जिन पर न्याय की ज़िम्मेदारी, उन्होंने ही खुला छोड़ रखा है क़ातिल

सन 1985 में पैट्रिक सस्किंड (Patrick Süskind) की लिखी एक किताब आई थी, जिसका नाम था “परफ्यूम” (Perfume). इसी उपन्यास पर इसी नाम से 2006 में एक फिल्म भी बनी.

जर्मन भाषा में बनी इस फिल्म परफ्यूम पर करीब 50 मिलियन का खर्च आया था और इसने 135 मिलियन का व्यापार किया था. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और एक्टिंग के लिए जहाँ तारीफ की गई वहीँ आलोचकों को इसका स्क्रीनप्ले कमजोर लगा था.

इस फिल्म की कहानी जीन बैप्टिस्ट ग्रेनौइल्ले की है जो कि एक कुख्यात हत्यारा है, उसे पहले ही दृश्य में चर्च द्वारा मौत की सजा सुनाई जा रही होती है और भीड़ खड़ी देख रही होती है. यहीं से पूरी कहानी फ़्लैश बैक में शुरू होती है.

जीन बैप्टिस्ट को जन्म होते ही उसकी माँ किन्ही कारणों से एक मछली बाजार में छोड़ देती है, वो एक अनाथालय में बड़ा होता है. कम उम्र में ही वो एक चमड़े का काम करने वाले का सहायक होता है और उसी का कुछ सामान पहुँचाने पेरिस जाता है.

पीले फल बेचती एक युवती की खुशबू से आकर्षित होकर वो उसका पीछा करता है और यहीं उसे कई नयी किस्म की खुशबुओं का पता चलता है. उसके अजीब बर्ताव से हैरान परेशान युवती चीखने ही वाली थी कि वो उसे चुप करवाने की कोशिश करता.

सांस रुकने से लड़की की मौत हो जाती है, मृत शरीर को काफी देर तक जीन बैप्टिस्ट सूंघता रहता है लेकिन फिर उसकी समझ में आता है कि लाश में खुशबू नहीं टिकती. अब वो दोबारा उसी लड़की की खुशबू किसी तरीके से पैदा करने पर तुल जाता है.

एक दिन एक परफ्यूम की दुकान में सामान पहुँचाने जाने पर उसका इटालियन मालिक को वो अपनी खुशबू सूंघने और नए इत्र बनाने की क्षमता से हैरान कर देता है. इत्र बनाने वाला उसे अपने पास काम पर रख लेता है. बल्डीनी नाम का ये इत्र बनाने वाला जीन बैप्टिस्ट को इत्र बनाना सिखाता जाता है.

थ्योरी के हिसाब से बारह अलग अलग किस्म की खुशबुओं को मिला कर इत्र बनते थे और एक तेरहवां इत्र था जिसे आज तक कोई बना नहीं पाया था. जीन बैप्टिस्ट लगातार बाल्डीनी के पास सीखता रहता है, लेकिन एक दिन उसे पता चल जाता है कि बाल्डीनी के तरीकों से सभी खुशबुओं को अलग नहीं निकाल सकते.

अब जीन बैप्टिस्ट वहां से ग्रास्स नाम की जगह सीखने जाना चाहता था लेकिन उसका मालिक बाल्डीनी इतनी आसानी से कमाई बढ़ाने वाले को जाने नहीं देना चाहता था. आखिर सफ़र के लिए जरूरी कागज़ात और रकम के बदले में सौ अलग-अलग इत्रों के नुस्खे बना कर देने की बात पर बाल्डीनी राजी होता है.

सफ़र के बीच के रास्ते में ही जीन बैप्टिस्ट का इंसानों की भीड़ से दूर कहीं एकांत में रहने का मन करने लगता है तो वो एक गुफा में जा बैठता है. यहाँ उसे पता चलता है कि उसकी खुद की कोई खुशबू ही नहीं है, इसी वजह से वो और लोगों को अजीब लगता था.

अपने तेरहवें इत्र की तलाश को जारी रखने का इरादा करके वो ग्रास्स की ओर दोबारा रवाना होता है. पहुंचते ही उसे एक अमीर अंटोनी रिचिस की बेटी लॉरा की खुशबू लगती है, और वो उसे ही अपना तेरहवां इत्र बनाने की योजना बना लेता है.

जल्दी ही एक मैडम एर्नल्फी के पास उसे काम भी मिल जाता है और वो नए तरीकों से खुशबू को अलग निकालना सीखने लगता है. एक फूल चुनने वाली की हत्या कर के वो उसकी खुशबू अलग करने में नाकाम भी होता है.

