नास्त्रेदमस मई 1555 में लिख चुके थे राजीव गांधी के जीवन की पटकथा

एक फिल्म बनाने के पूर्व सबसे पहले उसकी कहानी लिखी जाती है और कहानी पूरी हो जाने के बाद उस कहानी को अभिनेताओं पर फिल्माया जाता है. राजीव गांधी के जीवन के बारे में  भी एक पटकथा लिखी गयी थी, जिसका फिल्मांकन 1984 से शुरू हुआ था-

12 मई 1991 को तिरूवल्लूवर के अरुकोणम में विश्वनाथ प्रतापसिंह और करुणानिधि की रैली थी. इस रैली में धनु नाम की एक तमिल लड़की ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को माला पहनाकर पैर छु. क्योकि 21मई को श्रीपेरम्बदूर मे राजीव गांधी की चुनावी रैली का आयोजन था और धनु पूर्वाभ्यास कर रही थी, उस पटकथा का जो आज से #462_साल_पहले_लिखी_गयी_थी…

उसका पूर्वाभ्यास सफल रहा, जैसे एक खिलाड़ी अंतिम मैच से पहले नेट प्रेक्टिस करता है या एक सांईस्टिस्ट किसी दवा को मरीज को देने से पहले जानवरो पर उसका परीक्षण करता है.

1984 मे राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तमिलनाडु मे श्रीलंका के तमिल शरणार्थियो की बाड़ सी आ गयी थी. श्रीलंका मे जारी गृहयुद्ध से बचने के लिये लाखो तमिलों ने भारत में शरण ली. राजीव गांधी ने इस गृहयुद्ध को खत्म करने के उद्देश्य से जुलाई 1987 मे श्रीलंका के राष्ट्रपति जे आर जयवर्धने के साथ एक समझौता किया.

इस समझौते के तहत इंडियन पीस कीपिंग फोर्स ‘IPKF’ या शांति सेना को लिट्टे और अन्य तमिल उग्रवादियो के हथियार डलवाकर शांति बहाल करना थी, पर लिट्टे और तमिल इस समझौते के विरूद्ध थे. इस समझौते की शाम ही श्रीलंका के नौसैनिक ‘विजीथा रोहाना’ ने राजीव गांधी पर बंदूक की बट से हमला कर दिया जब वे परेड की सलामी ले रहे थे.

ये घटना बता रही थी कि राजीव गांधी के इस निर्णय से श्रीलंकाई तमिलों में कितनी नाराजगी थी और इस घटना ने उस खूनी भविष्य के बारे मे दुनिया को आगाह कर दिया था जो कि राजीव गांधी के जन्म लेने से चार शताब्दी पूर्व ही लिखा जा चुका था.

श्रीलंका में शांति सेना भेजने से पहले लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण दिल्ली मे राजीव गांधी से मिलने आये. राजीव प्रभाकरण के साथ बड़ी बेरुखी से मिले और उन्होने प्रभाकरण से इस समझौते को मानने को कहा. किंतु प्रभाकरण ने तमिल हितों की खातिर इस समझौते को मानने से इंकार कर दिया, तब राजीव ने प्रभाकरण को उसी होटल में नजरबंद कर दिया, जहां वो ठहरे थे.

राजीव ने प्रभाकरण को तब छोड़ा जब उन्होने शर्ते मान लेने का आश्वासन दिया. प्रभाकरण ने उस वक्त तो “हां” कह दी और वे वहां से छूटकर श्रीलंका पहुंच गये पर उसी दिन से प्रभाकरण ने राजीव को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया, क्योंकि लिट्टे श्रीलंका में सिंहलियों द्वारा तमिलों के साथ किये जा रहे भेदभाव के खिलाफ 1976 से ही संघर्ष कर रहा था और उसे आशा थी कि भारत तमिलों का इस संघर्ष में साथ देगा… पर हुआ उल्टा, भारत तमिलों के विरूद्ध सिंहलियों के साथ खड़ा हो गया.

इस समझौते के बाद राजीव ने श्रीलंका मे शांति सेना भेजी, बिना किसी योजना, बिना लिट्टे की शक्ति जाने, भारतीय शांति सेना को न श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति का पता था और न उसे घने जंगलों में लिट्टे के उग्रवादियों से लड़ने की कोई ट्रेनिंग दी गयी. नतीजतन जो सेना वहां शांति स्थापना करने गयी थी वो वहां एक अनचाहे युद्ध मे फंस गयी. इस अंधे युद्ध मे भारतीय शांति सेना के लगभग 1500 सैनिक शहीद हो गये. लिट्टे के भी हजारों सैनिक और निर्दोष तमिल नागरिक इस युद्ध के दौरान मारे गये. अपने ही देश से गये नागरिकों के साथ इस तरह के खूनी संघर्ष का दुनिया में दूसरा उदाहरण मिलना असंभव है.

