूर्वजों का

कल एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें तथाकथित कुछ लोग डॉ अंबेडकर की तस्वीर वाले बैनर के साथ एक जुलूस निकाल रहे है उस दौरान कुछ प्रदर्शनकारी हनुमानजी की तस्वीर पर थूकते, लात और जूते मारते नजर आ रहे हैं.

उस दौरान कुछ प्रदर्शनकारी इस घटना के साथ सेल्फी भी ले रहे थे. दूसरी ओर कुछ दिन पूर्व सहारनपुर में महाराणा प्रताप के चल समारोह पर पथराव किया गया. इस तरह की घटनाएं और हिंदू देवी देवताओं के अपमान करने की शुरूआत सबसे पहले तमिलनाडु में पेरियार ने शुरू की थी.

वामपंथ और सेकुलरिज्म के कॉकटेल से बनाकर कुछ द्रवीड़ संगठनों ने मूलनिवासी वाली एक फर्जी अवधारणा फैलाई और उत्तर भारत के सवर्णो को विदेशी बताकर हिंदू देवी देवताओं का सार्वजनिक मंचों से अपमान किया था.

इस विचारधारा की आड़ लेकर आज तमिलनाडु में दोनों द्रवीड़ दल बारी बारी से सत्ता पर काबिज होते हैं और नित नये भ्रष्टाचार के आयाम बनाते हैं. उसी वायरस को आज उत्तर भारत में भी फैलाने की कोशिश की जा रही है लक्ष्य वही नफरत की आग भड़काकर सत्ता पर काबिज होना.

हनुमानजी का अपमान करते समय ये तथाकथित लोग यह भूल गये कि हनुमानजी खुद एक वनवासी थे. यदि आज की परिभाषा में कहा जाये तो वे ‘अनुसूचित जनजाति’ के माने जायेंगे. भगवान राम पर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने बाली का वध किया.

तो ध्यान रहे कि बाली का वध उन्होंने अपने हित के लिये नहीं किया था. सुग्रीव ने अपने साथ हुए अन्याय के लिये उनसे मदद मांगी थी, क्योंकि सुग्रीव की पत्नी और राज्य पर बाली ने अवैध कब्जा कर लिया था और बाली के वध के बाद सारा राज्य सुग्रीव को ही सौंप दिया था न कि वे खुद राजा बन गये और सुग्रीव भी उसी वंश के थे जिस वंश का बाली था.

ये भी ध्यान रहे कि रामायण किसी ब्राह्मण ने नहीं बल्कि वंचित वर्ग के महर्षि वाल्मिकी ने लिखी थी और रावण कोई मूलनिवासी नहीं बल्कि ब्राह्मण था. प्रदर्शनकारी अपमान करते समय ये भी भूल गये कि हनुमानजी की आराधना हिंदू समाज के सभी वर्ग और जाति के लोग करते हैं न कि सिर्फ सवर्ण.

सहारनपुर की घटना के दौरान कथित उपद्रवियों ने महाराणा प्रताप को अत्याचारी राजपूत बताते हुए चल समारोह पर पथराव और गोलाबारी की जिससे एक राजपूत युवक मारा गया. उसके बाद से ही वहां उपद्रव जारी है. महाराणा प्रताप का विरोध करते समय वे ये भूल गये कि उनकी सेना में हजारो की संख्या में भील सैनिक और सेनापति थे. हल्दी घाटी के युद्ध में राजपूतों से अधिक भील योद्धाओं का खून बहा था.

मध्यकाल की कवियित्री मीराबाई राजपूत समाज की थी पर उनके आध्यात्मिक गुरू संत रविदास थे. संत रविदास चर्मकार समुदाय के थे पर बचपन मे उनको शिक्षा पंडित शारदानंद ने दी थी. शारदानंद के पुत्र रविदास के साथ ही शिक्षित हुये और उन दोनों में इतना स्नेह था कि अपने मित्र की अकाल मृत्यु होने पर संत रविदास ने अपने मित्र को आध्यात्मिक शक्ति से पुनर्जीवन दिया था. संत रविदास आगे चलकर संत रामानंद के शिष्य बने और कबीर भी रामानंद के ही शिष्य थे. कबीर और रविदास दोनो वंचित वर्ग से थे जबकि रामानंद ब्राह्मण थे.

