यहाँ रहते सभी हैं, कोई यहाँ का है नहीं, देश किसी का नहीं है

2005… वह साल जब मैं पहली बार इंग्लैंड आया था. इसी साल लंदन पर पहला जिहादी हमला भी हुआ था…

मैं लंदन के बारे में ज्यादा नहीं जानता था, एक लैंडमार्क जिसके बारे में जानता था वह था ट्रैफलगर स्क्वायर…

निर्मल वर्मा की एक कहानी में ट्रैफलगर स्क्वायर पर कबूतरों के बारे में पढ़ा था. बैटल ऑफ ट्रैफलगर और लॉर्ड नेल्सन के बलिदान के बारे में भी पढ़ा था.

यह पता था कि लार्ड नेल्सन की मूर्ति ट्रैफलगर स्क्वायर पर है… तो लंदन में जो पहली जगह देखने गया, वह था ट्रैफलगर स्क्वायर.

वहां पहुंचा तो उस के आस पास तीन चार मूर्तियाँ दिखाई दीं… सबके पास जा-जा कर पढ़ा, उसमें से कोई मूर्ति लार्ड नेल्सन की नहीं थी. आसपास टहलते दो-तीन लोगों से पूछा, तो उन्हें नेल्सन के बारे में पता नहीं था.

एक अधेड़ अंग्रेज़ सज्जन से पूछा तो वे मुस्कराये और मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे अपने साथ ले चले. मैंने उनके साथ सड़क पार की और करीब 50 गज चला.

फिर उन्होंने मुझे मुड़ कर आकाश की तरफ देखने को कहा… लार्ड नेल्सन की मूर्ति नेल्सन कॉलम के ऊपर थी… और कहाँ? ठीक कॉलम के नीचे खड़े होकर कैसे नज़र आती.

उसके कुछ सप्ताह बाद लंदन में ट्यूब बम हमला हुआ. तब मैं बर्नली, लंकाशायर में काम कर रहा था. लंच टाइम तक खबर फैल गई थी, हर कोई इसी के बारे में बात कर रहा था… कोई गरमा गरम बहस नहीं, पर माहौल में एक भारीपन था… कोई इससे अछूता नहीं था.

अगले दिन सड़क चलते किसी ने कार से मुझ पर एक बियर कैन फेंकी और मुझे पाकी कहा… यह अवश्य एक हेट क्राइम था, जो मेरी चमड़ी के रंग को निशाना कर रहा था.

लोगों ने मुझे पुलिस स्टेशन जाकर रिपोर्ट करने की सलाह दी… मैंने कोई रिपोर्ट नहीं लिखाई… आखिर कोई नाराज़ था… अपने देश पर हुए हमले से नाराज़ था, अपने निर्दोष देशवासियों की हत्या से नाराज़ था.

उसकी नाराज़गी दिशाहीन थी, पर अकारण नहीं थी… वह मूर्ख रहा होगा, अनभिज्ञ रहा होगा… पर कम से कम ज़िंदा था… उसे फर्क पड़ता था…

12 साल बाद इंग्लैंड पर फिर से उतना ही बड़ा एक हमला हुआ है… मैं टीवी नहीं देखता… जब भारत से मेरे मित्रों ने पूछा तो मुझे पता चला.

कल जब काम पर आया तो देखा, किसी ने इस हमले के बारे में एक शब्द भी बात तक नहीं की… एक शब्द भी नहीं… हंसी मजाक, काम काज चलता रहा…

कुछ हुआ ही नहीं था… कुछ भी नहीं.

12 वर्षों में इंग्लैंड में बहुत कुछ बदला है… लोग अभ्यस्त हो गए हैं… देश की चमड़ी मोटी हो गई है. अब लोगों को फर्क नहीं पड़ता…

लॉर्ड नेल्सन की मूर्ति 52 मीटर ऊंचे खंभे पर खड़ी है. वहाँ किसी की नज़र भी नहीं जाती… जैसे लार्ड नेल्सन के शब्द अब किसी के कानों में नहीं गूंजते… “इंग्लैंड हर व्यक्ति से अपना कर्तव्य करने की अपेक्षा करता है.”

आज अपेक्षाएं बदल गयी हैं. इंग्लैंड आज आपसे अपने कौंसिल टैक्स और बिल देने की अपेक्षा करता है, टीवी लाइसेंस और पार्किंग टिकट पे करने की अपेक्षा करता है… पर ड्यूटी का वह मतलब नहीं है जो लॉर्ड नेल्सन के लिए था… यहाँ रहते सभी हैं, कोई यहाँ का है नहीं… देश किसी का नहीं है…

जनाब नेल्सन, आप बहुत ऊंची खंभे पर खड़े हैं… जरा नीचे उतर आइये… दिखाई नहीं दे रहे…

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