वोटों के ठेकेदारों, हिन्दू बहुदेवपूजक हैं यह खयाल रहे!

कोई भी कानून बनाया जाता है तो उसका समाज पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता ही है. हर समाज को चाहिए कि इस होनेवाले असर को समझ लें, उसके प्रभाव को, होनेवाले फायदे को तथा नुकसान को भी नाप लें और उस हिसाब से समाज में पर्याप्त जनजागरण करें.

[सुव्यवस्थित कार्यपद्धति के साथ होता है लव जिहाद]

समर्थन हो या विरोध, लेकिन जनसामान्य तक इस कानून के प्रभाव को पहुंचाना और सामाजिक जागृति लाना आवश्यक है.

हिन्दू की पैतृक संपत्ति में बेटी के हिस्से को लेकर कानून में जो सुधार किया गया है उसका मुसलमान लव जिहाद के लिए गलत उपयोग कर रहे हैं यह किस्से सामने आ रहे हैं. शर्म के मारे ऐसे माँ-बाप चुप रहे जाते हैं और नुकसान सह जाते हैं.

इस विषय पर पहले लिखे लेख पर जिस तरह से चौतरफा प्रतिसाद मिला उससे यही साफ-साफ दिख रहा है कि मेरा सुना हुआ किस्सा किसी की गढ़ी हुई कहानी नहीं थी बल्कि यह वाकई एक सोची समझी कार्यप्रणाली के तहत हिन्दू समाज पर हमला किया जा रहा है. पता नहीं कितने अपनी बात लिखे बगैर रह गए लेकिन अपनी ही कहानी का प्रतिबिंब उस लेख में देख रहे थे.

इस लेख का मूल विषय है कानून का सामाजिक प्रभाव. हिन्दू के अलावा हर किसी धर्म का समाज कानून के हर पहलू पर सोचता है और अपनी तरह से उसमें बदलाव के लिए lobbying करता है – जब कभी ऐसा कानून आए तो.

शाहबानों या तीन तलाक पर मुसलमानों का बवाल तो आप देख ही रहे हैं, 1986 में महाराष्ट्र में इच्छामृत्यु विधेयक लाया गया था तो चर्च ने भी कम बवाल नहीं काटा था. बाकी हर समाज के बारे में लिखकर बात भटकाने की इच्छा नहीं है. मुद्दा यही है कि हिन्दू ही इस मामले में अंधा हो जाता है या फिर उसे देखने दिया नहीं जाता.

क्या हिन्दू हितों की ठेकेदारी करते राजनैतिक पक्षों की यह ज़िम्मेदारी नहीं कि ऐसे क़ानूनों का डीटेल में अध्ययन करें, उनके दीर्घकालिक परिणामों के प्रति जनजागरण करें?

क्या आप लोग मुसलमानों के इरादों से नावाकिफ हैं? क्या लव जिहाद आप के लिए बस एक चुनावी मुद्दा है या क्या हिन्दू ही आप के लिए वो उपेक्षित खंडहर मंदिर का जागृत देवता है जिसे केवल चुनाव के वक्त नमस्कार करने आते हैं आप लोग?

प्रसादी पा ली, कपाट बंद अगले चुनाव तक, और चाभी अपनी ही जेब में? मंदिर के बाहर एक बोर्ड गाड़ दिया – ‘ये संपत्ति हमारी पार्टी की है, इसमें घुसने वालों का कानूनी इलाज किया जाएगा!’

इसके लिए खोजी बुद्धि के समर्पित अधिवक्ताओं की आवश्यकता होती है. आज एक व्यावहारिक बात यह भी है कि हिन्दुत्व की लड़ाई लड़नेवालों पर दबाव बहुत आते हैं.

ये पार्टियां या संगठन योगक्षेम की कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठाती, जो कि आवश्यक है हिन्दू के लिए. इस्लाम के लिए या इसाईयत के लिए लड़ने वाले मुसलमान या ईसाई वकील पर कोई दबाव नहीं आता, कोई उस से पंगा नहीं लेता. और हिन्दू वकील का कुन्दन चंद्रावत किया जाता है.

