एनकाउंटर : अपराधी बनाम आम नागरिकों के मानवाधिकार

बड़ा हृदयविदारक दृश्य था. आंगन के बीचोंबीच लाश रखी हुई थी. सफेद कफ़न के बाहर भी खून चू रहा था.

पत्नी लाश के पास दहाड़े मार-मार कर रो रही थी. कलाई में टूट गई चूड़ियों से हाथ रक्तरंजित हो गया था. माँ ने दीवार में इतनी जोर से सर मारा था कि चश्मा टूट कर चेहरे को घायल कर गया था.

गांव के हमदर्द और रिश्तेदारों का ताँता लगा था. जब पत्नी ने टूटीचूड़ियों के टुकड़े लाश की छाती पर रखे तो मेरी ऑंखें भी नम हो गईं.

श्रीराम धीवर का लड़का पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था. पांच गोलियां लगीं थी. उसकी बड़ी बेटी 12 साल की थी और बेटा छह साल का. बाप अपाहिज होकर घर बैठा था. परिवार का भविष्य अंधकारमय हो गया था.

करीब दो महीने बाद मैं किसी काम से थाना सिहानी गेट के इंस्पेक्टर के पास गया था तो संजय के एनकाउंटर का जिक्र छिड़ गया.

मैंने कहा, “इन्स्पेक्टर साहब किसी आदमी को इस क्रूर तरीके से मार देना…. कहाँ का इन्साफ है बंधु”.

“हम ने कहाँ मारा? हरियाणा पुलिस ने किया था एनकाउंटर. चाय पिएंगे त्यागी जी”.

इंस्पेक्टर साहित्यिक प्रवृति का था और मैं उसे अपना कहानी संग्रह भेंट कर चुका था इसलिए मेरी इज्जत करता था.

कुछ देर चुप रहा. फिर दार्शनिक अंदाज में बोला, “मारना तो मैं ही चाहता था उसे, मगर साला हाथ नहीं आया. बहुत शातिर था”.

” अरे… ऐसा भी क्या था, छोटे-छोटे बच्चे हैं उसके. कानूनी प्रक्रिया से न्याय नहीं मिलना चाहिए?

“कितनों को मिलता है कानून से न्याय. कहाँ से लाएं गवाह और सबूत. 24 हत्याएं कर चुका था त्यागी जी 24. इतनी तो पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं. बाकि का कोई हिसाब नहीं.

आप को उसके मासूम बच्चे दिखाई देते हैं, मगर जिन निर्दोष लोगों को अकारण हजार-दो हजार लूटने के लिए उसने मौत के घाट उतार दिया उन से मिलवाऊं आप को?

सारी दुनिया आप के कहानी के पात्रों की तरह नहीं है. दुनिया में बहुत कुछ काला-सफ़ेद होता है त्यागी जी. ये लोग सैडिस्ट हो जाते हैं. खून के फौहारे देखकर आनंद आता है इन्हे. इनका कोई इलाज इसके अलावा नहीं है. जो हुआ है वही उसकी परिणीति होनी चाहिए थी”.

फिर मैं चाय नहीं पी सका. असमंजस की सी स्थिति में चला आया. आज भी उसका बाप लाठी के सहारे चलता हुआ दिख जाता है कभी-कभी.

(अब मेरे कई दोस्त कहेंगे कि सब काल्पनिक है. हा हा हा…. जिस को नाम और प्रमाण चाहिए निजी रूप से पूछ ले. वैसे हमारे यू. पी. में ये सब आम होता रहा है. मायावती के शासन में साल में 240 हत्याएं पुलिस एनकाउंटर में हुई थीं.)

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