बच्चों का चरित्र निर्माण : Never over react in tricky situations

किस्सा आज से कोई दस एक साल पुराना है. तब जब कि मेरा छोटा बेटा अभी बहुत छोटा था. बमुश्किल 6 या 7 साल का.

दीपावली के दिन थे. हमारी कॉलोनी में एक जनरल स्टोर ने दुकान के सामने ही पटाखों का स्टाल लगा रखा था.

मेरा बेटा अपनी बहन के साथ उस दुकान से लौटा तो बहन ने मुझे धीरे से कान में बताया कि ये उस दुकान से पटाखे चुरा के अपनी जेब मे भर लाया है.

Now, I had a situation in hand… A very delicate situation…

मैंने बेटे को पास बुलाया और उसे बहुत प्यार किया… दुलारा, पुचकारा…

फिर पूछा, “आप उस दुकान से पटाखे लाये हो? अगर कोई देख लेता तो कितना अपमान होता न? क्या ये अच्छी बात है?”

“अब एक काम करो. कल सुबह, जब कि दूकान में भीड़ भाड़ नही होगी, और दुकानदार के पास पर्याप्त समय होगा तुम्हारी बात सुनने और समझने के लिए, तुम दोनों भाई बहन उसके पास ये पटाखे और पैसे ले के जाना और कहना, अंकल कल हमने ये पटाखे लिए थे पर भीड़ भाड़ में पैसे देना भूल गए इसलिए अब आप इनके पैसे ले लीजिए.”

दोनों बच्चे दुकान पे गए और पैसे दे के लौट आये. मैंने पूछा क्या हुआ?

उन्होंने बताया कि दुकानदार बहुत खुश हुआ, उन्होंने हमारी बहुत तारीफ की और सबको बताया कि देखो कितने शरीफ और ईमानदार बच्चे हैं… अपनी तरफ से एक-एक कैंडी भी दी.

इसके बाद बच्चे कभी भी उस दूकान पे जाते तो वो दुकानदार और उनका पूरा परिवार बच्चों से बहुत इज़्ज़त, मान सम्मान से पेश आता…

बच्चों को भी धीरे-धीरे ये अहसास हुआ कि समाज मे मिलने वाली इज़्ज़त, मान सम्मान का क्या महत्व होता है…

How it feels when people respect you, how it feels when people value your character… बच्चों में ये भाव जागृत हुआ कि समाज मे सम्मान कैसे अर्जित किया जाता है.

मैंने कहा न कि as a parent, I had a situation at hand… उस दिन मैं गुस्से से आग बबूला हो के over react करके अपने बेटे को चार झापड़ मार के भी deal कर सकता था.

बहुत से parents शायद ऐसा करते भी… पर मैंने सिचुएशन को अलग तरीके से handle किया.

बच्चों का चरित्र निर्माण, उनमे values inculcate करना बहुत पेचीदा काम है. Never over react in tricky situations…

इज़्ज़त, मान-सम्मान की ज़िंदगी जीने का अलग ही मज़ा है… उन्हें ये अहसास कराइये.

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