चले हैं वर्ल्ड क्लास सुविधायें देने…

हर सीट पर एलसीडी स्क्रीन और उच्च गुणवत्ता वाले हेडफोन लगाकर तेजस नाम की गाड़ी तो दौड़ा दी. लेकिन उस गाड़ी में यात्रा करने के लिये वर्ल्ड क्लास के यात्री कहां से लाओगे?

लगभग साल भर पहले जब महामना एक्सप्रेस से नल की टोंटियां गायब हुई थी तब तो बहुत आसानी से आरोप चिपका दिये गये थे कि यूपी-बिहार वाले ऐसे ही होते हैं. लेकिन आज जब मुंबई और गोवा वालों ने हेडफोन चुरा लिये तब तो चोर-चोर मौसेरे भाई वाली फीलिंग मिल रही होगी.

दरअसल बात यूपी, बिहार या मुंबई और गोवा की नहीं है, बात मानसिकता की है, जो कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक कमोबेश एक ही प्रकार की है.

ऐसा भी नहीं है कि इस प्रकार की चोरी किसी खास धर्म, मज़हब, जाति, संप्रदाय या कुछ विभिन्न प्रकार के आर्थिक स्तरों वाले व्यक्तियों में पायी जाती हो.

यह एक ऐसा काम है जो वास्तव में भारत के सेक्यूलर चरित्र और विभिन्नता में एकता को दर्शाता है.

वास्तव में चोरी करना कोई मजबूरी या आदत नहीं है बल्कि यह एक रोग है. अगर मैं गलत होऊं तो मनोचिकित्सक इस संबंध में मुझे सुधार सकते हैं.

इसके कारक या संक्रमण के तरीकों के बारे में तो नहीं जानता लेकिन इतना पक्के तौर पर जानता हूं कि इसका किसी आर्थिक स्थिति से कोई वास्ता नहीं होता है.

शायद इसीलिये लाखों रुपये खर्च करके होटलों में सुईट बुक कराने वाले लोग भी लौटते समय अपने सामानों के साथ साबुन और टॉवल उठा लाते हैं.

तेजस के किरायों पर भी गौर किया जाय तो उसमें हेडफोन चुराने वाले किसी झुग्गी झोपड़ी से नहीं गये होंगे.

वे सभी चोर सूटबूट वाले और अच्छी आर्थिक स्थिति वाले रहे होंगे. लेकिन रोग की आक्रामकता के कारण वह ट्रेन में भी हाथ साफ करने से बाज नहीं आये.

बाकी चीजों को पीछे छोड़ते हुये अभी इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि आखिर यह मर्ज पूरे देश के लोगों से दूर कैसे होगा?

अगर कोई दवा या वैक्सीन होती तो इसके टीकाकरण का राष्ट्रीय कार्यक्रम चला कर सरकारें इससे निजात पाने में मदद कर सकती थीं. लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि इसे आत्मनियंत्रण द्वारा ही ठीक किया जा सकता है.

आत्मनियंत्रण द्वारा एक आम भारतीय आज तक सही ढंग से और जगह पर थूकना तक नहीं सीख पाया तो चोरी जैसी अनैतिक चीज को भला अपने से दूर क्यों और कैसे भगा पायेगा?

इसके लिये सरकार को ही पहल करनी होगी. वह भी पहले “शठे शाठ्यं समाचरेत्” की नीति के अनुसार सरकार को एक टीवी चैनल या यूट्यूब चैनल लांच करना चाहिये.

इस चैनल पर दिन भर तेजस जैसी ट्रेनों में लगे सीसी कैमरों की रिकार्डिंग के साथ आरक्षित सीटों के यात्रियों के नाम और पते सार्वजनिक करते हुये पूरे देश में उसे चौबीस घंटे की बुलेटिन की तर्ज पर दिखाया जाना चाहिये.

स्टेशनों पर भी उनकी रिकार्डिंग, वहां लगे स्क्रीन के माध्यम से लगातार दिखाने चाहिये और साथ में यह कमेंट्री भी चलती रहनी चाहिये कि “ध्यान से देखिये इस चेहरे को… यह चेहरा उसी आदमी का है जो कल तेजस एक्सप्रेस की बी-4 कोच के 46 नंबर वाले बर्थ के सामने लगी स्क्रीन को खुरच रहा था और गाड़ी से उतरते समय वहां लगा हेडफोन अपने बैग में ठूंस ले गया. अगर यह आदमी दोबारा आपको दिखे तो इससे सावधान रहिये, क्योंकि यह एक चोरी नामक महामारी ग्रसित है.”

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