इस खूनी संघर्ष से भारत और श्रीलंका दोनों ही देशों में शांति सेना को लेकर राजनीति में उबाल आ गया. कहा तो ये तक जाता है कि भारतीय शांति सेना को नुकसान पहुंचाने के लिये लिट्टे और श्रीलंका सेना ने अघोषित रूप से हाथ मिला लिया था, ताकि भारतीय शांति सेना पराजित होकर यहां से वापस लौट जाये.

1989 के आम लोकसभा चुनाव में राजीव के विरोधी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने चुनाव में वादा किया कि वे यदि प्रधानमंत्री बने तो वे तुरंत शांति सेना को वापस बुला लेंगे.

बोफोर्स घोटाले की आंच से राजीव चुनाव हार गये. वीपी सिंह ने चुनाव में किये वादे के अनुसार श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के अनुरोध पर शांति सेना 1990 में वापस बुला ली, किंतु मंडल और कमंडल की राजनीति के उफान के बाद वीपी सिंह और बाद मे चंद्रशेखर की सरकार गिर गई, नयी लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गयी.\

लिट्टे को लगा कि यदि राजीव दोबारा सत्ता मे लौटे तो वे श्रीलंका मे फिर से सेना भेज देंगे. बौखलाए प्रभाकरण ने तब एक बेहद खतरनाक षड़यंत्र रचने की योजना बनाई, जिसको पूरा करने की जिम्मेदारी ‘शिवरासन’ को दी. शिवरासन ने धनु, नलिनी मुरुगन, संथन, पेरारिवलन, हरिबाबू और कुछ अन्य तमिल उग्रवादियों के साथ मिलकर इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया.

शिवरासन ने राजीव की हत्या मानव बम से करने की योजना बनाई पर उसे ऐसा मानव बम मिलना मुश्किल हो रहा था जो आसानी से राजीव तक पहुंच जाये, तब शिवरासन ने अपनी ही चचेरी बहनों धनु और शुभा को इस काम के लिये चुना, क्योंकि राजीव की मृत्य एक महिला के हाथों ही होना थी क्योंकि नियति में यह पहले ही लिखा जा चुका था.

शिवरासन ने बम बनाने की जिम्मेदारी लिट्टे के बम एक्सपर्ट ‘अरिवू’ को दी, उसे ऐसा बम तैयार करने को कहा जो कमर में पहना जा सके. अरिवू ने वह बम तैयार कर दिया. इसी बम से भरे बेल्ट के साथ धनु ने वीपी सिंह के पैर छुऐ थे, बस बटन नहीं दबाया था.

21मई को राजीव की श्रीपेरम्बदूर मे सभा तय हो चुकी थी. धनु ने घटना को अंजाम देने के लिये एक ढीला कुर्ता सिलवाया, जिसके अंदर बम से भरी बेल्ट को पहना जा सके. 20 मई की रात उन्होंने भी एक फिल्म देखी और सो गये. वे इस घटना से अनजान थे कि वे खुद एक बड़ी फिल्म की कहानी में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. सुबह वे अपनी साजिश को पूरा करने निकल पड़े.

राजीव को सभा में आने में देर हो गयी. बार बार उनके आने की घोषणा हो रही थी. रात 11बजे राजीव सभा मे पहुंच गये. सभी साजिशकर्ता वहां पहले से ही मौजूद थे. लोग उनसे मिलने को धक्का मुक्की मचा रहे थे. शिवरासन ने धनु को योजना पूरा करने का इशारा किया. धनु राजीव की ओर बड़ी परंतु महिला सुरक्षाकर्मियो ने उसे रोकना चाहा.

राजीव ने सुरक्षाकर्मियों को टोकते हुऐ धनु को अपने पास आने दिया. हरिबाबू अपने कैमरे से उस घटना के फोटो खींच रहा था जिसे कि तमिल संघर्ष के इतिहास में लिखने का उससे वादा किया गया था. धनु ने तय योजना के अनुसार राजीव को चंदन की माला पहनाई और उनके पैर छुए.

राजीव उसे उठाने के लिये झुके, धनु को बस इसी क्षण का इंतजार था उसने बटन दबा दिया, एक जोरदार धमाका हुआ, चारों ओर  धुंआ छा गया, जब धुआं छटा तो राजीव की तलाश की गयी, उनका शरीर एक ओर पड़ा था जबकि सर दूसरी ओर, आगे से उनका चेहरा पूरी तरह उड़ गया था. चारों ओर चीख पुकार मच गयी थी, हरिबाबू भी उस विस्फोट में मारा गया, उसका कैमरा वहीं गिर गया और उसके कैमरे से खीची गयी तस्वीरो ने ही गुनाहगारों के सारे राज से पर्दा उठाया.