आज की तारीख में यह जरूरी है कि ऐसे कानून में अगर यह सेंध है जिसका विधर्मी गलत फायदा उठा रहे हैं तो उस पर जनजागरण हो और इस सेंध को बंद किया जाये. मुसलमान तो ऐसे लूपहोल पर गिद्ध नजर ही गड़ाये रहते हैं क्योंकि इससे –

1. काफिर की बेटी भगाने से उसको नीचा दिखाया जाता है.

2. काफिरों की एक औरत कम हो जाती है जो उनकी संख्या बढ़ा सकती थी वो मुसलमान की तादाद बढ़ाने में निचोड़ी जाएगी.

3. काफिर की जायदाद भी आप हड़प सकते हैं बिना मेहनत के.

सवाब ही सवाब, है कि नहीं?

हिंदुवादी पार्टियां ऐसे मामलों को ले कर कब तक शुतुरमुर्ग बनकर सेक्युलरिज़्म की रेत में सर घुसाए रहेंगी?

ठीक है, जब जागे तब सवेरा! अब जो चुनाव आ रहे हैं वहाँ हिंदुओं को हिन्दुत्व का झण्डा उठाकर अपने दर पर आने वाले उम्मीदवारों को यह सवाल पूछना आवश्यक है.

न केवल आप की बेटी का सवाल है, आप के घर का भी सवाल है. कोई मोबाइल टपरीवाला फैजलवा पचास जालियों को लेकर आए और आप को कहे अपना घर बेचकर मेरी बीवी का हिस्सा दो – क्या करेंगे आप?

हिस्सा आप की बेटी का नहीं, उसकी बीवी का है, वो उसका हो जाता है क्योंकि अल्लाह के बाद शौहर की आज्ञा पालना यह अल्लाह की ही आज्ञा है. तलाक दिया उसके बाद तो माल उसका, बेटी को लेकर सर फोड़ते रहिए खुद का.

पूछिए हिंदुवादी राजनेताओं को, क्या करेंगे आप इस कानून का लूपहोल बंद करने को? घोषणापत्र में यह मुद्दा आना चाहिए. कब तक सेक्युलरिज़्म के नाम पर हलाक किए जाएँगे, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है और अस्तित्व रक्षण (survival) सब से मौलिक मानवाधिकार है.

अनुशासन का बहाना नहीं चलेगा चुप्पी के लिए, क्योंकि शीर्ष नेता अविवाहित रहते हैं, कोई बेटी होती नहीं उनकी जिसकी ढाल बनाकर उनकी संपत्ति लूटी जाये, उन्हें बेघर, बेदखल किया जाये. They do not have a personal stake. निस्सीम निकोलस तालेब के शब्दों में – they don’t have any skin in the game!

बेटी आप की है, घर आप का है. इनसे सवाल पूछना जरूरी है. ऐसे हर कानून की समीक्षा होनी जरूरी है, हमारे तरफ से भी विधि विशेषज्ञ होने चाहिए जिनकी ज़िम्मेदारी पक्षों को उठानी चाहिए.

हिन्दू वोट से ही जीतते हैं तो हिन्दू हित का रक्षण करना भी आप की ज़िम्मेदारी है, इसमें यह बात भी समाविष्ट है. अन्य समाज में यह बात समझी जाती है, हमारे यहाँ तो लगता है इसकी जान बूझकर उपेक्षा की जाती है.

क्या आप वाकई हिंदुओं के हितैषी हैं? कृपया कोई यह कुत्सित प्रश्न न पूछे कि “और कौन है आप की नज़र में?”

आप को पहले ही उत्तर दे रहा हूँ – हिन्दू बहुदेवपूजक है यह तो जानते होंगे आप? वो पीर चंगाई में तभी जाता है जब अपनों से निराश होता है.

वैसे, ऐसी भी जरूरत नहीं है, लेकिन हिन्दू बहुदेवपूजक हैं यह खयाल रहे. अलख निरंजन!

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