ऐसी सभ्यता किस काम की, जहां जीवन की चाहत को छोड़, सबकी चाहत हो!

आप के दादा-नाना क्या खाते-पीते थे? रोटी सब्जी चावल दाल दूध दही फल मांस मछली आदि आदि.

माता-पिता क्या खाते-पीते रहे हैं? यही सब.

आप क्या खाते-पीते हैं? यही सब, साथ ही पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और कोक आदि आदि जुड़ गया.

अरे मगर उसमें भी है तो अनाज और सब्जियां फल आदि ही, या कुछ खाने की नई चीज की खोज कर ली और पीने के लिए पानी का कोई सब्स्टिटूयट ढूंढ लिया, नई पीढ़ी ने?

नहीं.

चलिए आगे बढ़ते हैं, आप के दादा-नाना क्या पहनते थे, किस पर चलते थे, कहाँ रहते थे?

धोती कुर्ता, बैलगाड़ी – साइकिल और सामान्य कच्चे पक्के मकान.

और आप के माता-पिता की उम्र के लोग? साड़ी सलवार और पैन्ट कमीज, स्कूटर-कार और पक्के मकान.

और आप? ब्रांडेड कपड़े, वातनकुलित मकान और गाड़ी.

चलो यही तुलना हर बात पर कर लेना. अब एक बात सच सच अपने आप से बताना कि तीनों पीढ़ी के जीवन को “कम्प्लीट पैकेज” में देखें तो कौन ज्यादा मजे में जीवन गुजार गया. कौन जीवन का अधिक आनंद ले गया. कौन ज्यादा खुश रहा. इसका सही जवाब उन कहानियों में है जो हमने अपनी दादी-नानी से सुन रखी है, जिसमें वे भी अपने दादा-नाना के ज़माने के किस्से बड़े शान से सुनाती.

सीधे सीधे कहें तो पीढ़ियों के साथ सुविधा तो बड़ी है मगर सुख कम हुआ है. सच भी तो है , पीढ़ियां गुजर गयीं, सब में फर्क आया, बस एक को छोड़कर, खाने और पीने में. उलटे पहले कोई भिखारी नहीं होता था. कोई भूखा नहीं मरता था. अब तो पानी भी मुफ्त और शुद्ध नहीं मिलता. ताजी हवा क्या होती है वो किसी बगीचे में अंतिम साँसे गिन रही है. अगली पीढ़ी ऑक्सीजन का बिकना भी देख लेगी.

अब यहाँ कोई विज्ञान का बखान ना करने लगना. सच कहें तो संचार ने दूरियां बढ़ाई हैं. चिकित्सा का सच देखना है तो अस्पताल जाओ. life में quantity बड़ी है quality घटी है.

लेख को चाहे जितना विस्तार दे दो, लेकिन अंत में एक उदाहरण ही काफी होगा, क्या दादा-नाना के ज़माने में डिप्रेशन शब्द सुना था? क्या आत्महत्या इतनी कॉमन थी? पश्चिम में सबसे ज्यादा अगर किसी चिकित्सक की जरूरत है तो वो है मनोचिकित्सक की.

ऐसा समाज सभ्यता संस्कृति किस काम की, जहां जीवन की चाहत को छोड़ कर बाकी सबकी चाहत हो.

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