थोड़े दिन बाद एक वेश्या की खुशबू अलग करने में उसे कामयाबी मिल जाती है. अब तो दो-तीन हत्याएं कर के खुशबू अलग कर चुका जीन बैप्टिस्ट बिलकुल पागल ही हो जाता है.

शहर के अलग-अलग हिस्सों में वो लड़कियों को क़त्ल करता, उनकी खुशबू अलग करता और नग्न लाश कहीं फेंक आता. रोज लड़कियों की लाश मिलने से शहर के लोग आतंकित हो गए. कातिल की तलाश शुरू हो गई.

इसी बीच एक पागल हत्याओं का इल्जाम कबूल लेता है. लेकिन जिसे जीन बैप्टिस्ट ने अपना तेरहवां शिकार चुन रखा था उस लड़की के बाप एंटोनी रिचिस को शक था कि कातिल अभी भी आज़ाद ही है.

एक दिन वो चुपके से अपनी बेटी को लेकर शहर से भागता है. उसकी खुशबू का पीछा करता जीन बैप्टिस्ट लड़की को ढूंढ कर उसका क़त्ल कर देता है. उस लड़की के बदन से इत्र निचोड़ कर जैसे ही जीन बैप्टिस्ट निकला उसे धर दबोचा गया.

लाश सामने ही थी और जीन बैप्टिस्ट अपने बचाव की कोई कोशिश नहीं करता है तो उसे सजा के लिए चौक के मंच पर खड़ा किया जाता है. चर्च इत्यादि सब उसे अपराधी मान ही रहे होते हैं और सजा सुनाने ही वाले होते हैं कि अपना तेरहवां इत्र एक बूँद रुमाल पर लगा कर जीन बैप्टिस्ट हवा में लहरा देता है.

अलग-अलग गुणों को दर्शाने वाली खुशबूओं में से तेरहवें का गुण दैवीय था. इस खुशबू का असर फैलते ही सबको जीन बैप्टिस्ट अचानक मासूम लगने लगता है (अब्राह्मिक एंजेल-देवदूत केवल पुरुष होते हैं).

खुशबू के प्रभाव में जो आता है वो अपने करीब खड़े स्त्री-पुरुष से यौन सम्बन्ध बनाने में जुट जाता है. उधर मासूम-बेगुनाह घोषित हो चुका जीन बैप्टिस्ट टहलता हुआ भीड़ से निकल जाता है.

चलते-चलते जीन बैप्टिस्ट को समझ आता है कि इस एक खुशबू के प्रभाव से वो दुनिया पर राज कर तो सकता है, लेकिन इसके प्रभाव से उसे खुद प्रेम नहीं होगा. ना ही किसी को इस खुशबू की वजह से उस से सच्चा प्यार हो सकता था.

तेरहवें इत्र की जीन बैप्टिस्ट की तलाश तो पूरी हो जाती है लेकिन उस खोज का फायदा कुछ भी नहीं ये भी उसकी समझ में आ जाता है. जितना पा लिया उतने से संतुष्ट और कुछ मिलने की इच्छा से निर्लिप्त जीन बैप्टिस्ट उसी मछली बाजार में पहुँचता है जहाँ वो मिला था.

अपनी शीशी का सारा इत्र वो अपने सर पर उड़ेल लेता है. अचानक इस खुशबू से पूरा बाजार एंजेल-देवदूत करता उस पर टूट पड़ता है और उसे नोच खाता है. थोड़ी ही देर में वहां उसके फटे कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचता. गिरी हुई शीशी से इत्र की आखरी बूँद जमीन पर टपकती है और मिट्टी में मिल जाती है.

आपसी बहसों की वजह से ये कातिल फिल्म में कई बार छूटता रहा था. ऐसे ही खूंखार हत्यारों को हमने ‘आतंक का मजहब नहीं होता’ के जुमले की चीख पुकार में छूटते दर्जनों बार देखा है. उन्हें अदालतों से बाइज्ज़त बरी होते देखा है.

बरसों जब न्यायालय “अभि-सेक्स” मनु संघवी वाले कारनामे करता रहा तो अपराधी को टहलते हुए अगला अपराध करने जाते देखा है.

मेनचेस्टर की घटना पर क्या कहना है पूछोगे तो मेरा जवाब वही है जो उनका संसद पर हुए हमलों या मुंबई हमलों के वक्त था. जिन पर न्याय की जिम्मेदारी थी उन्होंने परफ्यूम फिल्म के कातिल जैसा ही कातिल तो खुला छोड़ रखा है. जब तक इसे भीड़ नोच के नहीं खा जाती, ये अपने निरर्थक प्रयास तो करता ही रहेगा.

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