वामपंथी किले में ये सब खुलापन कहाँ, वहाँ तो है बौद्धिक गुलामी

दक्षिणपंथ के पास बौद्धिक लोगों का अकाल है… Right-wing के लिए इस तरह के विचार अक्सर बोले और लिखे जाते हैं. आज भी एक प्रमुख समाचारपत्र के एक तथाकथित बुद्धिजीवी ने अपने लेख में इसका जिक्र किया. यह मेरे लिए हास्यास्पद होता है. और इसके पीछे मेरे पास तर्क के साथ तथ्य भी हैं.

इसे जानने के लिए अगर आप उपरोक्त कथन कहने वालो का आशय जानना चाहें तो उनके जेहन में कहीं ना कहीं ये विचार होता है कि वामपंथ के पास बुद्धिजीवियों का जमावड़ा है. अर्थात उनके कहने का सीधा सीधा अर्थ यह होता है कि सारे बुद्धिजीवी वामपंथी होते हैं.

और इसी बिन्दु पर आकर ये फंस जाते हैं. आखिर यह कैसे संभव हो सकता है. ऐसा कहने वालों से कोई यह पूछे कि जब वामपंथ नहीं आया था तब क्या बुद्धिजीवी नहीं होते थे? वे चाणक्य से लेकर कालीदास को क्या मानेंगे?

मैं यहां वेद या महाभारत जैसी महान रचनाओं के रचयिता की तो बात ही नहीं कर रहा. जो इन महानुभावों के हिसाब से साहित्य ही नहीं. जबकि सच तो यह है कि महाभारत से बेहतर कोई कथा-साहित्य की रचना अब तक नहीं हुई. और गीता के आगे सभी दर्शन शास्त्र बौने नजर आते हैं.

असल में दूसरे के घर में बौद्धिक लोगों की कमी बताने वालों के खुद के तर्क बेहद कमजोर हैं. उनके मतानुसार बुद्धिजीवी सिर्फ वो है जो इनके पत्र-पत्रिकाओं में कागज़ काला कर रहा है या इन काले-पीले पन्नो की किताब छपवा रहा है या टीवी पर बहस करता नजर आ रहा है. जबकि ये सब इनके अपने आदमी हैं इनकी पसंद के.

अगर इसे ही पैमाना माना जाता है तो यहां पर आप अपने हिसाब से अपनी पसंद के लोग छाप कर टीवी के स्टूडियों में बिठाकर बुद्धिजीवी की रेवड़ी बांटते रहिये. जबकि यह सच नहीं.

बुद्धिजीवी तो कोई भी हो सकता है एक व्यापारी भी, एक गृहणी भी, एक मजदूर भी और एक अनपढ़ भी. बुद्धि तो किसी के पास भी हो सकती है और साथ ही जीवन का अनुभव के लिए कोई विचारधारा की स्कूल से पढ़ना जरूरी नहीं.

वो एक अफसर भी हो सकता है तो चपरासी भी, कॉरपोरेट मैन हो सकता है तो एक असंगठित दुकानदार भी. गरीब भी अमीर भी.

चूंकि ये सब लोग बोलते-लिखते नहीं या यूं कहें कि इन्हे इसका मौका नहीं मिला तो कुछ लोगों ने अपनी बौद्धिकता की दूकान खोल ली और बाजार में मोनोपली बना ली.

इन तथाकथित बौद्धिक लोगों ने किसी प्रतिद्वंदी को पैदा ही नहीं होने दिया और हर संभव अपना एकाधिकार बरक़रार रखते हुए अंधों में काना राजा बन कर अपनी डफली बजाते रहे.

इन सब खेल के बाद भी, ऐसा नहीं कि दूसरों को इनकी नाकाबिलियत के बारे में पता नहीं था. खूब पता था, मगर कोई जरिया नहीं था जहां इनके बौद्धिक हल्केपन को उघाड़ सके.

इस गिरोह ने समाचार पत्रों में जो एकतरफा लिख दिया उसकी प्रतिक्रिया देने का कोई माध्यम नहीं था, टीवी पर की गई बकवास का मुंहतोड़ जवाब देने का कोई जरिया नहीं था.

इसमें मजेदार बात यह होती कि इस तरह का एकतरफा ज्ञान पिलाने वाले लोग अक्सर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर होते, जिनकी बातों को काटना भारत की शिक्षा व्यवस्था में वैसे भी किसी छात्र के लिए संभव नहीं.

ऊपर से इस गिरोह ने बौद्धिक बाजार के हर मोड़ पर अपने सिपाही तैनात कर रखे थे. प्रकाशक, सम्पादक से लेकर पत्रकार, स्तम्भकार तक सब इनके अपने लोग होते. ऐसे में इन्हे लगने लगा कि इनके अलावा कोई और बौद्धिक होता ही नहीं है.

इनका यह भ्रम टूटा जब सोशल मीडिया आया. और आम लोगों ने लिखना शुरू किया. यहां इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि इस गिरोह की बौद्धिकता कितनी फर्जी और खोखली निकली जिसे आम जनता ने यूं ही मसल दिया.

दशकों से बनाये गए इनके किले एक झटके में खंडहर नजर आने लगे. जिसे देखकर ये अब फड़फड़ाते हैं, इनकी लेखनी में बैचैनी साफ़ नजर आती है. शब्दों में बौखलाहट, विचारों में भ्रम ने इनकी कमर और तोड़ दी. इनके मठ का पतन विश्वव्यापी घटनाक्रम है.

भारत का आम बुद्धिजीवी आज दक्षिणपंथ के साथ हैं. 2014 इसका प्रमाण है. ये आम बुद्धिजीवी जिन्हे लोग भक्त कह कर अपनी भड़ास निकालते हैं, सच पूछे तो स्वतंत्र विचार के हैं, तभी तो ये गाहे बगाहे अपनी ही दक्षिणपंथी सरकार की खिंचाई करते देखे जा सकते हैं. जबकि दूसरी तरफ अपने को बुद्धिजीवी मानने वाले, सच कहें तो पट्टा पहन कर घूमने वाले किसी के पालतू हैं.

अब यहाँ यह बतलाने की जरूरत नहीं कि कौन जानवर को पालता है और पालतू जानवर का व्यवहार अपने मालिक के लिए कैसा होता है. जिस बुद्धिजीवी में अपने मालिक या विचारधारा के लिए वफादारी जैसे भाव आ जाएँ, वो बुद्धिजीवी रह कहाँ जाता है.

इसलिए यह अच्छा ही है कि राष्ट्रवादी विचार के पास कोई तथाकथित बौद्धिक लोगों की फौज नहीं. क्योंकि वही राष्ट्र श्रेष्ठ हो सकता है जहां उसका बौद्धिक वर्ग स्वतंत्र हो और खुल कर कहीं भी किसी के साथ भी उठता, बैठता, घूमता, बोलता हो. वामपंथी किले में ये सब खुलापन कहाँ, वहाँ तो बौद्धिक गुलामी है.

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