सर्व-धर्म-समभाव रखिए, पर सर्व-संस्कृति-समभाव से बचिए

कक्षा में पहले आने वाले अच्छे मुलाज़िम बनते है. कक्षा में साधारण अंक लेने वाले अच्छे अधिकारी बनते है, और पहले आने वालों के प्रबंधक बन जाते है.

कक्षा में सब से कम अंक लेने वाले या तो व्यवसायों के मालिक बनते है, या राजनेता, लेकिन उपर निर्देशित दोनों तरह के लोगों के मालिक बन बैठते है.

हम यह चुटकुला हमेशा सुनते है. यह विडम्बना जितनी मज़ेदार है, उतनी ही उसके पीछे से झाँकती वास्तविकता कारुणिक और मानवीय.

जैसा इन पढ़ाकू लोगों के साथ होता है वैसा ही पढ़ाकू समुदायों के साथ भी होता है.

इंका, माया, पारसी, इजिप्शियन सारी प्राचीन और मध्ययुगीन सभ्यताएं सम्पन्न थी – न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, और आध्यात्मिक दृष्टि से भी प्रगल्भ और विकसित थीं. उनमें जो था नहीं, वह था सिर्फ सामरिक प्रभुत्व.

शायद सामरिक प्रभुत्व की उन्हें एक मर्यादा से अधिक कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी थी. रण में जौहर दिखा कर शत्रु के सर काट कर लाना तो उनके संस्कृति में शामिल था, लेकिन एक सभ्यता का दूसरे सभ्यता से सामरिक मुकाबला हो सकता है, इस की भनक उन लोगों में नहीं थी.

युद्ध के अपने नियमों का वे पालन करते थे, और सभी लोग उन नियमों का पालन करेंगे, ऐसा उनका विश्वास था. इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने जो यूरोप की सत्ताओं से संघर्ष छेड़े थे, उन का उन्नत शस्त्रास्त्र और तत्वहीन समरनीति के कारण आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हो कर भी उन की पराजय हुई.

उभरते इस्लामी काल में, सातवी से लेकर ग्यारह-बारहवीं सदी तक इस्लाम के पास सामरिक वर्चस्व था. उस के बूते पर उन्होंने आफ्रिका (इजिप्ट वगैरह), यूरोप (बाइजेंटाइन साम्राज्य, तुर्की, स्पेन पुर्तग़ाल, मध्य और पूर्वी यूरोप), एशिया (मध्य एशिया, जिसमें ___स्तान नाम के कई भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक शामिल है, फ़ारस, सद्यकालीन पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी तुर्केस्तान, जो चीन में है) इन में पैठ बना ली.

ईसाईयत ने अमेरिका कब्ज़ाया, तद्देशीय संस्कृति का समूल नाश किया. इतना ही नहीं, उन के वंश को भी लगभग ख़त्म कर दिया, उस में यूरोपियन मूल के लोगों को बसा कर उपनिवेश के अर्थ को अंतिम पड़ाव तक ले गए.

इस्लाम में जो कोई देश हड़पा, केवल सामरिक, राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी उसे हड़प लिया. आज आप पूर्वी तुर्केस्तान जाएं, जो पश्चिम चीन में शिंजियांग प्रांत है, या फिर आप जकार्ता जाएं, या यमन में सना, या और कहीं, आप को जो दिखाई देगा, वह स्थानीय संस्कृति नहीं होगी, बस इस्लामी संस्कृति होगी.

स्थानीय संस्कृति का कोई निशान बचा भी होगा, तो उसे भुनाते हुए भी कैसे नष्ट किया जा सकेगा उस की व्यवस्था स्थानीय इस्लामी नेतृत्व कर रहा होगा.

इस के लिए उन के पास एक घातक हथियार है – ईशनिंदा का धार्मिक क़ानून. अपनी योजना के विरुद्ध जो कुछ भी हो रहा है, उस के कर्ता को आप ईशनिंदा के आरोप में फँसा दीजिए, और उस के साथ फिर चाहे जो कर लीजिए, कोई रोक-टोक संभव नहीं है.

इंडोनेशिया में बासुकी पुरनामा नामक एक ईसाई राज्यपाल को केवल इसलिए ईशनिंदा के आरोप में सजा दी गई, कि उसने गत वर्ष आरोप लगाया था कि जकार्ता के इमाम कुरआन की आयतों का उपयोग ईसाई प्रत्याशियों के विरुद्ध जनता को भड़काने के लिए कर रहे थे, जो कि अनुचित था. बस, हो गई ईशनिंदा, और हो गई उसे पांच वर्ष की सज़ा.

जो काम इस्लाम ईशनिंदा से लेता है, ईसाईयत मानवाधिकारों के विलाप से कर लेती है. यूरोप-अमरीका के भोले-भाले लोगों से धर्म प्रचार के नाम से पैसा ऐंठ कर उसे यहां लगभग लोग खरीदने के काम में लाया जाता है, जो लोग मानवाधिकार हनन के आरोप होने पर इन के सुर में सुर मिला कर हुआँ-हुआँ कर अनुमोदन देते है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उन्हें आवश्यक पुष्टि हो जाती है, और एक तथ्यहीन आरोप सिद्ध हो जाता है.

आजकल जहाँ बस चले, ईशनिंदा और मानवाधिकारों के हनन का रोना शुरू करने के लिए अल्पसंख्यक तैयार बैठे होते है, जिसके पीछे मंशा होती है सांस्कृतिक और सामाजिक वर्चस्व प्रस्थापित करना.

ये खेल इतने ऊपर से खेला जाता है, कि आम नागरिक इस से पूर्णतया अनभिज्ञ रहता है. उस की आँखों में जो पड़ता है वो है इन षडयंत्रों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए चल रहा स्थानीय संस्कृति और समाज के पुरस्कर्ताओं का प्रयास.

उन्हें वे अनायास “कट्टरपंथी” कह देते है, क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन की आँच उन्हें अभी छू नहीं रही होती है. और जब छू लेती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

ख़ैर, इस मामले में लिखते रहने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन हमें आज भारतीय थर्म और इन आयातित धर्मों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी होगी.

भारतीय धर्म भारतीय संस्कृति के परिवेश में लिपटे हुए है, और आयातित धर्म भारतीय संस्कृति को अपने उगम के प्रदेश की संस्कृति से बदलने का प्रयास करते है, क्योंकि उस संस्कृति से उन धर्मों की पहचान संलग्न है.

सर्व-धर्म-समभाव अवश्य रखिए, पर सर्व-संस्कृति-समभाव आप के जान-माल और अस्मिता के लिए बहुत ही खतरनाक है, उस से बचिए. राष्ट्रवादी विचार अपनाइए, इस का कोई पर्याय नहीं है.

जय हिन्द. जय श्रीराम.

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