बदरी सदृश्यं भूतो न भविष्यति – 2

भगवान बदरी विशाल बेहद करुणामय, सर्वव्यापक, सर्व शक्तिमान और लौकिक अलौकिक हर रूप में हैं.

श्याम वर्णीय शालिग्राम शिला पर स्वंय भू स्वयं निर्मित भगवान का विग्रह अदभुत है. भगवान का जब श्रृंगार होता है तब उनका रूप सौन्दर्य बहुत आकर्षक और दिव्य होता है. चमत्कृत करने के साथ साथ उनकी छवि मोहित ही नहीं सम्मोहित भी कर देती है.

स्वर्ण सिंहासन पर विराजित प्रभु “श्याम वर्ण, पूरे शरीर पर दिव्य वस्त्र, सिर पर भव्य स्वर्ण मुकुट, माथे पर हीरे का तिलक, गले में आभूषणों के साथ साथ पवित्र और आत्मीता से गुंथी पवित्र तुलसी सहित अनेक सुगंधित पुष्पों की माला, साथ में देवताओं के खजांची कुबेर जी. सब कुछ छोड़ कर विद्वता, तर्क को त्याग कर ज्ञान के अहंकार को त्याग कर सिर्फ और सिर्फ भगवान की भक्ति पाने, सानिध्य पाने के लिए बदरीनाथ आये “उद्दव” जी महाराज.

देवर्षि नारद जी महाराज के साथ पदमासन्न में बेठे भगवान का यह रूप जिसने एक झलक में भी देखा उसे क्या खुशी मिलती है वही जानता है. भगवान का यह रूप हजारों जन्म के बाद देखने को मिलता है.

पर सुबह भगवान के स्नान से पहले उनका जो निर्वाण दर्शन होता है वह भी अलौकिक और अव्याख्यायित होता है. पदम आसन लगाये शान्त तप मुद्रा में बैठे प्रभु दाहिनी ओर जटा, जनेऊ, भगवान का यह रूप हर व्यक्ति को “अहं ब्रह्मास्मि” के तत्व बोध से परिचित कराता है.

शक्ति शाली होने के बावजूद विनम्रता और क्षमा भगवान से सीखें.

भगवान की सुबह जब आरती होती है जब रावल जी भगवान के वक्षस्थल पर भी आरती ले जाते हैं धर्माधिकारी बताते हैं भगवान की छाती पर जब भृगु ने पाद प्रहार किया था तब यह निशान पड़ा.  कहते हैं कि ब्रह्मा, महेश और विष्णु के धैर्य की परीक्षा और अपनी उत्सुकता के लिए जब ब्रह्मा और शिव ने उत्तर नहीं दिया, भगवान “श्री हरि” शान्त बैठे यहां तप रत थे. भृगु ने आते ही प्रभु की छाती पर अपने पैरों से प्रहार दिया.

प्रभु सर्व शक्तिशाली होने के बावजूद भी आक्रोशित होने के बजाय शान्त ढंग से मुस्कुराये और भृगु से बोले “इस हिमालय में तप करते करते मेरा शरीर वज्र हो गया कहीं मेरी छाती पर प्रहार करते हुये आपके पैरों पर चोट तो नहीं लगी आज्ञा हो तो पैर दबा दूं! रो पड़े भृगु भगवान की इस विनम्रता को देखकर. और क्षमा क्षमा कहते हुये भगवान के चरणों में गिर पड़े. यह है शक्तिशाली होने के बावजूद भी शान्त और विनम्रता का रूप. जो भगवान के अलावा किसी में हो ही नहीं सकता.

– वासुदेव कालरा

बदरी सदृश्यं भूतो न भविष्यति – 1

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