जन्मल जाई ब्राह्मण, करम से मूलनिवासी होइहे!

आज से दो सौ साल बाद…

इंडिया अब सही मायनों में इंडिया बन गया है… भारत अब कहीं भी नजर नहीं आ रहा है… चमचमाते रोड, चमचमाती बिल्डिंग्स, चमचमाते लोग… बोले तो एक दम शाइनिंग इंडिया…

बाबा अम्बेडकर व बाबा गाँधी ने जो सपना देखा था बिल्कुल वैसा ही इंडिया… बहुजन समाज अब न्याय पा चुके हैं… ऊंचे-ऊंचे पदों पे आसीन हैं… खुशहाल हैं… भाग्य विधाता हैं…

वहीं सवर्ण अपने 5000 साल के इतिहास का फल भोग रहा है… जगह-जगह बाबा अम्बेडकर के मंदिर बन गए हैं… उँगली दिखाते बाबा सबको चेताते हुए मूड में है…

दिल्ली में भव्य महिषासुर का मंदिर, बिहार में होलिका माई का मंदिर… पंचवटी में खर-दूषण का मंदिर… चेन्नई, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में बाबा रावण जी का मंदिर, उत्तर प्रदेश में ताड़का माई और सुरसा माई का मंदिर… बंगाल में शूर्पणखा माई का मंदिर…

और ऐसे ही मूलनिवासी शूरवीरों के मंदिर बड़े ही भव्य, आकर्षक, सुंदर, मनोहारी तरीके से बनाए गए हैं… जिसमें वर्ल्ड क्लास आर्किटेक्चर का बेजोड़ नमूना देखने को मिलता है…

अंतरराष्ट्रीय सैलानियों की बाढ़ है… दुनिया भर के इंडिजिनस लोगों का तांता लगा हुआ है इन मंदिरों में! इन मंदिरों के मुख्य प्रवेश द्वार में मोटे-मोटे व बोल्ड शब्दों में साइन बोर्ड लगा हुआ है जिसमें लिखा गया है “ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का प्रवेश निषेध!”

मंदिर में दर्शन करने जाने वालों श्रद्धालुओं को एक-एक गिलास हंड़िया, दारू और भैंस के मांस का कबाब दिया जा रहा है… मन्दिर प्रांगण में हंड़िया की सुरमयी सुगंध व मांस भुजने व तलने की खुशबू से सभी भक्त जन लहालोट हो बाबा रावण जी की आराधना में लीन हैं.

दुंदुभि बज रही है… मुख्य पुजारी भैंस के मुंडी का आकार लिए हेलमेट पहने हाथ में बड़का भोथर कटार धारण किये भैंस के रक्त से सभी श्रद्धालुओं का तिलक अभिषेक कर रहे है…

हिंदुओ के बड़े से लेकर छोटे मन्दिर तक जमींदोज कर दिए गए हैं… बस कहीं-कहीं ही जहाँ सवर्ण थोड़े बहुसंख्यक है वहाँ टूटी-फूटी और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मन्दिर है…

सभी ब्राह्मण पुजारी वर्ग सड़क पे आ गए है… साफ-सफाई में लग गए हैं.. बड़के-बड़के मूलनिवासियों के यहाँ नौकरी-चाकरी कर जीवन गुजर-बसर कर रहे हैं. .. वहाँ भी इन्हें पाड़े, ब्राह्मण बोल-बोल के लज्जित किया जाता है…

ठाकुरों की हालत तो और भी दयनीय है… इनकी बस्ती अलग कर दी गई है… मंदिर के आस-पास भी गलती फटक गए तो महिषासुर भक्त लोग कूट-कूट के लाठा बना दे रहे हैं… सर मुंडवा कर रक्त तिलक कर दे रहे हैं…

जहाँ कहीं भी यज्ञ की आहुति की गंध मिलती वहाँ-वहाँ खर-दूषण भक्त सेना लोग पहुंच कर यज्ञ की वाट लगा देते… फिर उन यज्ञ प्रेमियों को ‘शुक्राचार्य स्मृति’ के दंड विधान से दंड निर्धारित कर दंड दिया जाता…

भीम सेना भी पूरे शबाब पर है… रावण राज में सब बहुजन खुश हैं… जनता की नाव में सवार हैं. चहुँ ओर बाबा रावण की किरपा बरस रही है.

जब कभी भी रावण, महिषासुर, तारका भक्त बराबरी की बात करते तो दबे स्वर में सवर्ण लोग विरोध जताते कि काहे की बराबरी भैया… हमें तो मन्दिर में प्रवेश दिया ही नहीं जाता… हमारा गोरा रंग, शिखा और जनेऊ देख के ही भगा दिया जाता है…

साइन बोर्ड में लिख के भी रखा हुआ है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का प्रवेश निषेध है… खाली मूलनिवासी ही क्यों? क्या हम सवर्ण, मनुष्य नहीं हैं? मंदिरों के सारे पुजारी मूलनिवासी ही क्यों? क्या हम ब्राह्मण सवर्ण उसके योग्य नहीं हैं? ऐसा भेदभाव क्यों?

तब एक भयंकर मूलनिवासी विद्वान पुजारी बोलता “पहले पुजारी के काबिल तो बनो… हम समानता में विश्वास करते है… अगर तुम पुजारी के काबिल हुए तो अवश्य मन्दिर के पुजारी बन सकते हो..

उसके लिए शुक्राचार्य स्मृति का ज्ञान होना माँगता… भैंस, गाय का मांस, बोले तो प्रखर मांसभक्षी होना मांगता… शराब, मदिरा के सेवन में कोई परहेज नहीं होना माँगता… अगर ये सब अर्हताएं परिपूर्ण करते हो तो बेशक मन्दिर के पुजारी बन सकते हो…

हमारे कितने ही मन्दिरों में इन्हीं अर्हताओं को पूर्ण करने के कारण कितने ही मुस्लिम और ईसाई बंधु भी पुजारी बने हुए हैं… हम पुजारी बनाने का साल में एक बार इक्कतीस दिन का शुक्राचार्य स्मृति का अनुष्ठान भी करते है… अगर इच्छुक हो तो जरूर आओ…

हम रावण के वंशज हैं, ताड़का के पुत्र है… मेघनाथ के भाई है, कुम्भकर्ण के भतीजे है… हममें कोई भेदभाव नहीं है… आओ बाबा रावण की शरण में आओ व उनके आदर्शों का अनुसरण करो.”

महान मूलनिवासी विद्वान सिरी सिरी सुतिया मंडलासुर ने एक बहुत ही सुंदर पंक्ति कही है..

“जन्मल जाई ब्राह्मण, करम से मूलनिवासी होइहे!!”

जय बाबा मूलनिवासी

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