संत रामानंद से पाई हुई शिक्षा से ही वे राजस्थान में सनातन धर्म का प्रचार करने लगे, उस दौरान चित्तोड़ का किला उनका निवास हुआ करता था, तब सिकंदर लोदी ने सदन कसाई को रविदास के पास भेजा कि वे मुस्लिम बन जाये पर सदन कसाई संत रविदास से इतना प्रभावित हुआ कि वो खुद सनातन धर्म मे रामदास बनकर शामिल हो गया और हिंदू धर्म का प्रचार करने लगा. तब क्रोधित होकर सिकंदर लोदी ने उनको बंदी बना लिया, अनेक प्रकार की यातनाएं दी पर उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला. उन्होंने सिकंदर लोदी को जबाव दिया-

” वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान।
फिर मैं क्यों छोडूं इसे, पढ़ लूं झूठ कुरान।।
वेद धर्म छोडूं नहीं, कोशिश करो हजार।
तिल तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार।।”

इतना पुराना इतिहास तो खैर ये कथित उपद्रवी वामपंथ के नशे में भूल गये होंगे पर जिन डॉ अंबेडकर की तस्वीर वाला बैनर लेकर ये तथाकथित लोग प्रदर्शन कर रहे थे वे उन डॉ अंबेडकर के इतिहास से ही कुछ सबक ले लेते.

डॉ भीमराव अंबेडकर का असली सरनेम ‘सकपाल’ था किंतु बचपन में उनके ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर ने उनको अपना उपनाम देकर पढ़ाया था जो उनसे विशेष स्नेह करते थे. बाद में जब वे विदेश पढ़ने गये तो बड़ोदरा रियासत के मराठा हिंदू राजा सायाजी गायकवाड़ ने उनको आर्थिक मदद देकर पढ़ने भेजा था.

वापस लौटने पर 10 हजार मासिक वेतन पर अपने यहां उच्च पद पर रखा था. पर ये तथाकथित कुछ (सब नही) फर्जी दलित(?) ये सारा इतिहास गायब कर केवल नफरत और भेदभाव का ही पाठ अपने समाज को बताते और पढ़ाते हैं, क्योंकि इनकी राजनीतिक दुकान नफरत से ही चलती है.

यदि समाज में समरसता आ जाये भेदभाव खत्म हो जाये तो इनकी दुकानदारी ही बंद हो जाये. जैसे अभी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में जातिवादी विचारधारा पूरी तरह धराशाई हो गयी. यद्यपि जातिगत भेदभाव और वैमनस्य आज भी मौजूद है पर अच्छे और बुरे लोग सभी समाज और जाति में है. किंतु कुछ लोगों के काम के आधार पर पूरे समाज और जाति को बदनाम करना और अपने को पीड़ित बताकर वोटबैंक की राजनीति करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है.

रात दिन ‘नमो बुद्धाय’ का जाप करने वाले नवबौद्धो को यह भी ध्यान रखना चाहिये कि बौद्ध धर्म में भी भैरव, काली, गणेश और दुर्गा की पूजा की जाती है. बौद्ध धर्मावलंबियों ने ज्योतिष विद्या हिन्दू ज्योतिषियों से ही सीखी है इसी के आधार पर वे दलाई लामा के अवतार लेने की भविष्यवाणी करते हैं.

महात्मा बुद्ध ने सारा राजपाठ त्यागकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया था, शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलकर, न कि किसी देवी देवता की तस्वीर या प्रतिमा को तोड़कर या अपमानित करके. बौद्ध मत के प्रचार में सभी जाति और मत के लोगों का योगदान था. महात्मा बुद्ध के महान संत के रूप में जन्म की घोषणा उनके जन्म लेने से पूर्व ही कोडिन्य नाम के ब्राह्मण ज्योतिषी ने कर दी थी जो बाद में उनके शिष्य भी बने और बौद्ध मत का प्रचार किया.

समाज और देश आज बड़ी तेजी से बदल रहे हैं. जातिगत भेदभाव और मतभेद धीरे धीरे खत्म हो रहे हैं. चुनाव परिणामों से भी इसकी पुष्टि हो रही है. इससे जातिवादी मानसिकता के साथ देश को तुष्टिकरण की आग में झोंकने वाली शक्तियां बेचैन हो उठी है. इन्हें समझ लेना चाहिये कि नफरत और वैमनस्य की राजनीति के बल पर एक या दो बार सत्ता पाई जा सकती है, बार बार नहीं. जितनी जल्दी ये शक्तियां इस सच को समझ लेगी उतना ही ये इनके और देश के हित में रहेगा.

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