वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता, मीडिया और मिथक

20 मई को IIMC परिसर में मीडिया स्कैन द्वारा ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता मीडिया और मिथक ‘ पर सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अनुभवी विशेषज्ञों ने श्रोताओं के समक्ष अपनी बातें रखीं.

छः सत्रों में आयोजित सेमिनार में लोकसेवा संचार : विकास और मिथ, धर्मपाल और व्याख्यान, वंचित समाज के सवाल, जम्मूकश्मीर के हालात, इतिहास पुनर्लेखन: आवश्यकता या षड्यंत्र विषय पर व्यापक चर्चा की गई.

चर्चा से पहले योगाभ्यास और यज्ञनुष्ठान किया गया जिसका कैंपस से जुड़े कुछ विद्यार्थी गुटों द्वारा व्यापक विरोध किया गया और संस्थान पर भगवाकरण का आरोप लगाया गया. हालांकि इनकी संख्या अत्यंत सीमित थी.

कार्यक्रम की शुरुआत ‘ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता : मीडिया और मिथक : पुस्तक के विमोचन से की गई. इस पुस्तक में पत्रकारिता से जुड़े विविध पहलुओं पर 30 लेखकों के विचार संकलित किए गए हैं.

चर्चा में यज्ञ को लेकर उपजे विवाद बोलते हुए केजी सुरेश ने कहा कि भारतवर्ष की परंपरा रही है कि कोई भी इमारत खड़ी करने से पहले हमलोग भूमिपूजन करते हैं, दीप प्रज्ज्वलित करते हैं. नारियल फोड़े बिना तो हिंदुस्तान का एक भी नौसैनिक जहाज बन्दगाह नहीं प्रस्थान करता.

इसके बावजूद यज्ञ का विरोध क्यों हो रहा मुझे नहीं मालूम. परिसर में दूसरे धर्मों के लोगों को भी अपने धार्मिक क्रियाकलाप करने की स्वतंत्रता है.  मुझे किसी भी प्रकार की धर्मनिरपेक्षता की पाठ पढ़ाये जाने की ज़रूरत नहीं है. मीडिया का एक वर्ग माफिया कि तरह बर्ताव कर रहा है. मुझपर भगवाकरण का आरोप लगा रहा है और पत्रकारों को संघी बात रहा है.

आगे बोलते हुए केजी सुरेश ने कहा मैकाले साहब का एक भाषण ब्रिटिश संसद में पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर भारतवर्ष के आत्मसम्मान को तोड़ना है तो इसका रास्ता है कि अंग्रेजी में शिक्षा लाओ और यहां के लोगों में अपनी संस्कृति और विरासत ले प्रति इतनी हीन भावना भर दो कि इनको लगने लगे कि मेरे देश का संस्कार सबसे हीन है. मैं मानता हूँ कि मैकाले साहब इसमें कामयाब हो गए.

केजी सुरेश ने पत्रकारों के संदर्भ में कहा कि गांधी जी बहुत बड़े पत्रकार थे. उन्होंने तीन बंदरों की बात की थी- बुरा मत देखो बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो. लेकिन हम मीडिया में यह काम नहीं कर सकते. हमें बुरा देखना भी पड़ेगा, बुरा सुनना भी पड़ेगा और बुरा बोलना भी पड़ेगा. बस एक संसोधन किये जाने की ज़रूरत है. मीडिया को बुरा देखने सुनने और बोलने के साथ साथ अच्छा देखना भी पड़ेगा, अच्छा सुनना भी पड़ेगा और अच्छा बोलना भी पड़ेगा.

परिचर्चा में बस्तर विभाग के आईजी रहे कल्लूरी ने आदिवासियों के संदर्भ में बताया कि लड़ाई परसेप्शन की है. मैं 2004 से नक्सल क्षेत्रों में काम कर रहा हूँ और तीन अलग अलग परसेप्शन महसूस कर रहा हूँ – एक बस्तर दूसरा रायपुर और तीसरा दिल्ली.

तीनों अलग अलग परसेप्शन में जी रहे हैं. हमने इन तीनों के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास किया है. बस्तर को रायपुर या दिल्ली में बैठकर नहीं समझा जा सकता. बस्तर को समझने के लिए बस्तर आना पड़ेगा. दिल्ली के लोगों को बस्तर और बस्तर को लोगों को दिल्ली जाना पड़ेगा.

दोनों क्षेत्रों के लोगों को साथ बैठकर परिचर्चा करना चाहिए एक दूसरे का सुख दुख जानना चाहिए और रास्ता निकालना चाहिए. बस्तर के चालीस लाख लोगों के भरोसे पर कह सकता हूँ जो परसेप्शन दिल्ली या देश में बनाया गया है उसे कुछ चंद मुट्ठीभर लोगों ने बनाया है. लेकिन अब उस स्क्रिप्टेड परसेप्शन को बदलने का वक़्त आ गया है. हम बहुत तेजी से इस प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि बस्तर के आदिवासी बहुत सीधे सादे लोग हैं. वे सीमित संसाधनों में बहुत खुश रह सकते हैं. वो ambitious नहीं है. वे कुछ नहीं चाहते हैं. वे अपने जल जंगल और ज़मीन अपनी संस्कृति अपने नाच अपने गाने में बहुत खुश रहते हैं. वे कलाप्रेमी हैं.

क्रांति क्या है , चीन क्या है, माओ कौन है उन्हें कुछ नहीं मालूम. बस्तर में नक्सलवाद आंध्रप्रदेश, झारखंड और बिहार  से थोपा गया है. नक्सलियों ने आदिवासियों की खुशियों को छीन लिया है. कल्लूरी ने कहा कि मेरे बारे में भी गलत परसेप्शन बनाया गया है. आप बस्तर जाकर देखिये मेरे साथ  चालीस लाख जनता है. मेरा विरोध उन लोगों के द्वारा किया जाता है जो आदिवासियों के खिलाफ इस धंधे में शामिल है. चालीस लाख आदिवासियों का कोई वॉइस नहीं है लेकिन जो लोग भी उनके खिलाफ धंधे में शामिल हैं वो बहुत वोकल हैं. लेकिन फिर भी हम जीतेंगे.

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