21मई 1991 की ये घटना उस कहानी का अंतिम भाग था जिसे पूरा होने मे पूरे 436 साल लग गये थे. राजीव का श्रीलंका मे शांति सेना भेजना सही था या गलत, प्रभाकरण और लिट्टे की ताकत का सटीक अंदाजा लगाये बिना युद्ध में कूद जाना,1500 सैनिको की शहादत, वह भी अपने ही देश के नागरिको के साथ लड़ते हुए, इस पर आज भी बहस की जाती है, क्योंकि हम केवल वर्तमान ही देख पाते हैं और समझते हैं कि ऐसा कर लेते तो वैसा हो जाता, वैसा करते तो ऐसा होता, पर कुछ चीजे पहले से तय होती है, जिन्हें भोगना हमारी नियति में लिखा होता है. राजीव हत्याकांड भी ऐसी ही एक नियति का सच था जिसे कि 1555 में ही इन शब्दों में लिखा जा चुका था-

”एक पायलट भारी बहुमत के साथ सत्ता में आयेगा,
अपना व्यवसाय छोड़कर वह राज्य की सत्ता के सर्वोच्च पद पर होगा,
पर सात साल बाद वह काउंटरमेंडेड (चुनाव प्रचार के दौरान मृत) हो जायेगा,
एक बर्बर सेना उसके विरूद्ध ऐसा कार्य करेगी कि वेनिस (इटली) आतंकित हो उठेगा.”
– (सेंचुरी 6 छंद75)

“बदले की भावना से भरी वह महिला अपने राजनेता के विरूद्ध षड़यंत्र रचेगी,
उस राज को वह अपने तक ही सीमित रखेगी,
परंतु षड़यंत्रकर्ताओ का पता लग जायेगा,
पर तब तक सत्रह शहीद हो चुके होंगे.”
– (सेंचुरी 6 छंद 59)

“अचानक ही छिपा हुआ षड़यंत्र भीषण आतंक के रूप मे सामने आयेगा,
कोयले जैसे काले रंग की लड़की हमेशा के लिये गायब हो जायेगी,
धीरे धीरे शक्तिशाली लोग उस संगठन से नाराज होते चले जाएंगे.”
– (सेंचुरी 5 छंद 65)

– माईकल दी नास्त्रेदमस
फ्रांस 4 मई 1555

उपर्युक्त लाईने राजीव पर अक्षरश: वैसे ही सही बैठी जैसी कि लिखी गयी थी-

राजीव पायलट थे, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में वे 1984 में 50% वोट के साथ 404 सीटो पर जीतने के बाद प्रधानमंत्री बने, सात साल बाद 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान मारे गये.

लिट्टे जो एक खूंखार संगठन था उसने ये सारा षड़यंत्र रचा, वेनिस इटली का शहर है और सोनिया इटली की ही रहने वाली है, इस घटना के बाद वे आंतकित होकर राजनीति से बहुत समय तक दूर रही.

धनु शांतिसेना की कार्यवाई के बाद बदले की आग मे जल रही थी, उसने ही राजीव के विरूद्ध षड़यंत्र मे मुख्य भूमिका निभाई, बम विस्फोट मे करीब सत्रह लोग मारे गये थे, पर हरिबाबू के कैमरे की वजह से सारा राज खुल गया.

बम विस्फोट से षड़यंत्र अपने खूनी रूप मे सामने आया,
धनु तमिल थी, और तमिलों का रंग कृष्ण वर्ण का होता है,
बम विस्फोट मे उसके भी चिथड़े उड़ने से वह गायब हो गयी,
इस घटना के बाद भारत और पूरी दुनिया मे लिट्टे के खिलाफ माहौल बनने लगा,
जो अंत मे 2009 में उसके खात्मे का कारण बना. आज ही के दिन 26 साल पहले ये घटना भारत और दुनिया के इतिहास में हमेशा के लिये दर्ज हो गयी थी.

कहा जाता है कि नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों के अनेक जानकारों ने राजीव गांधी को उस समय चेतावनी भी दी थी कि वे सातवें साल में वेनिस की यात्रा के दौरान सतर्क रहे, उनके जीवन को खतरा हो सकता है.

पर जैसा कि हर बार होता है महान फ्रांसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी तब ही पूरी तरह समझ आती है, जब वह वास्तविक जीवन में घट जाती है क्योंकि नास्त्रेदमस भले ही सारे भविष्य को जानते थे पर वे समय की धारा को अपनी ही गति से अविरल बहने देना चाहते थे.

यही कारण था कि उन्होने अपनी हर भविष्यवाणी गूढ़ और सांकेतिक शब्दो में लिखी क्योंकि शायद वे भी नियति को बदलना नहीं चाहते थे.

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