जिहाद का फैलता कैंसर : विश्व के नेता नहीं गढ़ पाये इस्लामी आतंकवाद की परिभाषा

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भारतीय इंटेलिजेंस कम्युनिटी से जुड़ी एक घटना मैंने कहीं पढ़ी थी. भारत में गुप्तचर विभाग में प्रशिक्षण के दौरान मित्र देशों के प्रशिक्षु अधिकारियों से भी मिलवाया जाता है ताकि वे परस्पर अनुभव साझा कर सकें.

ऐसे ही एक ग्रुप में सीआईए, एफएसबी, मोसाद इत्यादि के अधिकारियों संग भारतीय गुप्तचर विभाग के अधिकारी थोड़ी मस्ती कर रहे थे. सीआईए वाले ने सबके लिए महंगी जैक डेनियल शराब मंगाई जिसे कोक में मिलाकर पिया गया.

पीने के बाद सीआईए वाले ने डींग हाँकना शुरू किया कि 9/11 के बाद आज तक अमेरिका की धरती पर एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ इत्यादि. अगले दिन भारतीय अधिकारियों की पिलाने की बारी थी सो इन लोगों ने सस्ती मकडॉवल मंगाई और सीआईए वाले को पिला दी. जब उसे चढ़ गयी तो लगा अमरीकी सरकार को गाली देने. सबने हँसी मजाक किया फिर एक दो दिन में सब अपने देश लौट गए.

यह बड़ी सामान्य सी बात है कि हर व्यक्ति जिस संगठन में काम करता है उससे पूरी तरह संतुष्ट कभी नहीं होता, ऊँच नीच हर जगह होती है फिर भी इस हास्यास्पद घटना में कुछ निहितार्थ छुपे हुए हैं. सीआईए के प्रशिक्षु अधिकारी ने जिहादी आतंक के प्रति बुश और ओबामा की नीतियों का उपहास किया था. उसने बताया कि किस तरह अमेरिका आर्थिक लाभ के चक्कर में आतंक के पोषण और निराकरण के द्वन्द्व में बुरी तरह फंसा हुआ है.

आज मैनचेस्टर में हुए आतंकी हमले से ठीक एक महीना पहले मार्च में वेस्टमिंस्टर में आईएस का हमला हुआ था. इस हमले के मास्टरमाइंड को ब्रिटिश MI5 ने बहुत पहले पूछताछ के लिए पकड़ा था. इसका अर्थ यह हुआ कि आईएस का वह आतंकी पहले से ही ब्रिटेन की आंतरिक गुप्तचर एजेंसी MI5 के रडार पर था.

परन्तु प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने ब्रिटिश संसद में यह कह कर पल्ला झाड़ लिया की ढेर सारी इंटेलिजेंस रिपोर्ट का विश्लेषण बहुत कठिन कार्य है. आज से ठीक चार वर्ष पूर्व 22 मई 2013 को दो जिहादी उन्मादियों ने फ़ुज़िलियर ली रिग्बी की हत्या कर दी थी. रिग्बी ब्रिटिश इन्फैंट्री की फ़ुज़िलियर रेजिमेंट का जवान था. रिग्बी की हत्या जिहाद के विरुद्ध जारी युद्ध के प्रतिशोध के रूप में की गयी थी.

ब्रिटिश समयानुसार 22 मई 2017 को मैनचेस्टर में 22 निर्दोष नागरिकों की हत्या रिग्बी इसी प्रतिशोध का विस्तार मात्र है. इस्लामी जिहाद अब जिहादी विचार से ग्रसित कुछ गिरोहों के क्रियाकलाप तक सीमित नहीं रहा. लोन वुल्फ अर्थात् छुट्टे भेड़िये हर जगह आतंक फ़ैलाने को आतुर हैं.

जिहादी विचारधारा कैंसर की भाँति फ़ैल रही है लेकिन विश्व के नेता अभी तक इस्लामी आतंकवाद की परिभाषा ही नहीं गढ़ पाये हैं. अंतर्राष्ट्रीय विधि विशेषज्ञ मैल्कम शॉ अपनी पुस्तक इंटरनेशनल लॉ में लिखते हैं कि वैश्विक आतंकवाद से निबटने के लिए सबसे बड़ी समस्या है आतंकवाद को परिभाषित करना. जब तक संयुक्त राष्ट्र इस्लामी आतंक को परिभाषित नहीं करता तब तक वर्षों से लम्बित Comprehensive Convention on International Terrorism का प्रस्ताव निरर्थक है क्योंकि इस प्रस्तावित सन्धि के अनुसार हस्ताक्षर करने वाले प्रत्येक देश को अपने यहाँ आतंकवाद निरोधक कानून बनाना पड़ेगा.

