ब्राह्मणों ने शोषण किया, दलितों ने मैला ढोया!

भारत कृषि प्रधान देश है… भारत गाँवों का देश है… भारत की आत्मा गाँवों में बसती है… ये सब तो पढ़ा ही होगा. अपने आस-पास भी ये अनुभव किये होंगे…

शहरीकरण का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है… और बात की जाती है पिछले 5000 साल की… अभी की बात करें तो, भारत में अभी तक का सबसे ज्यादा शहरीकरण है और तेज रफ्तार से शहरीकरण हो रहा है…

अब अंतर्राष्ट्रीय आँकड़े कहते है कि मौजूदा वक़्त में भारत के 70% आबादी के पास टॉयलेट्स की सुविधा नहीं है… जिसके लिए भारत को दुनिया भर में कोसा जाता है, ताने दिए जाते हैं, उलाहना दी जाती है… और इसके चलते ही प्रधानमंत्री ने इसके लिए अलग से योजना बनाई…

अब जब अभी मात्र 30% लोगों को टॉयलेट्स की सुविधा है तो फिर आज से 20 साल पहले कितनी होगी? 50 साल पहले कितनी होगी? 100 साल पहले कितनी होगी? 1000 साल पहले कितनी होगी? 2000 साल पहले कितनी होगी?

बहुत पीछे चला गया न! एक सैम्पल के तौर पर अपने गाँव की बात कर लेता हूँ… मेरे गांव में कम से कम 200 घर तो होंगे ही… इन 200 घरों में मात्र 4 घरों में टॉयलेट हैं… और ये भी पिछले 5 सालों में…

मने कि मात्र पांच साल पहले किसी के भी घर मे टॉयलेट नहीं थे… और मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि पूरे झारखण्ड के गांवों के भी यही हालात होंगे…

तो मैला किस दलित ने ढोया! सब बाहर खुले में शौच करते… लेकिन हाँ दलितों के द्वारा पाले गए सुअरों ने जरूर सफाई का काम किया है बल्कि अब भी कर रहे हैं…

अब जब झारखण्ड के कथित दलितों को मैला ढोने वाली बात पर ब्राह्मणों-सवर्णों को गाली देते हुए देखता-सुनता हूँ तो लगता है कि कान के नीचे दो रपैटा खीच के मारूँ.

तो ये हो गए दलित… अब आते है ब्राह्मणों के ऊपर.

आस-पास देखे तो 5-6 गाँवों को मिलाकर एक पंडी जी का घर… फिर से सैम्पल पकड़िए… मेरा गाँव मँझलीटांड़ और अगल-बगल के गाँव असनाटाँड़, कोदवाडीह, रखवा, बघजोबरा, कटघरा, लेम्बोडिह, सिमराबेड़ा… इतने गाँवों को मिलाकर एक पंडी जी का घर…

अब इतने घरों में पूजा करने की जिम्मेवारी इनकी… जैसा कि पहले भी बताया कि भारत कृषि प्रधान देश है… तो कृषि कार्य को अबाध और निरन्तर रूप से चलने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई कि कृषि कार्य में कोई रुकावट न हो…

इसके लिए सब व्यवस्था की गई… लोहे के कृषि औजार के लिए लोहार को कुछ जमीन देकर गाँव में बसाया गया… ढाक-ढोल बजना के लिए तुरी-गोड़ाइत को बसाया गया… शेविंग, बाल, नाखून काटने के लिए नाई को बसाया गया.. मिट्टी के बर्तन हेतु कुम्हार को बसाया गया व पूजा पाठ-हेतु ब्राह्मणों को बसाया गया…

सबके कार्य निश्चित थे… अच्छी फसल हुई तो सब बम-बम रहते थे. और खराब हुई तो सब मायूस… सबको उसके मेहनतनामे के रूप में सालाना निर्धारित धान दिया जाता था… ये व्यवस्था थोड़ी-बहुत अब भी कायम है…

तो बात हो रही थी ब्राह्मणों की… मने की पंडी जी लोगों की… गाँव के एक कोने में कुटियानुमा घर मे पंडी जी का रहना… टूटी-फूटी साइकिल और एक हारमोनियम (जब से हारमोनियम बना होगा तब से)..