भारत भी इसी उहापोह में वर्षों से फंसा है. कारगिल की लड़ाई के उपरांत गठित किये गए मंत्रियों के समूह और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के सुझावों में से एक यह भी है कि सरकार आतंकवाद को परिभाषित करे ताकि कड़े कानून बन सकें.

समस्या विधि तक ही सीमित नहीं है. यूरोपीय देश अपने उच्च जीवन स्तर से समझौता करने को राजी नहीं हैं इसीलिए वे अपनी अर्थव्यवस्था को गिरने नहीं देना चाहते. रुचिर शर्मा अपनी पुस्तक Rise and Fall of Nations में लिखते हैं कि जर्मनी में 2015 के बाद घुसे सीरियाई शरणार्थियों के कारण वहाँ मजदूरों की कमी नहीं हुई. मुस्लिम देशों से भाग कर शरणार्थियों का यूरोप में जाना वहाँ के लिए वरदान सिद्ध हुआ.

जहाँ भारत जैसे देश बढ़ती जनसंख्या से चिंतित हैं वहीं यूरोप कामगारों की घटती संख्या से परेशान है. लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाये तो इस्लामी आतंक का कैंसर कब किसके दिमाग में घर बना लेगा कोई नहीं जानता. यूरोपीय देश सीरिया के लोगों को शरण देने की कीमत अपनी औरतों के बलात्कार के रूप में चुका रहे हैं.

वैश्विक जिहाद का हाथ थामने वालों में लिबरल मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग भी पीछे नहीं है. एक मासूम बच्चे आयलन कुर्दी के समुद्र किनारे पड़े शव को इतना बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया जिससे एक वैश्विक अपील खड़ी की जा सके. ध्यातव्य है कि किसी अन्य इस्लामी देश ने शरणार्थियों को अपने यहाँ स्थान नहीं दिया.

बौद्धिक वर्ग हर उस आवाज को भी दबा देना चाहता है जो इस्लाम के विरुद्ध उठती है. ट्रम्प भी आज इसी लिबरल बौद्धिक वर्ग के निशाने पर हैं. जब ट्रम्प ने डॉ सेबास्शियन गोर्का को अपना सलाहकार नियुक्त किया तो अखबारों में गोर्का की योग्यता पर सवालिया निशान लगाते हुए खूब लेख लिखे गए.

कहा गया कि ये आदमी तो पागल है. गोर्का की आलोचना इसलिए की गयी क्योंकि वे कहते हैं कि आतंक के विरुद्ध लड़ने हेतु प्रत्येक सैनिक को कुरान अवश्य पढ़नी चाहिये. क़ुरान वह मौलिक सिद्धांत है जो जिहादी मानसिकता को सींचता है. गोर्का के अनुसार बिना क़ुरान का अध्ययन किये जिहादी मनोविज्ञान को नहीं समझा जा सकता.

अनुभवी पूर्व ब्रिटिश इंटेलिजेंस अधिकारी जॉन ह्यू्स विल्सन ने अपनी पुस्तक On Intelligence में लिखा है आतंकवादी और राजनैतिक हिंसा करने की इस्लाम की सदियों की परम्परा रही है.

प्रश्न है कि इन विचारकों को यूरोपीय देश कब महत्व देंगे. मैं व्यक्तिगत रूप से मैनचेस्टर पर हुए हमले को ब्रिटिश इंटेलिजेंस एजेंसियों की अक्षमता नहीं मानता. वेश्यावृत्ति के बाद गुप्तचरी विश्व का दूसरा सबसे पुराना पेशा है. विश्व की सबसे पुरानी एजेंसी भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो को ब्रिटेन ने ही बनाया था.

ब्रिटेन में लगातार हो रहे हमले वहाँ की शुतुरमुर्गी सरकार के रवैये की देन हैं. टोनी ब्लेयर के जमाने में पाकिस्तान से भी लोगों को लाकर बसाया जा रहा था. खतरा गम्भीर है. ब्रिटेन का नेतृत्व जितनी जल्दी समझ जाए उतना अच्छा.

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