जहाँ से जजमान का न्योता मिलता पूजा का, साइकिल उठाते और चलते बनते… रास्ते में कोई भेंटाया तो परनाम पंडी जी कहना न भूलते लोग… पूजा कराने के बाद कुछ दक्षिणा में मिल जाता चावल दाल तो लेकर आते बनते…

खेती-बाड़ी तो थी नहीं… सो पूरा गुजारा जजमानी में ही… अब पंडी जी पूजा न करवाये तो का कराये… पाँच घर पूजा किये तो पाँच घर का चावल एके झोला में भर कर ले आते… और पंचमेसरी भात खाते…

अब ऐसा तो नहीं था कि अगर हम पूजा न करना चाहे और पंडी जी जबरदस्ती कराने पे अड़ जाए… मन है तो करो वरना न करो… बाकि पंडी जी फलाने-फलाने पूजा का लाभ जरूर बताते…

मनसा पूजा, लक्ष्मी पूजा में पंडी जी की बल्ले-बल्ले तो जरूर होती लेकिन टेंसन भी कम न… मेरे घर में मेरा भाई उपवास किया है तो हम 2 बजे ही पंडी जी के घर और सन्देशा, सबसे पहले अपने घर मे पूजा होना मांगता पंडी जी.. भाई उपवास किया है अपना…

पंडी जी आश्वासन दे देते… और शाम को यदि मेरे घर से पहले कहीं और पूजा करते दिख गए तो उसकी वाट लग जाती… और हम अकेला जजमान तो नहीं रहते… तो समझ सकते है कि कितना वाट लगता होगा…

अब जजमान को रुष्ट भी नहीं कर सकते पंडी जी… ले भागा दौड़ी… धोती का पूंछरी खोंसते और साइकिल का पेंडिल मारते… कभी-कभी हम बुतरू लोग पंडी जी का पूंछरी ही खोल के भाग जाते…

तो पंडी जी पूजा कराते और दान-दक्षिणा से ही परिवार चलाते… अब बहुतों को लगता कि पंडी जी तो ढेर कमाते हैं… इतना पूजा-पाठ कराते है, इतना दान-दक्षिणा मिलता है, बहुते अमीर होंगे पंडी जी…

लेकिन हमारे गाँव के पंडी जी वही पुरानी साइकिल में जिनगी गुजार दिए लेकिन अपने बेटों के लिए ढंग का दू गो कमरा नहीं बना पाए… बेटे जब बड़े हुए तो खलासी करने लगे, ड्रायवरी करने लगे, दिल्ली-मुम्बई जाने लगे तब जा के घर बना पाए… बेटियों की शादी भी पूरे गाँव से मांग-छांद के किये…

तो कथित शोषण किस चीज का हुआ हमें नही पता… महतो जी-महतो जी करके पंडिताइन आती थी झोला ले के और सालाना जजमानी ले जाती थी. जैसा कि अन्य कुम्हार, गोड़ाइत, नाई, लोहार ले जाते थे/ हैं…

हमरे इलाके में एक भी पाँड़े का घर ऐसा नहीं है कि यह कह सके कि ई पांड़े ने हमारा शोषण कर-कर के महल ठोक लिया हो… और अगर किसी ने ठोका भी है तो वो जजमानी के पैसा से नहीं बल्कि नौकरी या फिर बिजनेस के पैसा से ठोका है… और ये कथित नौकरी का इतिहास कितना पुराना है!

तो भैया 5000 साल से किधर चूस लिया ब्राह्मणों ने? ब्राह्मणों की तो हिम्मत न होती थी कि किसी जजमान को हाथ लगा दे, काहे कि फिर जजमानी का सवाल हो उठता था… हाथ लगाया तो फिर गया एक जजमान. तो भैया शोषण किधर से कर लिए?

एक भयंकर विरोधी टेप के आदमी ने बोल दिया… “ई पाँड़े को क्या जाता है… मंतर फूंक दिया और दक्षिणा वसूल लिया!”

पंडी जी तुनक गए बोले, ‘आइये आपको गायत्री मंत्र सिखाते है… ज्यादा कठिन नहीं है… इसको सीखिये और यहीं बैठ के 1001 बार जाप कीजिये… और मेरा आज का दक्षिणा आपके नाम हुआ.’

वो तो तैश में आकर बोला, “ई कौन बड़का काम है मरदे.. आइये कर देते है.”

बैठा पाल्थी मार के और लगा गायत्री मंत्र का जाप करने… मुश्किल से 300 बार भी जाप न किया होगा कि… “भक्क मरदे… ई नहीं होगा मेरे से ई जाप-वाप करना… हमको खेतवा में 10 घण्टा लगातार खटा लो लेकिन ई काम हमसे न होगा… ई काम आप ही करो पंडी जी!”

शादी-ब्याह में पंडी जी को 1,000 रुपया पकड़ाते है तो वहीं बजनिया पार्टी को 10,000… और बजनिया पार्टी में ज्यादातर दलित लोग ही होते हैं… पंडी जी तो मने-मने खूब कुढ़ते होंगे… और सोचते होंगे.. काश बाजा ही बजाते हम साला.

तो भैया सार ये हुआ कि दलितों ने खूब मैला ढोया और ब्राह्मणों ने खूब शोषण किया.

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